भारत-चीन तनाव: सीमा पर सेनाओं के पीछे हटने से क्या बेहतर हो जाएंगे रिश्ते?

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- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और चीन ने एक साझा बयान में गुरुवार को कहा कि कोर कमांडरों के बीच 16वें दौर की बातचीत के बाद दोनों देशों की टुकड़ियां गोगरा-हॉटस्प्रिंग (पेट्रोलिंग पिलर-15) इलाक़े से पीछे हट रही हैं.
जारी बयान में कहा गया है कि सुनियोजित ढंग से पीछे हटना, दोनों देशों की सीमाओं पर शांति के लिए सही क़दम है. इसके बाद शुक्रवार को चीन के रक्षा मंत्रालय ने भी बयान जारी करके इसकी पुष्टि की है.
चीन के रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा, "आठ सितंबर को भारत और चीन के बीच 16वें दौर की वार्ताओं के बाद ये सहमति बनी है कि दोनों देशों की सेनाएं जियनान दबान (गोगरा हॉटस्प्रिंग) से पीछे हट रही हैं."

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चीन गोगरा-हॉटस्प्रिंग को ही जियनान दबान कहता है.
दोनों देशों के बीच पूर्वी लद्दाख में बने गतिरोध के बीच यह एक अहम घटना है. क़रीब दो साल से भारत और चीन इस इलाक़े में आमने-सामने हैं.
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने एक बयान जारी कर कहा है कि आठ सितंबर सुबह 08:30 बजे से दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटना शुरू हो गई हैं.
उनके बयान के अनुसार, 12 सितंबर यानी सोमवार तक ये सारी प्रक्रिया पूरी हो जाएगी.
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यह संयुक्त बयान अगले सप्ताह उज़्बेकिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से पहले आया है. इस बैठक में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हिस्सा लेंगे.
इस घोषणा को शंघाई सहयोग संगठन की अहम बैठक से जोड़ कर भी देखा जा रहा है.
भारत-चीन के बीच विवाद की जड़ क्यों है लद्दाख?

- अप्रैल 2020 में शुरू हुआ विवाद, जब चीन ने पूर्वी लद्दाख में विवादित एलएसी पर सैन्य मोर्चाबंदी की.
- चीन ने भारत पर एलएसी पर निर्माण कार्य कराने का आरोप लगाया.
- गलवान घाटी, पैंगोंग त्सो और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स जैसे इलाक़ों में दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आईं.
- 15 जून को गतिरोध हिंसक हुआ. गलवान में हुए खूनी संघर्ष में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई.
- बाद में चीन ने माना कि उसके भी चार सैनिक मरे, पर जानकारों के मुताबिक चीनी सैनिकों की मौत का आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा था.
- फरवरी 2021 में दोनों देशों ने पैंगोंग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी किनारे पर चरणबद्ध और समन्वित तरीके से तनाव को कम करने की घोषणा की.
- दोनों देशों में गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स, डेमचोक और डेपसांग जैसे इलाक़ों को लेकर भी विवाद है.
- एलएसी पर भारत और चीन के बीच कई सालों से कम-से-कम 12 जगहों पर विवाद रहा है.
- जून 2020 के बाद दोनों देशों के बीच कोर कमांडर स्तर पर 16 राउंड की बातचीत हो चुकी है.
- ताज़ा बयान इसी 16वें राउंड की बातचीत के बाद जारी किया गया है.


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मोदी-जिनपिंग की संभावित मुलाक़ात से पहले ये पहल कितनी अहम
शंघाई सहयोग संगठन को लेकर बात चल रही थी कि क्या इस बैठक में पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच मुलाक़ात होगी या नहीं.
सीमा पर जारी गतिरोध के संदर्भ में इसे लेकर आशंकाएं ज़ाहिर की जा रही थीं. लेकिन अब जबकि सेनाएं पीछे हट रही हैं तो उम्मीद की जा सकती है कि दोनों नेता एक सकारात्मक सोच के साथ मिलें.
इसे लेकर रक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन कहते हैं, "अब जब चीन पीछे हटने को तैयार हो गया है तो इसकी एक वजह यह भी मानी जा सकती है कि चीन-भारत के बीच जिस तरह के तनाव भरे रिश्ते हैं, वो दिन-ब-दिन ख़राब ही हो रहे हैं. साथ ही चीन के दूसरे कई देशों जैसे ताइवान, अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भी गतिरोध चल रहे हैं. ऐसे में चीन भारत के साथ फिलहाल रिश्तों को और बिगाड़ना नहीं चाहेगा."
सुशांत सरीन एक वजह यह भी बताते हैं कि चीन को जो कुछ करना था, वो वह करके देख चुका है. इससे अधिक वो क्या कर पाएंगे या नहीं कर पाएंगे, इस पर कोई स्पष्ट तौर पर तो कह नहीं सकता है.
वह कहते हैं, "इसे आप ऐसे देख सकते हैं कि दो क़दम आगे बढे़, एक क़दम पीछे हटे. वहां अपना सारा साजो-सामान तैयार कर लिया, अपना सारा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया और थोड़ा-सा डिसइंगेजमेंट कर लिया, तो ऐसे में चीन को कोई ख़ास नुकसान तो हुआ नहीं."

