पीएफ़आईः 15 राज्यों में एक साथ पड़े छापे, कहाँ क्या हुआ

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) के ठिकानों पर अलग-अलग राज्यों में छापेमारी की है.
एनआईए के मुताबिक देश के पंद्रह राज्यों में की गई छापेमारी के दौरान कुल 45 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. केरल से 19, तमिलनाडु से 11, कर्नाटक से 7, आंध्र प्रदेश से 4, राजस्थान से दो और तेलंगाना और उत्तर प्रदेश से एक-एक गिरफ़्तारी की गई है.
पीएफ़आई के महासचिव अनीस अहमद को भी गिरफ़्तार कर लिया गया है.
छापेमारी की ये कार्रवाइयां केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, बिहार, मध्य प्रदेश और अन्य कई राज्यों में की गई हैं.
वहीं महाराष्ट्र एटीएस के एसपी संदीप खाडे ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया है कि नांदेड़ समेत अलग-अलग शहरों से पीएफ़आई के 20 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है.
इस छापेमारी के दौरान एनआईएए के अलावा राज्य के पुलिस बलों ने भी कुछ लोगों को हिरासत में लिया है.
पीएफ़आई के कार्यकर्ताओं ने एनआईए की छापेमारी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी किए हैं.
एनआईए के छापों के बाद पीएफ़आई ने एक बयान जारी कर कहा है, "पीएफ़आई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद ने एनआईए और ईडी के देशव्यापी छापों और अपने राज्य और राष्ट्रीय स्तर के कार्यकर्ताओं और नेताओं की अन्यायपूर्ण गिरफ़्तारी की आलोचना की है."
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पीएफ़आई ने कहा है, "एनआईए के दावे सनसनीखेज हैं और इनका मक़सद आतंक का माहौल पैदा करना है."
पीएफ़आई ने कहा है कि वो इस तरह की कार्रवाई के आगे कभी भी समर्पण नहीं करेगी.
एनआईए और ईडी ने बुधवार रात और गुरुवार सुबह देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित पीएफ़आई के दफ़्तरों पर एक साथ छापेमारी की कार्रवाई की.
एनआईए ने अपने बयान में बताया है कि गिरफ़्तार किे गए लोगों पर 'आतंकवादी गतिविधियों का समर्थन' करने के आरोप हैं.
आतंकवाद के आरोप

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18 सितंबर को भी एनआईए ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में पीएफ़आई से जुड़े 38 ठिकानों पर छापेमारी की कार्रवाई की थी और चार लोगों को हिरासत में लिया था.
एनआईए ने गुरुवार की कार्रवाई पीएफ़आई के ख़िलाफ़ दर्ज 5 मामलों में की है. फिलहाल एनआईए पीएफ़आई से जुड़े कुल 19 मामलों की जांच कर रही है.
एनआईए के मुताबिक़, अभियुक्त 'आतंकवादी गतिविधियाँ करने के लिए ट्रेनिंग कैंप आयोजित कर रहे थे और धर्म के आधार पर अलग-अलग समूहों के बीच वैमनस्यता फैला रहे थे.'
हैदराबाद मामले की एफ़आईआर के मुताबिक़, "अभियुक्तों ने भारत सरकार के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने की साज़िश रची. इस आपराधिक साज़िश के तहत उन्होंने पीएफ़आई के कार्यकर्ताओं को नियुक्त किया और आतंकवादी गतिविधियाँ करने के लिए ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए."
एफ़आईआर के मुताबिक, "अभियुक्त ऐसी गतिविधियों में शामिल थे जिनका मक़सद भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को नुक़सान पहुँचाना था."
देशभर में एनआईए की छापेमारी

