कौन हैं वो चार जज जिन्होंने चीफ़ जस्टिस पर सवाल उठाए

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सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने इतिहास में पहली बार देश के सामने आकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही अनियमितताओं को लेकर सवांददाता सम्मेलन किया है.
इन जज़ों में जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ शामिल हैं.
जस्टिस जे चेलमेश्वर
आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले में 23 जुलाई, 1953 को पैदा होने वाले जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर ने दक्षिण भारत के प्रतिष्ठित मद्रास लोयला कॉलेज से भौतिकी विषय से स्नातक की पढ़ाई की.
इसके बाद आंध्र विश्वविद्यालय से 1976 में क़ानून की पढ़ाई की. इसके बाद 13 अक्टूबर, 1995 में चेलमेश्वर एडिशनल एडवोकेट जनरल बने. इसके बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट में प्रधान न्यायाधीश की भूमिका निभाने के बाद साल 2011 में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने.

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जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस आर एफ़ नरीमन की बेंच ने साल 2012 में धारा 66 ए को असंवैधानिक करार देते हुए देश में बोलने की आज़ादी को लेकर एक बड़ा फ़ैसला दिया था.
जस्टिस रंजन गोगोई
18 नवंबर, 1954 में पैदा होने वाले जस्टिस रंजन गोगोई 1978 में वकील बने. गुवाहाटी हाईकोर्ट में लंबे समय तक वकालत करने के बाद 28 फरवरी 2001 को वह गुवाहाटी हाईकोर्ट में स्थाई जज के रूप में नियुक्त हुए.
इसके बाद 9 सितंबर 2010 को उनका तबादला पंजाब - हरियाणा हाईकोर्ट में हुआ. और, 23 अप्रैल 2012 को वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने.
जस्टिस रंजन गोगोई उस बैंच में शामिल रहे हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू को सौम्या मर्डर केस पर ब्लॉग लिखने के संबंध में निजी तौर पर अदालत में पेश होने के लिए कहा था.
न्यायमूर्ति पी सदाशिवम् और रंजन गोगोई ने कहा था, "हालांकि कानून में साफ तौर पर ये कहा गया है कि जन प्रतिनिधित्व (आरपी) अधिनियम की धारा 123 के तहत चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वायदे 'भ्रष्टाचार' की श्रेणी में नहीं आते. मगर हम इस हक़ीकत से इनकार नहीं कर सकते कि किसी भी तरह का मुफ्त उपहार बेशक लोगों को प्रभावित करता है. यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ों को गहरा नुकसान पहुंचाता है."
जस्टिस मदन भीमराव लोकुर
जस्टिस मदन भीमराव लोकुर का जन्म 31 दिसंबर 1953 को हुआ था. जस्टिस लोकुर ने दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से पढ़ाई की और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के सैंट स्टीफ़न कॉलेज से इतिहास में स्नातक करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही 1977 में एलएलबी की डिग्री हासिल की.
उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत की. वो 1981 में परीक्षा पास करके सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड में पंजीकृत हुए.
उन्हें सिविल लॉ, क्रिमनल लॉ, कांस्टीट्यूशनल लॉ और रिवेन्यू एंड सर्विस लॉ में विशेषज्ञता हासिल है.

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वे दिसंबर 1990 से 1996 तक केंद्र सरकार के अधिवक्ता भी रहे और केंद्र सरकार के लिए तमाम तरह के मुक़दमों की पैरवी की. 1997 में वो वरिष्ठ वकील नियुक्त कर दिए गए.
उन्हें 4 जून 2012 को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था. जस्टिस लोकुर और उदय ललित की बेंच ने जुलाई 2017 में सीबीआई को बीते एक दशक में मणिपुर में हुए एनकाउंटरों की जांच करने का आदेश दिया था.
जस्टिस कुरियन जोसेफ़
जस्टिस कुरियन का जन्म 30 नवंबर 1953 में केरल में हुआ था. इन्होंने केरल लॉ एकेडमी लॉ कॉलेज से तिरुवनंतपुरम से क़ानून की पढ़ाई की थी. 1977-78 में वो केरल यूनिवर्सिटी में एकेडमिक काउंसिल के सदस्य बने.
1983-85 तक कोच्चि यूनिवर्सिटी के सीनेट मेंबर रहे. 1979 से केरल हाई कोर्ट से वक़ालत शुरू करने वाले कुरियन 1987 में सरकारी वक़ील बने और 1994-96 तक एडिशनल जनरल एकवोकेट रहे.
1996 में वो सीनियर वक़ील बने और 12 जुलाई 2000 को केरल हाई कोर्ट में जज बने.

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2006 से 2008 के बीच वो केरल न्यायिक अकादमी के अध्यक्ष रहे. 2008 में वो लक्षद्वीप लीगल सर्विस अथॉरिटी के अध्यक्ष बने.
इसके बाद वह आठ फ़रवरी, 2010 से 7 मार्च, 2013 तक हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के वो मुख्य न्यायधीश रहे. आठ मार्च, 2013 को जस्टिस कुरियन सुप्रीम कोर्ट में जज बने. वह 29 नवंबर, 2018 को रिटायर होंगे.
कुरियन पांच जजों की उस बेंच का हिस्सा रहे हैं जिन्होंने तीन तलाक़ के मुद्दे पर अपना फ़ैसला सुनाया था.
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