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लेकिन सवाल भी उठ रहे हैं
कई देशों में भारत के पूर्व राजदूत रहे राकेश सूद कहते हैं, "डिसइंगेजमेंट की ये बातचीत पिछले दो साल से ज़्यादा समय से चल रही है और जिन क्षेत्रों में डिसइंगेजमेंट हुआ भी है, वहां भी रत्तीभर डिएस्कलेशन नहीं हुआ है. इसका नतीजा ये है कि हर तरफ़ से उतनी ही तादाद में 50-60 हज़ार भारतीय सैनिक और 50-60 हज़ार चीनी सैनिक उन्हीं ऊंचाइयों पर मौजूद हैं, अपने पूरे असलहे के साथ. और वहां पर ड्रोन्स का भी प्रयोग हो रहा है, हवाई जहाज़ से भी मॉनिटरिंग की जा रही है और वो पूरा का पूरा तनाव एक तरह से अभी भी बरकरार है."
राकेश सूद कहते हैं कि अभी तक तीन जगहें बची थीं, जहां पर अभी तक डिसइंगेजमेंट भी नहीं हुआ है. उसमें से ये एक जगह थी, जहां पर दोनों देशों ने सहमति दी है कि वहां पर डिसइंगेजमेंट किया जा रहा है.
वह कहते हैं, "इसमें उन्होंने कहा कि ये जो पिछली बातचीत हुई थी, वो16वां राउंड था. ये जुलाई के महीने में हुआ था, उसके तहत डिसइंगेजमेंट का समझौता हुआ था. लेकिन अगर आप जुलाई की उस बैठक को देखेंगे जिसके तहत इस समझौते की बात की जा रही है तो उसके साझा बयान में ऐसा कोई इशारा नहीं है."
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राकेश सूद कहते हैं, ''जब इस पर सवाल उठे तो कहा गया कि हम इसके तौर-तरीक़ों को तय कर रहे थे. तो ऐसे में ये थोड़ा अजीब लगता है.''
राकेश सूद कहते हैं, "मुझे लगता है कि राजनीतिक तौर पर यह तय हुआ है कि डिसइंगेजमेंट करना है क्योंकि एससीओ में शी जिनपिंग आ रहे हैं और वो चाहेंगे कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाक़ात हो जाए."
वह कहते हैं, ''हो सकता है कि यहां से कोई संदेश गया होगा कि हमें कुछ ना कुछ डिसइंगेजमेंट चाहिए.''
राकेश सूद कहते हैं, "मेरे अनुमान के अनुसार यह काफी अस्थायी किस्म का जेश्चर है और हमें इसमें पड़ना नहीं चाहिए क्यों अभी कम से कम दो ऐसी जगह हैं, जहां पर डिसइंगेजमेंट बाकी है."
वो कहते हैं, "मैं इस डिसइंगेजमेंट को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानता हूं क्योंकि आपके उतने ही सिपाही, उतना ही असलहा अभी भी सीमा पर मौजूद है. ये स्थिति तो 24 घंटे से कम समय में बदल सकती है."

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भारत की कितनी कामयाबी ?
सुशांत सरीन कहते हैं, "इसके दो पहलू नज़र आते हैं. एक तो यह है कि चीन ने जब भी किसी पड़ोसी देश पर धौंस जमाई है तो उसे वो सबकुछ मिल गया है जो चाहता था. लेकिन अब ये होना शुरू हुआ है कि भारत, चीन के सामने खड़ा हो जाता है और पीछे हटने को तैयार नहीं होता. अगर चीन ने सीमा पर निर्माण किया है तो भारत ने भी निर्माण किया है. भारत ने भी वहां फौजें तैनात कर रखी हैं, तमाम सैन्य साजो-सामान वहां लेकर गए हुए हैं. ऐसे में जब भारत पीछे नहीं हटा है तो एक संदेश गया है."
वह कहते हैं, ''इस क़दम से दुनिया को एक संदेश ज़रूर गया है कि भारत, चीन के सामने डटकर खड़ा हो जाता है.''
सुशांत सरीन के मुताबिक इसका दूसरा पहलू ये है कि भारत और चीन के बीच अगर युद्ध होता है तो वो किसी के लिए भी हितकर नहीं है. ऐसे में अगर इस तरह के हालात बनते हैं जिससे दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है तो यह एक तरह की सफलता ही है.
वह कहते हैं कि इन दोनों बातों के आधार पर इस क़दम का स्वागत करना ही चाहिए.
हालांकि, राकेश सूद इस क़दम को भारत के संदर्भ में कोई महत्वपूर्ण क़दम नहीं मानते हैं.
वो कहते हैं, "सेनाएं जमी हुई हैं तो कामयाबी क्या है उसमें? कामयाबी बस इतनी ही है ना कि आपने उन्हें और आगे नहीं आने दिया."
राकेश सूद का कहना है कि यह सिर्फ़ राजनीतिक-मक़सद के लिए है.

