क्या तीन साल बाद होगी पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग की मुलाक़ात?- प्रेस रिव्यू

मोदी और जिनपिंग

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भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर जारी तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग तीन साल बाद पहली मुलाक़ात कर सकते हैं. प्रेस रिव्यू में आज सबसे पहले अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू की ये ख़बर पढ़िए.

रेप

हिंदू की रिपोर्ट का कहना है कि ये बैठक सितंबर महीने के मध्य में भी हो सकती है, जब दोनों नेताओं के उज़्बेकिस्तान में होने वाले शंघाई सहयोग संघटन (एससीओ) में शामिल होने की उम्मीद है. एक संभावना ये भी है कि दोनों इसी साल नवंबर मध्य में मिले, जब दोनों नेता जी-20 देशों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए इंडोनेशिया पहुँचेंगे.

अख़बार ने इस बैठक को भारत के लिए जोख़िम से भरा बताया है. हाल के समय में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव के बावजूद चीन की ओर से दोनों देशों के बीच संबंधों को 'सामान्य' रूप में चित्रित किए जाने की कोशिश हो रही है, जिसको लेकर भारत सतर्क है.

इसी साल मार्च में चीन के विदेश मंत्री वांग यी जब दौरे पर आए तो भारत ने बेमन से उनकी मेज़बानी की लेकिन साथ ही एक कड़ा संदेश भी दिया कि भारत सीमा को 'उचित स्थान पर रखने' और संबंधों को बहाल करने की चीन की मांग को स्वीकार नहीं करेगा.

इसके बाद से ही भारत लगातार सार्वजनिक मंचों पर ये संदेश दोहराता रहा है. गुरुवार को ही, विदेश मंत्रालय ने भारत में जर्मनी के राजदूत की ओर से अरुणाचल प्रदेश को दिए बयान का समर्थन किया.

दरअसल, जर्मन राजदूत ने कहा था कि अरुणाचल प्रदेश पर चीन के दावे गलत हैं और वह यहां अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर रहा है. जर्मन राजदूत फ़िलिप ऐकरमैन के बयान ने जहां चीन को नाराज़ किया तो वहीं इससे जुड़े सवालों पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा कि सीमा विवादों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत के रुख की सराहना करता है.

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 29 अगस्त को एक बार फिर ये दोहराया कि भारत और चीन के बीच संबंध तभी सामान्य होंगे जब सीमा पर स्थिति सामान्य होगी. इससे पहले बीते महीने भी विदेश मंत्री ऑस्ट्रेलिया और ब्राज़ील के दौरे पर ये कह चुके हैं.

उन्होंने कहा कि हम कोई शर्त नहीं थोप रहे बल्कि दोनों पक्षों के बीच हुए समझौतों को लेकर तथ्य सामने रख रहे हैं. हालांकि, भारत जिस समझौते के उल्लंघन का आरोप चीन पर लगाता है, उसी का हवाला देते हुए बीते सप्ताह चीन की सेना ने भारत-अमेरिका के बीच ऊंचाई वाले इलाकों में होने जा रहे सैन्य अभ्यास का विरोध किया था.

मोदी और जिनपिंग के बीच हुई पिछली बैठकों को दोनों पक्षों ने सीमा पर तनाव को शांत करने में मदद के रूप में देखा है. जुलाई 2017 में एक शिखर सम्मेलन से इतर दोनों नेताओं की कुछ देर की बातचीत को डोकलाम में हुई तनातनी के बाद जारी गतिरोध को तोड़ने के तौर पर देखा गया.

हालांकि, हाल के महीनों में चीनी सेना ने पहले ही धीमी गति से चल रही एलएसी वार्ता पर अपना कड़ा रुख जारी रखा है और यथास्थिति को बहाल करने से इनकार कर दिया है.

माना जाता है कि शी जिनपिंग का पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) पर कड़ा नियंत्रण है और उन्हीं के निर्देश पर चलते हुए ये सख्त रवैया अपनाया जा रहा है.

मोदी और जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, साल 2014 में गुजरात में पीएम मोदी और शी जिनपिंग

शी जिनपिंग की विदेश यात्रा को लेकर संशय

भले ही दोनों नेता समरकंद में एक-दूसरे के सामने होंगे लेकिन चीन के रवैये की वजह से भारत को दोनों नेताओं की बैठक पर हामी भरने से पहले सोच-विचार करना पड़ रहा है.

शिखर सम्मेलन की तैयारियों में जुटे उज़्बेकिस्तान विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने अख़बार को बताया कि सारी व्यवस्था हो गई है और 'सभी आठ सदस्य देशों के नेताओं' के आने की उम्मीद है. इसके साथ ही ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम राइसी भी इस साल एससीओ की बैठक में सदस्य के तौर पर जुड़ेंगे.

विदेश मंत्रालय ने पहले बताया था कि एससीओ बैठक के लिए पीएम मोदी के समरकंद दौरे की घोषणा 'सही समय' पर की जाएगी. एस जयशंकर जब इसी साल जुलाई में ताशकंद में एससीओ सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक से लौटे.

उसके बाद जारी आधिकारिक बयान में कहा गया था कि अपने दौरे पर उन्होंने 15-16 सितंबर को होने वाली एससीओ देशों के शीर्ष नेताओं की बैठक की तैयारियों का जायज़ा लिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बैठक में शामिल होने की प्रबल संभावना इसलिए भी है क्योंकि भारत अब एससीओ का अध्यक्ष बन रहा है और अगले साल शिखर सम्मेलन की मेज़बानी भी करेगा.

