पार्थ चटर्जी: एसएससी स्कैम में फंसने वाले नेता जिन्हें ममता बनर्जी का बेहद क़रीबी माना जाता है

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
कल तक ममता बनर्जी सरकार में नंबर दो और टीएमसी में नंबर तीन कहे जाने वाले पार्थ का राजनीतिक करियर फ़र्श से अर्श और फिर अर्श से फ़र्श तक पहुंचने की मिसाल है.
बंगाल में हाल के वर्षों में किसी राजनेता के करियर के इस तरह 360 डिग्री घूमने की कोई मिसाल नहीं मिलती.
राजनीतिक करियर की मौजूदा ऊंचाई तक पहुंचने में उनको लंबा समय लगा था. लेकिन अर्श से फ़र्श तक पहुंचने में महज 24 घंटे का ही समय लगा.
पार्टी और उसकी प्रमुख ममता बनर्जी के लिए उनकी अहमियत को इसी बात से समझा जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस में महासचिव का पद ख़ासतौर पर पार्थ के लिए ही बनाया गया था.
लेकिन अब मंत्रिमंडल से तो हटा ही दिया गया है, पार्टी के तमाम पदों से भी हटा कर फ़िलहाल निलंबित कर दिया गया है.
और जानकारों की मानें तो अब पार्थ की वापसी असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल ज़रूर हो गयी है.

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पुरानी मिसालें कितनी अहम
राजनीतिक विश्लेषक इसके लिए तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं की मिसाल देते हैं.
ममता के बेहद क़रीबी शोभन चटर्जी तो कोलकाता नगर निगम के मेयर के अलावा मंत्रिमंडल के अहम सदस्य भी थे. लेकिन विवाहेतर संबंधों के कारण ही ममता ने उनको सरकार से भी हटाया और निगम से भी. उसके बाद शोभन भाजपा में गए थे. लेकिन उनका राजनीतिक करियर लगभग ख़त्म ही हो गया.
इसी तरह ममता के नंबर दो रहे मुकुल रॉय भी सारदा चिटफंड घोटाले में फंसे थे. उसके बाद ममता से दूरियां बढ़ती रहीं और बाद में वे भाजपा में शामिल हो गए. हालांकि बीते साल वे तृणमूल में जरूर लौटे, लेकिन अब उनका वह जलवा नहीं रहा.
ममता के एक अन्य क़रीबी मदन मित्र भी चिटफंड घोटाले के सिलसिले में गिरफ़्तारी के बाद लंबे अरसे तक जेल में रहे थे. लेकिन ज़मानत पर बाहर निकलने के बाद वे भी फ़िलहाल तृणमूल में हाशिए पर ही हैं.
विश्लेषक प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं, "बाकी नेताओं के मामले में ममता और पार्टी के दूसरे नेता ईडी और सीबीआई की कार्रवाई को बदले की कार्रवाई कहकर उनका बचाव करते थे. पार्थ के मामले में भी ऐसा ही होता. लेकिन महिला मित्र अर्पिता के साथ उनके संबंधों के ख़ुलासे और 50 करोड़ से ज्यादा की नक़दी की बरामदगी ने एक झटके में उनके राजनीतिक करियर पर पूर्ण विराम लगा दिया है."

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फर्श से अर्श तक पहुंचने की कहानी
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और पार्थ का रिश्ता कई दशक पुराना है. उन्होंने भी साठ के दशक में ममता के साथ ही कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी.
वह सुब्रत मुखर्जी और प्रियरंजन दासमुंशी जैसे तत्कालीन तेज़ तर्रार युवा नेताओं से प्रेरित थे. लेकिन कॉलेज की पढ़ाई के बाद कॉरपोरेट नौकरी चुनने की वजह से तब उनके राजनीतिक करियर में कुछ समय के लिए विराम लग गया था.
छह अक्तूबर, 1952 को कोलकाता में पैदा होने वाले पार्थ ने रामकृष्ण मिशन विद्यालय, नरेंद्रपुर से स्कूली शिक्षा पूरी की थी. उसके बाद उन्होंने महानगर के आशुतोष कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई पूरी की.
कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमबीए की डिग्री हासिल करने के बाद पार्थ ने सत्तर के दशक में बहुराष्ट्रीय कंपनी एंड्रयू यूल के साथ काम शुरू किया और कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते हुए महाप्रबंधक के पद तक पहुंच गए थे.
लेकिन ममता बनर्जी ने वर्ष 1998 में जब कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया तो अपनी हाई प्रोफ़ाइल नौकरी छोड़ कर पार्थ एक बार फिर सक्रिय राजनीति में उतर आए. तृणमूल की स्थापना के समय से ही वह ममता के करीबियों में शुमार होने लगे थे.

