नए चीफ़ जस्टिस उदय उमेश ललित को कितना जानते हैं आप

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- Author, सुचित्र मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
जस्टिस उदय उमेश ललित ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ ले ली. उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में शपथ दिलाई.
सुप्रीम कोर्ट के 49वें मुख्य न्यायधीश बने जस्टिस ललित इस पद पर 8 नवंबर 2022 तक रहेंगे.
जस्टिस उदय उमेश ललित भारत के दूसरे ऐसे चीफ़ जस्टिस हैं जो सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज के पद पर नियुक्त हुए थे.
उनसे पहले मरहूम जस्टिस एसएम सिकरी प्रैक्टिस की दुनिया से सीधे सुप्रीम कोर्ट जज बने और बाद में चीफ़ जस्टिस के ओहदे तक पहुंचे.
जस्टिस सिकरी से पहले बार में प्रैक्टिस करने वाले किसी वकील को न तो सीधे सुप्रीम कोर्ट जज और न ही चीफ़ जस्टिस के पद पर नियुक्त किया गया था.
जस्टिस सिकरी भारत के 13वें प्रधान न्यायाधीश थे और वे इस पद पर जनवरी, 1971 से अप्रैल, 1973 तक रहे थे. उन्हें फरवरी, 1964 में सुप्रीम कोर्ट जज के पद पर नियुक्त किया गया था.
जस्टिस यूयू ललित 13 अगस्त, 2014 को सुप्रीम कोर्ट जज बने थे और वे 27 अगस्त, 2022 को मौजूदा चीफ़ जस्टिस एनवी रमन्ना की जगह पर देश के 49वें प्रधान न्यायाधीश बनेंगे.
हालांकि उनका कार्यकाल 73 दिनों का ही रहेगा और वे 8 नवंबर, 2022 तक पद पर रहेंगे. सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की रिटायरमेंट की उम्र 65 साल होती है.

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मुक़दमे जिनकी सुनवाई से जस्टिस ललित अलग हुए
ऐसे मुक़दमों की एक लंबी फेहरिस्त है.
जस्टिस यूयू ललित ने कई मामलों की सुनवाई से खुद को अलग किया है और इसकी वजह 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट' बताई गई.
किसी जज के लिए 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट' का मतलब होता है कि मुक़दमे की एक पार्टी से कोई पुराना सरोकार.
इनमें अयोध्या विवाद, मुंबई ब्लास्ट केस, मृत्युदंड की सज़ा को चुनौती देने वाली याकूब मेनन की पुनर्विचार याचिका, शिक्षक भर्ती घोटाले में ओम प्रकाश चौटाला की याचिका और सूर्यानेल्ली रेप केस की अपील याचिका पर सुनवाई जैसे मामले प्रमुख हैं.

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याकूब मेनन से लेकर अयोध्या केस तक
- साल 2014 में जस्टिस ललित याकूब मेनन की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई से अलग हो गए थे. मुंबई सीरियल ब्लास्ट केस में मृत्युदंड की सज़ा को बरकरार रखने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ याकून मेनन ने ये पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी.
- साल 2015 में मालेगांव ब्लास्ट केस से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई से उन्होंने खुद को अलग कर लिया था, क्योंकि उन्होंने जज बनने से पहले एक अभियुक्त की पैरवी की थी.
- 2016 में उन्होंने एक और मामले से ख़ुद को अलग किया था. वो मामला आसाराम बापू पर लगे आरोपों की चल रही जांच में एक अहम गवाह के लापता होने की मांग करने से जुड़ा था.
- 2016 में ही उन्होंने शिक्षक भर्ती घोटाले के अभियुक्त हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चैटाला की याचिका की सुनवाई से भी ख़ुद को अलग कर लिया था.
- 2017 में उन्होंने सूर्यनेली रेप केस की भी सुनवाई से इसलिए अलग कर लिया था कि उन्होंने उस मामले के एक अभियुक्त की पहले पैरवी की थी.
- 2018 में उन्होंने मालेगांव ब्लास्ट केस के एक अभियुक्त की एक याचिका जिसमें कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा किए गए कथित उत्पीड़न की जांच की मांग की गई थी, से भी ख़ुद को अलग कर लिया था.
- 2019 में अयोध्या मामले पर बनी सांविधानिक पीठ से भी ख़ुद को उन्होंने अलग कर लिया था.

