नेपाल को चीन की मदद क्या भारतीय-अमेरिकी प्रभाव का मुकाबला करने की कोशिश है?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
चीन ने इस साल विभिन्न परियोजनाओं में निवेश करने के लिए नेपाल को 15 अरब रुपये की अनुदान सहायता देने का वादा किया है.
इसकी घोषणा हाल ही में नेपाल के विदेश मंत्री नारायण खड़का की चीन की तीन दिवसीय यात्रा के दौरान की गई. इस यात्रा के दौरान खड़का अपने चीनी समकक्ष वांग यी से मिले और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने पर व्यापक बातचीत हुई.
इसी साल मार्च में वांग यी नेपाल की आधिकारिक यात्रा पर गए थे. नेपाल के विदेश मंत्री की इस हालिया यात्रा के बाद दोनों देशों ने द्विपक्षीय सहयोग के कई मामलों में हुई प्रग्रति पर संतोष जताया.
साथ ही वांग यी ने घोषणा की कि चीन वर्ष 2022 के लिए नेपाल द्वारा चुनी गई परियोजनाओं में निवेश करने के लिए नेपाल को ₹15 बिलियन (800 मिलियन आरएमबी) का अनुदान देगा. उन्होंने ये घोषणा भी की कि चीन नेपाल के अनुरोध पर 30 लाख आरएमबी मूल्य की आपदा राहत सामग्री भी नेपाल को देगा.
इस घटनाक्रम के बारे में जब भारत के विदेश मंत्रालय से पूछा गया तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कोई सीधी टिपण्णी करने से इंकार करते हुए कहा, "नेपाल के साथ हमारे संबंध अद्वितीय हैं और मुझे यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि वे अपनी योग्यता के आधार पर खड़े हैं. भारत-नेपाल संबंध, विशेष रूप से हमारे आर्थिक, संपर्क और लोगों से लोगों के संबंध बहुत ख़ास हैं."
उन्होंने कहा कि इस वर्ष दोनों देशों के नेतृत्व का एक-दूसरे के देशों की यात्रा करना दोनों देशों के मज़बूत संबंधों का एक अच्छा उदाहरण है जिसे भारत मज़बूत करना चाहता है.
भारत के विदेश मंत्रालय प्रवक्ता ने साथ ही ये भी कहा कि अगर कोई गतिविधि है जो रक्षा या सुरक्षा पहलुओं पर असर डालती है, तो सरकार उस पर संज्ञान लेती है, उस पर नज़र रखती है और उसके ख़िलाफ़ आवश्यक उपाय करती है.

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चीन और नेपाल की बढ़ती नज़दीकी
जानकारों का मानना है कि चीन, नेपाल में विकास परियोजनाओं में निवेश करने के लिए अपनी बेल्ट एंड रोड पहल पर ज़ोर दे रहा है.
नेपाल के विदेश मंत्री के चीन दौरे के बाद चीन ने कहा कि दोनों पक्ष जल्द से जल्द बेल्ट एंड रोड सहयोग के लिए एक कार्यान्वयन योजना पर बातचीत करेंगे और कोई निष्कर्ष निकालेंगे.
चीन ने अधिक चाय, औषधीय जड़ी-बूटी, खेत और चरागाह उत्पादों के निर्यात के लिए नेपाल के प्रयासों का स्वागत किया है. साथ ही ये भी कहा कि वो चीनी उद्यमों को नेपाल में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करता है.

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दोनों देशों ने काठमांडू रिंग रोड इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट (द्वितीय चरण) को तेज़ गति देने और इलेक्ट्रिक पावर इंटरकनेक्शन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है और कहा है कि दोनों पक्ष इलेक्ट्रिक पावर कोऑपरेशन प्लान को मज़बूत करेंगे और ट्रांस-हिमालयी मल्टी-डायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क का निर्माण करेंगे.
साथ ही दोनों देशों ने आपदा नियंत्रण और शमन पर सहयोग को गहरा करने पर सहमति जताई है. नेपाल के विदेश मंत्री खड़का ने चीन को उस "महत्वपूर्ण क्षण" में मदद करने के लिए धन्यवाद दिया जब नेपाल में भूकंप के बाद ईंधन की कमी हो गई थी. वांग यी ने कहा है कि चीन नेपाल को आपदा नियंत्रण और चिकित्सा संबंधी आपूर्ति 'चीन-दक्षिण एशिया आपातकालीन आपूर्ति रिजर्व' के माध्यम से प्रदान करेगा.
चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने ये घोषणा भी की है कि चीन नेपाल के लिए चीन-नेपाल सीमा पार रेलवे की फिज़िबिलिटी रिपोर्ट के लिए नेपाल की मदद करेगा और इसी साल सर्वेक्षण कार्य करने के लिए विशेषज्ञों को नेपाल भेजेगा.
दोनों पक्षों ने न्याय, सीमा पार साइबर अपराधों का मुकाबला करने, सीमा प्रबंधन, संयुक्त रोकथाम और नियंत्रण और बंदरगाहों सहित अन्य क्षेत्रों में सहयोग को मज़बूत करने का भी फ़ैसला किया है.