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एनआईए के अधिकारियों के मुताबिक़, ये एजेंसी का अभी तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन है. केंद्रीय एजेंसियों एनआईए और ईडी ने 15 राज्यों में गुरुवार सुबह छापेमारी की कार्रवाई की.
पीटीआई के मुताबिक़, गुरुवार को हुई कार्रवाइयों में राज्यों की पुलिस भी शामिल है और ये गिरफ़्तारियाँ एनआईए, ईडी और छह राज्यों की पुलिस ने की हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू और 10 अन्य जगहों पर छापेमारी की गई है और पीएफ़आई के प्रांत प्रमुख नज़ीर पाशा के घर और दफ़्तर पर भी छापा मारा गया है.
वहीं मंगलौर में एनआईए ने पीएफ़आई और उसके राजनीतिक संगठन एसडीपीआई (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया) के दफ़्तरों पर भी छापा मारा है.
कर्नाटक के अलग-अलग शहरों में एनआईए की कार्रवाई के ख़िलाफ़ पीएफ़आई और एसडीपीआई कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन भी किए हैं.

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क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीआरपीएफ़ (केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल) समेत भारी तादाद में पुलिस बल तैनात किए गए हैं.
छापेमारी की कार्रवाइयों से पहले एनआईए ने राज्यों के पुलिस बलों से सहयोग मांगा था और क़ानून व्यवस्था के मद्देनज़र पुलिस बल तैनात करने के लिए कहा था.
इसकी पुष्टि करते हुए मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश पुलिस भी छापेमारी के दौरान एनआईए के साथ थी. इंदौर में भी तीन लोगों को हिरासत में लिया गया है.
हालांकि नरोत्तम मिश्रा ने इस बारे में अधिक जानकारी न देते हुए कहा, 'ये एक संवेदनशील मामला है, अधिक जानकारी अभी नहीं दी जा सकेगी.'
दिल्ली में अमित शाह की बैठक
इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एनआईए की कार्रवाई की समीक्षा के लिए दिल्ली में एक बैठक की है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, इस बैठक में एनआई और ईडी के अधिकारी भी शामिल थे. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी इस बैठक में हिस्सा लिया.
पीएफ़आई अपने आप को एक ग़ैर सरकारी संगठन बताती है और हिंदूवादी संगठन इस पर प्रतिबंध की मांग उठाते रहे हैं.
प्रतिक्रिया

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पीएफ़आी पर छापेमारी को लेकर प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं. 'भारत जोड़ो यात्रा' पर निकले कांग्रेस नेता राहुल गांधी से जब इस पीएफ़आई पर छापेमारी के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि 'किसी भी तरह की सांप्रदायिकता और हिंसा, भले वो कहीं से भी पैदा हो रही हों, वे सब एक जैसी हैं, उनके ख़िलाफ़ लड़ने की ज़रूरत है और इसमें ज़ीरो टॉलरेंस होना चाहिए.'
वहीं बिहार बीजेपी के नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा है कि पीएफ़आई एक आतंकवादी संगठन है.
गिरिराज सिंह ने लालू यादव और नीतीश कुमार को लेकर भी टिप्पणी की है. गिरिराज सिंह ने कहा, "पीएफ़आई भारत विरोधी काम करता है. पूर्णिया को उसने अपना सेंटर बनाया है. ये दुर्भाग्य है जब फुलवारी शरीफ में पीएफ़आई पर छापे पड़े तब पुलिस का निराशाजनक वक्तव्य आया था. नीतीश और लालू बाबू तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं."
वहीं मुसलमानों के लिए काम करने वाले संगठन जमात-ए-इस्लामी हिंद ने एनआईए की कार्रवाई पर चिंता ज़ाहिर की है.
एक बयान में जमात-ए-इस्लामी हिंद ने कहा है, "जमात-ए-इस्लामी हिंद पीएफ़आई पर एआईए और ईडी की कार्रवाई से चिंतित है. एनआईए जैसी एजेंसियां उन लोगों के ख़िलाफ़ जांच कर सकती हैं जिनके ख़िलाफ़ स्पष्ट सबूत हैं लेकिन ऐसी कार्रवाई निष्पक्ष और राजनीतिक मक़सद से मुक्त दिखनी चाहिए. क्या ईडी और एनआईए ने छापेमारी में अपने मानकों का पालन करते हुए की है?"
क्या है पीएफ़आई?