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चीन के लिए ये दांव कितना अहम
चीन के क़दम पीछे हटाने को क्या उसकी शिकस्त मानना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में राकेश सूद कहते हैं, "ये शिकस्त जैसी बात नहीं है लेकिन यह ज़रूर है कि एससीओ की बैठक उनकी पहल है और वो बिल्कुल चाहेंगे कि इसमें एक आमने-सामने की बैठक हो जाए."
वो आगे कहते हैं, "हो सकता है कि रूस की ओर से भी इस संबंध में सुझाव दिया गया हो."
हालांकि, राकेश सूद का मानना है कि यह कोई बहुत महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन यह अहम हो जाएगा अगर पीएम मोदी उनके झांसे में आकर उनसे मुलाक़ात करेंगे.
सुशांत सरीन मानते हैं कि चीन का यह क़दम एक पत्ता खेलने की तरह है.
वह कहते हैं, "चीन को लेकर जिस तरह का ध्रुवीकरण हो रहा है उसमें कह सकते हैं कि चीन की ओर से एक पत्ता खेला गया है कि भारत पूरी तरह से चीन-विरोधी पलड़े की ओर ना चल जाए. भारत संतुलन रखे."
सरीन मानते हैं कि फिलहाल चीन, अमेरिका, ताइवान से जुड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है और भारत के साथ तनाव को और अधिक बढ़ाना नहीं चाहता है. इसलिए डिसइंगेजमेंट किया गया है.

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भारत चीन रिश्तों का भविष्य
भारत-चीन में जारी गतिरोध के बीच इस घोषणा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है लेकिन इससे ये मान लेना कि भारत-चीन के संबंध बहुत अच्छे हो जाएंगे, ऐसा नहीं है.
सुशांत सरीन कहते हैं, "एक समझौता हो गया और उससे सारे के सारे गतिरोध सुलझ गए, ऐसा नहीं है. हालांकि, यह क़दम स्वागत योग्य है लेकिन ऐसा नहीं है कि इस एक घोषणा मात्र से हिंदी-चीनी भाई-भाई वाला भाव वापस आ जाएगा. वो तो नहीं होने वाला."
हालांकि, सरीन मानते हैं कि इससे भारत-चीन के रिश्तों में चला आ रहा तनाव कुछ कम ज़रूर होगा.
राकेश सूद कहते हैं, "अगर हमारी यह धारणा है कि भारत-चीन रिश्ते सामान्य होने के लिए वहां मौजूद सेनाओं का डिसइंगेजमेंट होना ज़रूरी है यानी वे अप्रैल 2020 की स्थिति में पहुंच जाएं, तो अभी हम उस स्थिति से काफी दूर हैं."

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डिसइंगेजमेंट या पीछे हटने का मतलब
डिसइंगेजमेंट एक स्थानीय प्रक्रिया होती है, यानी किसी मोर्चे पर जो सैनिक एक-दूसरे के आमने-सामने डटे हुए थे, वो पीछे हटेंगे.
रक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन के मुताबिक़, "जो सेनाएं आमने-सामने आ गई थीं, अब वो पीछे हट गई हैं. अब वो आमने-सामने वाली स्थिति नहीं है कि दूसरे देश की सेना महज़ कुछ गज़ पर अपने पूरे हथियार लेकर खड़ी है."
हालांकि, गतिरोध शुरू होने से पहले वाली स्थिति, जिसमें दोनों सेनाएं एक-दूसरे से कुछ किलोमीटर की दूरी पर थीं, अब भी वो स्थिति नहीं है. सेनाएं पीछे तो हट रही हैं लेकिन पहले की स्थिति से अभी भी वह आगे हैं.
वहीं, डिएस्केलेशन एक व्यापक प्रक्रिया है जो ज़्यादा पुख्ता और बड़ी होती है. इसके शुरू होने से ये इशारा मिलता है कि हालात पहले की तरह सुधर रहे हैं.
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