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लगातार पांच बार बन चुके हैं विधायक
पार्थ चटर्जी महानगर की बेहला पश्चिम विधानसभा सीट से वर्ष 2001 से ही लगातार पांच बार चुने जा चुके हैं. लेकिन वर्ष 2006-07 के दौरान नंदीग्राम और सिंगूर के ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों में सक्रियता के कारण उनके करियर का ग्राफ़ तेज़ी से चढ़ा और पार्टी में भी उनका कद काफ़ी बढ़ गया.
वर्ष 2006 के विधानसभा चुनाव के बाद ममता ने उनको विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया और इसके साल भर बाद यानी वर्ष 2007 में पार्टी में पार्थ के लिए ही महासचिव का पद बनाया गया. सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान पार्थ विधानसभा में वाममोर्चा सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष की मजबूत आवाज़ के तौर पर उभरे थे.
चार साल बाद तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने पर ममता ने पार्थ को उद्योग और संसदीय मामलों का मंत्रालय सौंपा. तीन साल बाद यानी वर्ष 2014 में एक फेरबदल के तहत उनको उद्योग मंत्रालय से हटाकर शिक्षा मंत्रालय का ज़िम्मा सौंपा गया. वर्ष 2011 से इस सप्ताह हटाए जाने तक पार्थ लगातार ममता बनर्जी की तीनों सरकार में बने रहे थे.
पार्टी में ऐसे नेताओं की तादाद अंगुलियों पर गिनी जा सकती है जिनको ममता सम्मान के साथ दादा यानी बड़ा भाई कहती थी. उनमें सुब्रत मुखर्जी और मुकुल राय के अलावा पार्थ चटर्जी ही शामिल थे.

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भ्रष्टाचार के छींटे
वैसे तो पार्थ चटर्जी के दामन पर भ्रष्टाचार के छींटे वर्ष 2016 में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली दूसरी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही पड़ने लगे थे.
उसी साल एसएससी ने शिक्षण और ग़ैर-शिक्षण पदों पर नियुक्ति के लिए परीक्षा आयोजित की थी जिसका नतीजा 2017 के नवंबर में निकला था. उसके कुछ महीनों बाद ही विपक्षी दलों ने पार्थ को यह कह करके घेरना शुरू किया कि उन्होंने पैसे लेकर सैकड़ों अयोग्य लोगों को नौकरियां दी हैं जबकि योग्य लोग सड़कों की धूल फांक रहे हैं.
इसके अलावा चिटफ़ंड घोटाले के सिलसिले में भी सीबीआई ने उनसे पूछताछ की थी. लेकिन तब ममता ने इसे केंद्र की ओर से बदले की भावना से की गई राजनीतिक कार्रवाई बताया था.
दिलचस्प बात यह है कि पार्थ चटर्जी ने चुनाव आयोग को दिए अपने हलफ़नामे में बताया था कि उनके पास कुल मिलाकर लगभग एक करोड़ की संपत्ति है. इसमें कहा गया था कि उनके पास अपना मकान या कार नहीं है और वे पैतृक मकान में रहते हैं. लेकिन अब उनकी महिला मित्र अर्पिता चटर्जी के घर से मिली करोड़ों की रक़म ने तस्वीर ही बदल दी है.
ईडी ने अर्पिता के हवाले दावा किया है कि यह पूरी रक़म पार्थ चटर्जी की है.

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राजनीतिक सफर पर संकट के बादल
यही वजह है कि शुरुआत के कुछ दिनो तक बचाव की मुद्रा में नजर आ रही ममता बनर्जी ने उनको अचानक सरकार से तो हटा ही दिया है, पार्टी से भी जांच पूरी होने तक तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया है.
पश्चिम बंगाल की राजनीति को दशकों तक बेहद क़रीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "पार्थ के कारनामे ने ममता और तृणमूल कांग्रेस को तो झटका दिया ही है, अब पार्थ का राजनीतिक करियर भी लगभग ख़त्म कर दी है. वे ऐसे मुक़ाम पर पहुंच गए हैं जहां से वापसी की राह बहुत कठिन है. ईडी की कार्रवाई ने चौबीसों घंटे छाया की तरह ममता के साथ नज़र आने वाले पार्थ का असली चेहरा दिन के उजाले में साफ़ कर दिया है."
अभी एक सप्ताह पहले तक पश्चिम बंगाल के बाहर बहुत कम लोग ही पार्थ चटर्जी का नाम जानते थे. उन्होंने अपनी दो दशक से ज़्यादा लंबी राजनीतिक पारी इसी राज्य में खेली थी. मुकुल रॉय और दिनेश त्रिवेदी या महुआ मित्रा जैसे तृणमूल कांग्रेस के बाक़ी नेताओं की तरह वो न तो कभी सांसद बने और न ही केंद्र की राजनीति में गए.
लेकिन अब स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) के कथित घोटाले की जांच कर रही ईडी के हाथों उनकी गिरफ़़्तारी और उनकी क़रीबी महिला अर्पिता मुखर्जी के घर से 50 करोड़ से ज़्यादा कैश की बरामदगी ने पार्थ को न सिर्फ़ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवांछित सुर्खियां दिला दी है.
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