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नेपाल में अमेरिका के बढ़ते प्रभाव की काट?
इस साल फ़रवरी में नेपाल की संसद ने 500 मिलियन डॉलर के एक अमेरिकी इंफ्रास्ट्रक्चर अनुदान को मंज़ूरी दी. इस मंज़ूरी का नेपाल में विरोध हुआ और आलोचकों ने कहा कि यह अनुदान हिमालयी राष्ट्र की संप्रभुता को कमज़ोर करता है.
वर्ष 2017 में अमेरिकी सरकारी सहायता एजेंसी 'मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन' (एमसीसी) ने बिजली ट्रांसमिशन लाइन और सड़क सुधार परियोजना को निधि देने के लिए अनुदान में सहायता प्रदान करने पर सहमति व्यक्त की थी.
अमेरिका ने कहा था कि नेपाल को इस अनुदान सहायता को चुकाने की आवश्यकता नहीं होगी और ये बिना किसी शर्त के दी जा रही है. नेपाल में सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल लोगों सहित प्रमुख राजनीतिक दल इस बात पर विभाजित थे कि इस अनुदान राशि को स्वीकार किया जाए या नहीं और इसी उधेड़बुन में पांच साल बीत गए.
इस साल फरवरी में अमेरिका ने कहा कि उसका मानना है कि चीन ने 500 मिलियन डॉलर की इस अमेरिकी अनुदान परियोजना के खिलाफ नेपाल में एक दुष्प्रचार अभियान को सक्रिय रूप से उकसाया था. साथ ही अमेरिका ने नेपाल को चेतावनी दी थी कि इस साल 28 फ़रवरी तक अमेरिका के साथ अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में विफल रहने या उससे पीछे हटने का असर अमेरिका-नेपाल द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा.
इसके बाद नेपाल की संसद ने इस अनुदान को मंज़ूरी दे दी थी.
एक अंदाज़ा ये भी लगाया जा रहा है कि नेपाल में अमेरिकी प्रभाव को बढ़ने से रोकना चीन के लिए एक प्राथमिकता बन गया है और नेपाल को दिया जा रहा ये नवीनतम अनुदान इसी दिशा में एक क़दम है.

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क्या हैं भारत के लिए मायने?
भारत, नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव से अनजान नहीं है. यही वजह है कि कई क्षेत्रों में भारत नेपाल की सहायता करता रहा है और नेपाल में अपनी पैठ बनाये रखने की कोशिशें करता रहा है.
प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी पांच बार नेपाल की आधिकारिक यात्रा पर जा चुके हैं.
भारतीय कंपनियां नेपाल में सबसे बड़े निवेशकों में से हैं और उनका हिस्सा नेपाल की कुल एफ़डीआई स्टॉक के 33 फीसदी से ज़्यादा है. नेपाल में लगभग 150 भारतीय उद्यम निर्माण, सेवा (बैंकिंग, बीमा, ड्राई पोर्ट, शिक्षा और दूरसंचार), बिजली और पर्यटन उद्योगों में कार्यरत हैं.
तो ऐसी स्थिति में चीन और नेपाल के बीच बढ़ते सहयोग के भारत के लिए क्या मायने हैं?
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डॉक्टर अलका आचार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के पूर्वी एशियाई अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर हैं और चीन से जुड़े मामलों की विशेषज्ञ हैं.
उनका कहना है कि जहां तक नेपाल और अन्य दक्षिण एशियाई देशों को चीन की सहायता, निवेश और अन्य प्रकार की वित्तीय सहायता का संबंध है, उसमें कुछ भी असामान्य नहीं है.
वे कहती हैं, "यह बिल्कुल स्पष्ट है कि चीनी अपना प्रभाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उनके पास आवश्यक धन और संसाधन हैं और वे परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के मामले में कहीं अधिक प्रभावी हैं. भारत के मामले में क्या होता है कि आम तौर पर परियोजनाओं में बहुत अधिक देरी होती है और चीज़ें रुक जाती हैं. चीन को इस बात का फ़ायदा मिलता है कि वो अपने किए हुए समझौतों को पूरा कर पाता है. तो भारत के प्रभाव पर इसका निश्चित रूप से असर पड़ता है."
प्रोफ़ेसर आचार्य कहती हैं कि इस स्थिति को एक देश के फ़ायदे और दूसरे देश के नुक़सान के तौर पर देखना बंद कर देना चाहिए. वे कहती हैं, "चीन एक बड़ा खिलाड़ी है यह बहुत स्पष्ट है लेकिन हर चीज़ को ज़ीरो-सम टर्म्स में नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि आखिरकार यह हमारे पड़ोसियों का भी सवाल है कि वे अपने विकास और आधुनिकीकरण के एजेंडे के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं और चीन उन्हें ऐसी चीज़ें दे रहा है जो भारत नहीं कर सकता. भारत को यह देखने की ज़रूरत है कि अपने पड़ोसियों के लिए वो अपने योगदान के बारे में क्या कर सकता है."