पीएफ़आई ख़ुद को एक ग़ैर सरकारी सामाजिक संगठन बताता है जिसका घोषित मक़सद देश में ग़रीबों और पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए काम करना और उत्पीड़न और शोषण का विरोध करना है. अपने गठन के बाद से ही ये संगठन विवादों में घिरा रहा है.
फ़िलहाल पीएफ़आई देश के 20 से अधिक राज्यों में सक्रिय है और लाखों लोग इससे जुड़े हैं. लेकिन इसका मज़बूत आधार दक्षिणी भारत में है. केरल और कर्नाटक में इस संगठन की मज़बूत मौजूदगी है.

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पीएफ़आई सबसे पहले 2010 में केरल में प्रोफ़ेसर टीजे जोसेफ़ पर हमले के बाद चर्चा में आई थी. प्रोफ़ेसर जोसेफ़ पर परीक्षा में पैगंबर मोहम्मद पर अपमानजनक सवाल पूछने का आरोप था.
पीएफ़आई कार्यकर्ताओं पर प्रोफ़ेसर जोसेफ़ के हाथ काटने के आरोप लगे थे. बाद में अदालत ने अभियुक्तों को सज़ा भी दी थी. प्रोफ़ेसर पर हमले के मामले की जाँच भी बाद में एनआईए ने की थी. हालांकि पीएफ़आई ने अपने आप को अभियुक्तों से अलग किया था.
दक्षिण भारत में मुसलमानों के अधिकारों के लिए काम कर रहे कई संगठनों के एक साथ आने के बाद पीएफ़आई का गठन नवंबर 2006 में हुआ था. गठन के बाद से ही पीएफ़आई विवादों में घिरी रही है.
2018 में केरल के एर्नाकुलम में पीएफ़आई के छात्र संगठन सीएफ़आई (कैंपस फ्रंट ऑफ़ इंडिया) के कार्यकर्ताओं पर एसएफ़आई के छात्र नेता की चाकू मारकर हत्या के आरोप लगे थे.
2022 में उडुपी में हिजाब के लिए छात्राओं के प्रदर्शन को उकसाने के आरोप पीएफ़आई के छात्र संगठन सीएफ़आई पर लगे थे.
कुछ महीने पहले कर्नाटक में बीजेपी के युवा मोर्चा कार्यकर्ता प्रवीण नेट्टार की हत्या के आरोप पीएफ़आई कार्यकर्ताओं पर लगे थे. एनआईए इस मामले की जाँच कर रही है. इस मामले में भी कई लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.
प्रतिबंध की मांग

केरल हाई कोर्ट ने एक टिप्पणी में पीएफ़आई को चरमपंथी संगठन कहा था. भारत में सक्रिय हिंदूवादी संगठन पीएफ़आई पर प्रतिबंध की मांग करते रहे हैं.
अभी तक सिर्फ़ झारखंड ने पीएफ़आई पर प्रतिबंध लगाया था जिसे पीएफ़आई ने अदालत में चुनौती दी है.
इसके अलावा सीएए-एनआरसी प्रतिबंधों के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने भी पीएफ़आई पर प्रतिबंध की मांग की थी. भारतीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़, केंद्र सरकार ने भी पीएफ़आई पर प्रतिबंध लगाने पर विचार किया है.
अप्रैल 2021 में सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना की एक खंडपीठ के समक्ष कहा था कि केंद्र पीएफ़आई को प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया में है.
हालांकि प्रतिबंध के सवाल पर दैनिक भास्कर से बात करते हुए पीएफ़आई के राष्ट्रीय महासचिव अनीस अहमद ने कहा था, "हम कोई टेररिस्ट ऑर्गेनाइजे़शन नहीं हैं. हम एक स्वतंत्र संगठन हैं जो जनता के बीच काम करता है. हम खुले आम प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते हैं. हम एक पंजीकृत संगठन हैं और समय पर टैक्स भरते हैं. हमें सिर्फ आरोपों के आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है."
(कॉपी - दिलनवाज़ पाशा)
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