पीएफ़आई: जिस पर प्रतिबंध लगाना चाहती है योगी सरकार

अबु बकर, पीएफ़आई

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

22 नवंबर, 2006 को केरल के कोझीकोड में गठन के बाद से ही 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया' यानी 'पीएफ़आई' विवादों में घिरी रही है.

ताज़ा विवाद नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सीएए को लेकर विरोध प्रदर्शनों पर है. ये विरोध प्रदर्शन कई जगह हिंसक हो गए थे.

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने गृह मंत्रालय से पीएफ़आई पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है.

जिस पर पीएफ़आई ने तानाशाही वाला क़दम कहा है.

गठन

तीन संगठनों- 'कर्नाटक फ़ोरम फ़ॉर डिग्निटी' यानी 'केडीएफ़', तमिलनाडु के 'मनीथा नीथी पसाराई' और 'नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट' को मिलाकर इस नए संगठन को खड़ा किया गया, जिसकी शाखाएं भारत के अलग-अलग प्रांतों में भी मौजूद हैं.

बाद में कुछ और संगठन 'पीएफ़आई' में मिल गए, जिसमें गोवा की 'सिटिज़न्स फोरम', राजस्थान की 'कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशनल सोसाइटी', पश्चिम बंगाल की 'नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति', मणिपुर की 'लिलोंग सोशल फोरम' और आंध्र प्रदेश की 'एसोसिएशन ऑफ़ सोशल जस्टिस' शामिल हैं.

लेकिन गठन के चार सालों के अंदर ही 'पीएफ़आई' आरोपों में घिरने लगी.

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इस पर सबसे पहला आरोप वर्ष 2010 की 4 जुलाई की घटना को लेकर लगाया गया, जब केरल के तोडुपुज़ा के एक कॉलेज प्रोफ़ेसर टीजे थॉमस को उनके घर के पास रोका गया और उनके एक हाथ को कलाई से काट दिया गया.

प्रोफेसर थॉमस ने अपने कॉलेज के प्रश्न पत्र में कुछ आपत्तिजनक उल्लेख किया था, जिसे लेकर उन पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया.

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बाद में उनके साथ ऐसी घटना घटी. इस संबंध में जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया, उनपर 'पीएफ़आई' के सदस्य होने के आरोप लगाए गए.

हालांकि संगठन ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार कर इसे एक साज़िश क़रार दिया.

उसी साल अगस्त महीने तक केरल पुलिस ने 'पीएफ़आई' के कई ठिकानों पर छापामारी की और कई आपत्तिजनक दस्तावेज़ और हथियारों के बरामद होने का दावा किया.

इसमें प्रतबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया यानी 'सिमी' से 'पीएफ़आई' के जुड़े होने का दावा भी किया गया.

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इसके अलावा केरल पुलिस ने ये भी दावा किया था कि 'पीएफ़आई'के कार्यकर्ताओं पर छापामारी के दौरान चरमपंथी संगठन 'अल क़ायदा' की प्रचार सामग्री भी बरामद की गई थी.

केरल अकेला राज्य नहीं है जिसके राडार पर 'पीएफ़आई' की गतिविधियां रहीं हैं. वर्ष 2018 में झारखंड सरकार ने भी इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था जिसे बाद में झारखंड के उच्च न्यायलय ख़ारिज कर दिया था.

झारखंड सरकार ने पिछले साल फरवरी में इस संगठन पर एक बार फिर प्रतिबंध लगा दिया.

झारखंड सरकार की ओर से जारी बयान में आरोप लगाया गया था कि इस संगठन का संबंध विभिन्न चरमपंथी संगठनों से है और इसके कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ राज्य के विभिन्न पुलिस थानों में मामले दर्ज हैं.

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सरकारी सूत्रों का दावा है कि वर्ष 2012 में हुए दंगों के बाद पूर्वोत्तर राज्य असम में नफ़रत भरे 'एसएमएस मेसेज' में भी पीएफ़आई का हाथ रहा है. सूत्रों का कहना है कि केवल एक ही दिन 13 अगस्त 2012 को 60 करोड़ नफ़रत भरे एसएमएस भेजे गए थे. पीएफ़आई ने इसमें भी अपना हाथ होने से इनकार किया था.

'पीएफ़आई' हमेशा इन आरोपों को ख़ारिज करती रही और उसका कहना था कि वो सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया यानी 'एसडीपीआई' से ही संबद्ध है. इसलिए 2006 में हुए विलय के बाद एसडीपीआई के संस्थापक अध्यक्ष ई अबू बकर को ही 'पीएफ़आई' का चेयरमैन बनाया गया.

नागरिकता क़ानून और 'एनआरसी' के विरोध में उत्तर प्रदेश में हुई हिंसा के लिए भी राज्य सरकार ने 'पीएफ़आई' पर शक जताया है. उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से 'पीएफ़आई' पर प्रतिबंध लगाने की सिफ़ारिश भी की है.

वहीं केंद्र सरकार का भी कहना है कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली में हुई हिंसा में भी पीएफ़आई का हाथ हो सकता है.

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लेकिन संगठन के महामंत्री एम मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर आरोप लगाया है कि पूरे देश में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं.

उनका आरोप है कि केवल भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में ही इन विरोध प्रदर्शनों से निपटने के लिए 'दमनकारी तरीक़ों' का इस्तेमाल किया गया है.

पीएफ़आई ने अपने बयान में कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार की पीएफ़आई के ख़िलाफ़ कार्रवाई ''लोकतांत्रिक गतिविधियों के ख़िलाफ़ योगी की पुलिस का एक और तानाशाही क़दम है.''

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