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एक चीन नीति
नेपाल के विदेश मंत्री की चीन यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलु था चीन के "एक चीन सिद्धांत" को नेपाल का समर्थन मिलना.
चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार अपनी चीन यात्रा के दौरान नेपाल के विदेश मंत्री खड़का ने दोहराया कि नेपाल दृढ़ता से एक-चीन सिद्धांत का पालन करता है और कभी भी ऐसी किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं देगा जो चीन का विरोध करने और चीन के हितों को कमज़ोर करने के लिए नेपाल के क्षेत्र का उपयोग करे.
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि नेपाल इस प्रतिबद्धता का डटकर सम्मान करेगा और ये भी कहा कि नेपाल "ज़िज़ांग, शिनजियांग, हॉन्गकॉन्ग और अन्य आंतरिक मामलों पर चीन की वैध स्थिति का समर्थन करता है".
एक चीन नीति चीन के उस रुख़ की राजनयिक स्वीकृति है कि केवल एक चीनी सरकार है. इस नीति के तहत अमेरिका ताइवान के द्वीप के बजाय चीन के साथ औपचारिक संबंध रखता है. चीन ताइवान को एक अलग प्रान्त के रूप में देखता है जिसे वो चीन की मुख्य भूमि के साथ फिर से जोड़ना चाहता है.
एक चीन नीति चीन-अमेरिका संबंधों की एक प्रमुख आधारशिला है. यह चीनी नीति-निर्माण और कूटनीति का एक मूलभूत आधार भी है. हालांकि यह "एक चीन सिद्धांत" से अलग है जिसके तहत चीन ज़ोर देकर कहता है कि ताइवान चीन का एक अविभाज्य हिस्सा है जिसे एक दिन फिर से चीन के साथ एक होना है.
हाल ही में चीन ने अमेरिका की हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी की दो दिवसीय ताइवान यात्रा का विरोध किया था. अपनी ताइवान यात्रा के दौरान पेलोसी ने ताइवान की राष्ट्रपति के साथ मुलाक़ात की और चीन से ख़तरों का सामना करने के लिए स्व-शासित द्वीप पर लोकतंत्र को संरक्षित करने का संकल्प लिया था.
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जिस समय पेलोसी ताइवान की यात्रा पर थीं और एक कूटनीतिक संकट उभरता दिख रहा था, उस समय भारत ने इस विषय पर कुछ भी कहने से परहेज़ किया था.
आख़िरकार 12 अगस्त को मीडिया से बात करते हुए भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "कई अन्य देशों की तरह भारत भी हाल के घटनाक्रमों से चिंतित है. हम संयम बरतने, यथास्थिति को बदलने के लिए एकतरफ़ा कार्रवाई से बचने, तनाव कम करने और क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों का आग्रह करते हैं. भारत की प्रासंगिक नीतियां साफ़ और सुसंगत हैं. उन्हें पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं है."
प्रोफेसर अलका आचार्य कहती हैं, "पेलोसी के दौरे के वक़्त जो कुछ भी हो रहा था उसके बारे में विदेश मंत्रालय की ओर से कोई बयान नहीं आया. पाकिस्तान जैसे कुछ देशों ने खुला बयान दिया है. लेकिन अन्य देशों ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है जो चीन के हित के ख़िलाफ़ हो. हर देश वन-चाइना सिद्धांत का समर्थन कर रहा है क्योंकि वे समझते हैं कि इससे क्षेत्र में बहुत अधिक तनाव पैदा होने की संभावना है."
प्रोफ़ेसर आचार्य कहती हैं कि चीन हमेशा अपने सभी भागीदारों और जिन देश के साथ बातचीत करता है उनसे इस तरह का आश्वासन लेने पर ज़ोर देता है.

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भारत के लिए ख़तरे की घंटी?
क्या नेपाल और चीन के बीच की बढ़ती नज़दीकियां भारत के लिए ख़तरे की घंटी है?
प्रोफ़ेसर आचार्य कहती हैं कि इन दोनों देशों के बीच नज़दीकियां आज ही नहीं पिछले कई सालों से बढ़ रही हैं.
उनके मुताबिक़, एक ऐसे समय में जब चीन-भारत संबंधों में तनाव है, तब भारत के पडोसी देशों की चीन से बढ़ती नज़दीकी और भी अधिक प्रमुखता से दिखती है. इसी तरह जब भारत और चीन के सम्बन्ध सुचारू रूप से चल रहे होते हैं तो इन बातों से कोई खास तनाव पैदा नहीं होता.
वो कहती हैं कि चीन की नेपाल में बढ़ती भूमिका को देखकर भारत भी नेपाल में अपने क़दम जमाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करेगा. "यह बहुत कुछ नेपाल के लोगों की ज़रूरतों और मांगों को वास्तव में पूरा करने की भारत की क्षमता पर भी निर्भर करता है."
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