पीएफ़आई: क्या पाँच साल के बैन से ख़त्म हो जाएगा संगठन?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
पापुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया यानी पीएफ़आई और इससे जुड़े दूसरे अग्रणी संगठनों पर बैन लगाने से ये संस्था दक्षिण भारत से 'पूरी तरह साफ़' नहीं होगी क्योंकि वहां इसका आधार बहुत 'मज़बूत' है, ख़ासतौर पर केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में.
राजनीतिक टिप्पणीकार और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (एसडीपीआई) के पूर्व पदाधिकारियों ने बीबीसी हिंदी को बताया कि पीएफ़आई को 2014 से ही बैन लगने का अंदेशा था जब बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में सत्ता में आई थी.
राजनीतिक टिप्पणीकार एनपी चेकुट्टी के मुताबिक, "इसे एक चरमपंथी और सांप्रदायिक संगठन कहकर नहीं दबाया जा सकता है क्योंकि अल्पसंख्यकों, ओबीसी और एससी-एसटी समुदाय पर इसकी अच्छी पकड़ है और भारत के आम लोगों, ख़ासतौर पर पिछड़े वर्ग पर इसके आर्थिक और राजनीतिक विचारों का असर होता है."
चेकुट्टी कहते हैं, "कुल मिलाकर सरकार के लिए उसे पूरी तरह हटाना मुश्किल होगा. उनके पास एक स्पष्ट राजनीतिक और आर्थिक एजेंडा है. उन्होंने एक गैर-मुस्लिम, धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक स्लोगन का इस्तेमाल कर और ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में 'इस्लाम को ख़तरे' की टैगलाइन का इस्तेमाल कर अपना सपोर्ट बेस बड़ा किया है."

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सिर्फ़ सांकेतिक बैन या होगा राजनीतिक फ़ायदा?

एसडीपीआई के पूर्व नेशनेल जेनरल सेक्रेटरी तस्लीम अहमद रहमानी ने बताया, "ये सिर्फ़ एक सांकेतिक बैन है. ये सिर्फ़ इसलिए मुमकिन हो पाया है क्योंकि इससे बीजेपी को राजनीतिक फ़ायदा होगा और बीजेपी अभी गुजरात और कर्नाटक में मुश्किल में है. केंद्र की सरकार इसका मुद्दा बना रही है क्योंकि भारत में आइडेंटिटी पॉलिटिक्स का फ़ायदा मिलता है. ये राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं है जैसा कि बताया जा रहा है."
समझा जाता है कि पीएफ़आई को मूल रूप से आरएसएस को चैलेंज करने के लिए बनाया गया था. कुछ सालों पहले इस पर सवाल उठे जब इस संस्था ने अपने काडर के बीच योगा को बढ़ावा देना शुरू किया और खुद को "सिर्फ़ मुसलमानों से संबंध नहीं रखने" वाला बताया. इनकी रैलियों में काडर वर्दी पहनकर आते हैं जैसे आरएसएस में. पिछले कुछ दिनों में इसके शीर्ष नेताओं को जेल भेजा गया है.
चेकुट्टी कहते हैं, "केरल और कर्नाटक में, एसडीपीआई ने पंचायत और नगरीय निकाय में पिछले कुछ सालों में चुनाव जीता है. विधानसभा चुनाव में उन्होंने सीट तो नहीं जीती है, लेकिन इनके प्रत्याशी 2000 से 3000 वोट लाने में कामयाब रहे हैं. इतने वोट किसी बड़ी पार्टी के प्रत्याशी को हराने के लिए काफ़ी हैं."

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चुनाव के लिहाज़ से कितना मज़बूत है संगठन

एसडीपीआई की कर्नाटक की राजनीति में ठीक वैसी है भूमिका मानी जा सकती है जैसी भूमिका 2004 के विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य में बहुजन समाज पार्टी की थी. उनके प्रत्याशियों को 1500-2000 वोट मिले थे और कांग्रेस पार्टी जेडीयू और बीजेपी जैसी विपक्षी पार्टियों से 23 सीटों पर चुनाव हार गई थी. इनमें कई सीटों पर पहले कांग्रेस का कब्ज़ा था.
स्थानीय निकाय चुनावों और केरल विधानसभा चुनावों में सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ़ और कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ़ के अनुभव इससे मिलते-जुलते रहे हैं. कर्नाटक में एसडीपीआई ने कांग्रेस के मैसूर के मज़बूत उम्मीदवार को 2013 विधानसभा चुनाव में क़रीब-क़रीब हरा दिया था. एसडीपीआई ने कई उत्तरी और पूर्वी राज्यों में लोकसभा चुनाव लड़े थे.
चेकुट्टी कहते हैं, "2014 के चुनाव में मल्लापुरम में, आयूएमएल प्रत्याशी मुश्किल से जीत दर्ज करने में कामयाब हुए थे. मुस्लिम बहुल उत्तरी मालाबार इलाके में एसडीपीआई के पक्ष में मैदान तैयार हो रहा है. ऐसा इसलिए क्योंकि पीएफ़आई ने पिछड़े और दलित संगठनों के साथ गठबंधन किया है."
राजनीतिक जानकार और पत्रकार सी दाऊद कहते हैं, "पीएफ़आई का काडर नेटवर्क अच्छा है और हाल में हुए नॉर्थ केरला कॉन्फ्रेंस से इसे अबतक की सबसे बड़ी रैली करने में मदद मिली, कम से कम पिछले तीन दशकों में. इसी तरह का एक कॉन्फ्रेंस अलापुझा में दो महीने पहले हुआ था और वहां भी एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया था. ये बड़ी बात है क्योंकि उत्तर केरल की पहचान भी मुस्लिम मालाबार इलाके की है."

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पार्टी की फंडिंग पर कितना असर होगा?

चेकुट्टी ये भी बताते हैं कि पीएफ़आई के तहत काम करने वाले संगठनों ने पहले ओबीसी आरक्षण के पक्ष में भी कई कैंपेन किए हैं. कैंपेन 2000-2006 के बीच चले थे और नतीजतन केरल सरकार को सरकारी सेवाओं में बची हुई सीटों को भरना पड़ा. ओबीसी, दलित और अन्य पिछली जातियों के साथ काम करने का इस संगठन को फ़ायदा मिला है.
दाऊद के मुताबिक, "पीएफ़आई पर बैन लगाने से एसडीपीआई की फंडिंग पर असर नहीं पड़ेगा, मुसलमानों में असुरक्षा की भावना के कारण इसे आसानी के फंड मिलेंगे."
लेकिन दाऊद को नहीं लगता कि पीएफ़आई का काडर किसी तरह की हिंसा या फिर "चरमपंथी गतिविधी" का हिस्सा बनेगा. वो थोड़ा ठहर कर एक बड़ी राजनीतिक ताकत की तरह सामने आना चाहेंगे.
रहमानी का भी मानना है कि बैन का पीएफ़आई पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि "60 प्रतिशत से ज़्यादा एसडीपीआई उनके प्रतिनिधियों से बना है. बचे हुए 40 प्रतिशित की बहुत अहमियत नहीं है. सरकार एसडीपीआई को बैन नहीं करना चाहती क्योंकि इसका उसे राजनीतिक फ़ायदा हो जाएगा."
हालांकि कर्नाटक के पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता केएस ईश्वरप्पा जिन्होंने पीएफआई पर बैन का समर्थन किया है, उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार एसडीपीआई को बैन नहीं कर पाई क्योंकि "इसके लिए उन्हें चुनाव आयोग की सलाह लेनी होती."
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