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने 19 अगस्त को एक रिपोर्ट में बताया था कि शी जिनपिंग के कार्यालय ने भी सम्मेलन से इतर पाकिस्तान, भारत और तुर्क़ी के नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं की तैयारियां शुरू कर दी हैं.

हालांकि, हाल ही में संपन्न हुई एससीओ देशों के रक्षा मंत्रियों की बैठक में चीनी पक्ष के न पहुँचने से ये आशंका बढ़ गई है कि क्या शी जिनपिंग बैठक में शामिल होने उज़्बेकिस्तान पहुँचेंगे या नहीं. शी जिनपिंग साल 2019 में कोरोना वायरस महामारी की शुरुआत के बाद से अब तक विदेश दौरे पर नहीं गए हैं.

मोदी और जिनपिंग आख़िरी बार नवंबर 2019 में ब्राज़ील में मिले थे. दोनों देशों के बीच चेन्नई में दूसरा अनौपचारिक सम्मेलन हुआ.

इसके बाद शी जिनपिंग ने कहा, "मैं आपसे अगले साल चीन में मिलने की आशा करता हूं". हालांकि, इस बयान को छह महीने भी नहीं बीते थे, जब चीन ने एलएसी पर अपनी सेना भेजी और दोनों देशों के बीच हिंसक झड़पें हुईं. ये तनाव आज भी बरकरार है और दोनों देशों के नेताओं के बीच तीन साल से बातचीत भी बंद है.

ममता बनर्जी के आरएसएस को लेकर दिए बयान पर क्यों छिड़ा घमासान

ममता बनर्जी

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के आरएसएस को लेकर दिए बयान पर विपक्षी उनकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं. उन्होंने हाल ही में कहा था कि आरएसएस में सभी बुरे नहीं हैं.

ममता बनर्जी के इस बयान पर कांग्रेस से लेकर सीपीआई(एम) और एआईएमआईएम तक कई विपक्षी दल हमलावर हैं.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया लिखता है कि एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ममता बनर्जी ने कहा, "आरएसएस पहले इतना बुरा नहीं था. मैं नहीं मानती कि वे (आरएसएस) बुरे हैं. आरएसएस में कई अच्छे लोग हैं और वो भाजपा का समर्थन नहीं करते हैं."

ममता के इस बयान पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "2003 में भी उन्होंने आरएसएस को देशभक्त कहा था और बदले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें दुर्गा कहा था." ओवैसी ने कहा कि गुजरात दंगों के बाद संसद में भाजपा सरकार का ममता बनर्जी ने बचाव किया था.

वहीं पश्चिम बंगाल से कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा, "ये पहली बार नहीं कि ममता बनर्जी ने आरएसएस की तारीफ़ की है."

सीपीआईएम नेता मोहम्मद सलीम ने कहा, "आरएसएस ने उन्हें दुर्गा कहा और वह आरएसएस के लिए दुर्गा की भूमिका निभा रही हैं."

वहीं, टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने ममता बनर्जी के बयान का बचाव करते हुए कहा, "मुख्यमंत्री ये कहने की कोशिश कर रही थीं कि हर संगठन में अच्छे और बुरे लोग होते हैं. बीते विधानसभा चुनावों में बीजेपी-आरएसएस की ताकत को हराने के बाद हमें किसी को कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है."

भूपिंदर हुड्डा ने बताया, इस्तीफ़े के बाद गु़लाम नबी आज़ाद से मिलने की वजह

भूपिंदर हु्ड्डा

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ग़ुलाम नबी आज़ाद ने बीते शुक्रवार को कांग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया. इसके कुछ ही दिन बाद भूपिंदर सिंह हुड्डा, आनंद शर्मा और पृथ्वीराज चव्हान आज़ाद के आवास पर उनसे मिलने पहुँचे.

इस मुलाक़ात ने इन अटकलों को हवा दी कि आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी से कई और वरिष्ठ नेताओं का इस्तीफ़ा हो सकता है. ये तीनों नेता कांग्रेस में सुधार की मांग कर रहे बागी जी-23 समूह का भी हिस्सा हैं.

आनंद शर्मा पहले ही हिमाचल प्रदेश की चुनाव समिति से इस्तीफ़ा दे चुके हैं और टेलीविज़न इंटरव्यू में राहुल गांधी के ख़िलाफ़ बोलने को लेकर पृथ्वीराज चव्हान भी निशाने पर हैं.

अब भूपिंदर सिंह हुड्डा ने सफ़ाई दी है कि वो ग़ुलाम नबी आज़ाद से इसलिए मिले थे ताकि उन्हें समझा सकें कि वो ऐसी बातें बोलने से परहेज़ करें, जिससे पार्टी के अन्य लोगों के बीच कड़वाहट बढ़े. हुड्डा ने कहा, "हमारे बीच उनके इस्तीफ़े को लेकर कोई बात नहीं हुई."

अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार हुड्डा ने कहा, "हमने आज़ाद से कहा कि चूंकि आपने इतने लंबे समय तक रहने के बाद पार्टी से इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया है, तो आपको ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए जिससे पार्टी के लोगों के बीच कड़वाहट पैदा हो."

हरियाणा के पूर्व सीएम हुड्डा ने कहा, "हमने पार्टी में संगठनात्मक चुनाव की मांग की थी, जो अब होने जा रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष ने हमारी मांग मान ली हैं. इसके बावजूद आज़ाद साहब ने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया, लेकिन उन्होंने हमारे साथ अपने इस्तीफ़े पर कभी बात नहीं की. हमने सिर्फ़ उनसे ये पूछा कि उनकी मांग पूरी होने के बाद भी ऐसा क्या हुआ, जो उन्हें ये फ़ैसला लेना पड़ा."

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