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हाईकोर्ट में वकालत
साल 1957 में पैदा हुए जस्टिस ललित ने 1983 में बॉम्बे हाई कोर्ट से अपनी वकालत की प्रैक्टिस शुरू की थी. वहां उन्होंने दिसंबर 1985 तक वकालत की थी.
1986 से 1992 के बीच वो पूर्व सॉलिसिटर जनरल सोली सोराबजी के साथ काम किया. उसके बाद अप्रैल 2004 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट नियुक्त किया गया.
बहुचर्चित 2जी घोटाले के सभी मामलों में ट्रायल चलाने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो की मदद के लिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर नियुक्त किया था.
वकील के रूप में जस्टिस ललित क्रिमिनल लॉ के विशेषज्ञ रहे हैं. उन्हें राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण यानी नालसा का कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया गया था.

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बतौर जज यूयू ललित के दिए प्रमुख फैसले
तीन तलाक़ की वैधता पर सुनवाई करने वाली संविधान पीठ का वो भी एक हिस्सा थे. उन्होंने इसे खारिज़ करते हुए कहा था कि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत दिए गए मूल अधिकार का उल्लंघन करता है.
जस्टिस ललित ने अनुसूचित जाति और जनजातियों के उत्पीड़न रोकने वाले 1989 के क़ानून का दुरुपयोग रोकने के लिए कई उपायों की व्यवस्था की. काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र मामले में जस्टिस आदर्श गोयल के साथ मिलकर उन्होंने इस मामले में होने वाली एफआईआर के पहले होने वाली जांच की प्रक्रिया तय की.
उन्होंने गिरफ्तारी के पहले जांच अधिकारी को मंजूरी लेने का आदेश सुनाया. साथ ही इन मामलों में अग्रिम ज़मानत देने का प्रावधान भी उन्होंने किया.
पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई और जस्टिस कुरियन जोसेफ के साथ मिलकर रंजना कुमारी बनाम उत्तराखंड सरकार मामले में उन्होंने कहा कि किसी दूसरे राज्य से आने वाले प्रवासियों को नए राज्य में सिर्फ इसलिए एससी के तौर पर नहीं पहचाना जा सकता कि पहले के राज्य में उनकी जाति को एससी के रूप में मान्यता मिली हुई थी.
वहीं प्रद्युम्न बिष्ट केस में जस्टिस आदर्श गोयल के साथ मिलकर जस्टिस ललित ने हर राज्य के दो ज़िलों की अदालतों के भीतर और अदालत परिसर के महत्वपूर्ण जगहों पर बिना किसी ऑडियो रिकार्डिंग वाले सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दिए.

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हालांकि उन्होंने आदेश दिया कि इन रिकॉर्डिंग्स को सूचना का अधिकार कानून के तहत नहीं मांगा जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट के दो सदस्यों वाली पीठ के एक सदस्य के रूप में जस्टिस ललित ने हिंदू विवाह कानून की धारा 13बी2 के तहत आपसी सहमति से तलाक़ लेने के लिए छह महीने की प्रतीक्षा अवधि अनिवार्य नहीं है. अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर मामले में इस पीठ ने फैसला दिया कि कई मामलों में छह महीने की इस अवधि को ख़त्म किया जा सकता है.
जस्टिस ललित ने अदालत की अवमानना के मामले में भगोड़े शराब निर्माता विजय माल्या को 4 महीने की जेल और 2,000 रुपए का जुर्माना देने का आदेश भी सुनाया.
अब से कुछ हफ्ते पहले जस्टिस ललित ने अदालत की कार्यवाही और पहले शुरू करने का सुझाव दिया था. उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई सुबह 9.30 बजे से 11.30 बजे तक होनी चाहिए और फिर आधे घंटे का ब्रेक होना चाहिए. उनके अनुसार, फिर 12 बजे से लेकर दोपहर बाद 2 बजे तक सुनवाई होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि इससे शाम में और चीज़ें करने का वक्त मिल जाएगा.
पिछले महीने एक सुनवाई के दौरान जस्टिस ललित ने कहा कि यदि बच्चे सुबह सात बजे स्कूल जा सकते हैं, तो जज और वकील नौ बजे सुबह अपना काम क्यों शुरू नहीं कर सकते.
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