चीफ़ जस्टिस रमन्ना पीएम मोदी और मुख्यमंत्रियों के सामने बोले- सभी अपनी 'लक्ष्मण रेखा' का ख़याल रखें

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भारत के चीफ़ जस्टिस एनवी रमन्ना ने कहा है कि कई बार कोर्ट के फ़ैसले सरकार सालों साल तक लागू नहीं करती. जानबूझ कर कोर्ट के ऑर्डर पर कार्रवाई ना करना देश के लिए ठीक नहीं है. कई बार कानून विभाग की सुझाव और राय को एक्जीक्यूटिव नज़रअंदाज़ करके फ़ैसले ले लेते हैं.
दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित 11वें मुख्यमंत्री और मुख्य न्यायधीशों की कॉन्फ्रेंस में देश के चीफ़ जस्टिस ने ये बात कही.
इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कानून मंत्री किरेन रिजीजू, राज्यों के मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट के जस्टिस, ट्रिब्यूनल के प्रमुख और तमाम न्यायिक अधिकारी शामिल हुए.
मंच से अपनी बात रखते हुए जस्टिस रमन्ना ने कहा, "संविधान में विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की ज़िम्मेदारियों को विस्तार से बांटा गया है. हमें अपनी 'लक्ष्मण रेखा' का ख्याल रखना चाहिए. अगर गवर्नेंस का कामकाज कानून के मुताबिक़ हो तो न्यायपालिका कभी उसके रास्ते में नहीं आएगी. अगर नगरपालिका, ग्राम पंचायत अपने कर्तव्यों का ठीक से निर्वहन करें, पुलिस उचित तरीके से केस की जांच करे और ग़ैर-क़ानूनी कस्टोडियल प्रताड़ना या मौतें ना हों तो लोगों को कोर्ट आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."
'सरकार कोर्ट के फ़ैसले सालों तक लागू नहीं करती'
सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए जस्टिस रमन्ना ने कहा, "अदालत के फ़ैसले सरकार की ओर से सालों-साल लागू नहीं किए जाते हैं. न्यायिक घोषणाओं के बावजूद जानबूझकर सरकार की ओर से निष्क्रियता देखी जाती है जो देश के लिए अच्छा नहीं है. हालांकि पॉलिसी बनाना हमारा अधिकार क्षेत्र नहीं है, लेकिन अगर कोई नागरिक अपनी शिकायत लेकर हमारे पास आता है तो अदालत मुंह नहीं मोड़ कर सकती."
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उन्होंने न्यायपालिका पर पड़ते बोझ को भी एक बड़ी समस्या बताया, इसके साथ ही उन्होंने कहा कि क़ानून बनाते समय उससे प्रभावित होने वालों को ध्यान में रखना ज़रूरी है.
जस्टिस रमन्ना ने कहा, "गहन बहस और चर्चा के बाद कानून बनाया जाना चाहिए. इससे संबंधित लोगों की जरूरतों और आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए फ़ैसले लिए जाने चाहिए. अक्सर कार्यपालकों के ग़ैर-प्रदर्शन और विधायिकाओं की निष्क्रियता के कारण मामले मुकदमेबाज़ी तक पहुंचते हैं जो कि टाले जा सकते हैं, इससे न्यायपालिका पर बोझ कम पड़ेगा."

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केंद्र के कई क़ानून रद्द करने के बाद भी राज्यों ने नहीं किया- मोदी
चीफ़ जस्टिस के व्याख्यान के बाद मंच से पीएम नरेंद्र मोदी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि 2015 में केंद्र सरकार ने लगभग 1800 क़ानूनों की पहचान की जो अप्रासंगिक हो गए थे. इनमें से केंद्र ने 1450 क़ानूनों को खत्म कर दिया लेकिन राज्यों ने अब तक केवल 75 क़ानूनों को ख़त्म किया है.
समारोह में शामिल मुख्यमंत्रियों, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीशों और न्यायिक अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि "हम न्यायिक व्यवस्था में सुधार के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. हम न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार और बेहतरी के लिए भी काम कर रहे हैं."
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"भारत सरकार न्यायिक प्रणाली में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को डिजिटल इंडिया मिशन का एक अनिवार्य हिस्सा मानती है. ई-कोर्ट परियोजना आज मिशन की तरह लागू की जा रही है. "
पीएम मोदी ने कहा कि हमें अदालतों में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देना चाहिए. इससे देश के आम नागरिकों का न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा.
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