द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने के पीछे की बीजेपी की रणनीति क्या है?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
संथाल भारत के सबसे पुराने और सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक हैं.
भारत को आज़ादी के 75 साल बाद द्रौपदी मुर्मू के रूप में पहली आदिवासी राष्ट्रपति मिली हैं. वो संथाल समुदाय से आती हैं.
भील और गोंड के बाद संथाल जनजाति की आबादी आदिवासियों में सबसे ज़्यादा है.
2011 की जनगणना के मुताबिक़ भारत में साढ़े आठ फ़ीसदी से कुछ ज़्यादा आबादी आदिवासी है.
मिज़ोरम, नगालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश में राज्य की जनसंख्या में इनकी हिस्सेदारी 40 फ़ीसदी से ज़्यादा है.
वहीं मणिपुर, सिक्किम, त्रिपुरा और छत्तीसगढ़ में ये 30 फ़ीसदी हैं और मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा में इसकी आबादी 20 फ़ीसदी से ज़्यादा है.
भारत में लोकसभा की कुल सीटों में 47 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं.
इस वजह से माना जा रहा है कि द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना, भारतीय राजनीति में महज संयोग नहीं है.

आदिवासी पहचान

पहचान की राजनीति भारत की राजनीति में काफ़ी मायने रखती है.
वरिष्ठ पत्रकार निस्तुला हेब्बार कहती हैं, "जनसंख्या के हिसाब से आदिवासी भले ही 8-9 फ़ीसदी हों लेकिन ऐतिहासिक तौर पर देखें तो आज़ादी की लड़ाई से लेकर अब तक उन्होंने राजनीति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है. जैसे उदयपुर के राजा की सेना का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे भील आदिवासी. ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ भी सबसे पहले आवाज़ उठाने वालों में आदिवासी ही थे."

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सेंट जेवियर कॉलेज में रिसर्च डिपार्टमेंट के हेड केसी टुडू आदिवासियों और विशेषकर संथाल आदिवासी के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान का ज़िक्र करते हुए तिलका मांझी को याद करते हैं.
वो कहते हैं, "1857 की लड़ाई से तकरीबन 80 साल पहले उन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ धनुष बाण के साथ ही विद्रोह छेड़ दिया था. तिलका मांझी भी संथाल आदिवासी थे."
निस्तुला कहती हैं, "आज़ादी के बाद अपने लिए अलग राज्य की माँग करने वालों में आदिवासी ही आगे थे. सबसे पहले नगालैंड और झारखंड की माँग उठी थी लेकिन उस वक़्त उनकी सुनी नहीं गई. इस वजह से वो अपने प्रांतों तक सीमित रह गए. लेकिन वहीं से आदिवासियों का मध्य वर्ग पनपना शुरू हुआ, जिसमें द्रौपदी मुर्मू जैसे लोगों का परिवार भी था, जिन्होंने पढ़ाई-लिखाई पर ज़ोर दिया."
आदिवासियों के राजनीतिक रूप में हमेशा से सक्रिय रहने की ये छोटी सी कहानी है.
झारखंड राज्य के गठन के बाद से ये राजनीति और तेज़ हुई और रह-रह कर इसे अपने अपने हक़ में भुनाने की कोशिशें क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों में से सभी ने की.
यही वजह है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर द्रौपदी मुर्मू के नाम का विरोध पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भी नहीं कर पाईं और शिव सेना में भी उनके नाम पर टूट दिखाई दी. झारखंड में कांग्रेस गठबंधन के साथी हेमंत सोरेन को भी मजबूरी में यशवंत सिन्हा को छोड़ कर द्रौपदी मुर्मू के साथ जाना पड़ा और असम में भी क्रॉस वोटिंग देखने को मिली.
बीजेपी भी इसी वजह से अपने वोटबैंक के कुनबे को बढ़ाने में इनको और रिझाने में जुटी है.

आदिवासी वोट बैंक

आँकड़ों की बात करें तो 2014 के मुकाबले 2019 में बीजेपी ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में अपनी पैठ बेहतर की है.
पारंपरिक तौर पर ये कांग्रेस को पहले वोट करते थे.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में एसटी के लिए आरक्षित 47 लोकसभा सीटों में बीजेपी को 31 सीटें मिली और कांग्रेस को 4. बाकी क्षेत्रीय पार्टियों के खाते में गईं.

वहीं 2014 में बीजेपी के लिए ये आँकड़ा 27 सीटों का था और कांग्रेस ने पाँच सीटों पर जीत दर्ज की थी.
एससी सीटों के जीत-हार के इन्हीं आँकड़ो में छिपी है, बीजेपी की गेमप्लान की पूरी जानकारी.
बीजेपी के जीत का जो आँकड़ा 2014 के मुक़ाबले 2019 में बढ़ा था, उसमें से आधे सांसद दलित और आदिवासी समुदाय से जुड़े थे.
निस्तुला कहती हैं, "नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद और बीजेपी की कमान संभालने के बाद बीजेपी की लगातार कोशिश रही है कि उच्च वर्ग और सवर्णों की राजनीति का लगा टैग अपने ऊपर से हटाएं. पहले उन्होंने ओबीसी वोटों को साथ जोड़ने की कोशिश की, फिर दलितों को साथ जोड़ा, बीएसपी के वोट बैंक में सेंध मारी की. अब आदिवासी वोट बैंक की बारी है."

गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान कनेक्शन

उसी रणनीति का हिस्सा है राष्ट्रपति पद तक द्रौपदी मुर्मू का पहुँचना. आने वाले दिनों में गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव हैं.
वहाँ कांग्रेस आदिवासी इलाक़ों में अब तक अच्छा प्रदर्शन करती आई है. जैसे गुजरात में कांग्रेस के पास 27 में से 15 सीटें हैं, राजस्थान में 25 में से 13 कांग्रेस के पास है, छत्तीसगढ़ में 29 में से 27 कांग्रेस के पास है.
बीजेपी की नज़र इन्हीं सीटों पर है.

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हालांकि बीजेपी के कई नेता इससे इनकार करते हैं. ऐसे ही बीजेपी नेता हैं, जे बी तुबिद. तुबिद झारखंड के पूर्व गृह सचिव भी रह चुके हैं.
वह कहते हैं, "द्रौपदी मुर्मू के ज़रिए 'बीजेपी आदिवासी वोट बैंक को रिझाने की कोशिश कर रही है' इस लाइन में ही लोगों की संकीर्ण मानसिकता झलकती है. कोई भी कमज़ोर वर्ग का आदमी अपनी मेरिट से देश के शीर्ष पद पर पहुँचता है तो भी इस तरह के आरोप लगते हैं. जब वो गवर्नर थीं तब ये बात नहीं हुई, जब वो प्रदेश में मंत्री थीं तब ये बात क्यों नहीं उठी. जब ओडिशा में बेस्ट विधायक बनीं तब ये क्यों नहीं कहा गया."
तुबिद कहते हैं, "बीजेपी आज से नहीं हमेशा से आदिवासियों की हितैषी रही है. झारखंड अलग राज्य अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते बना. केंद्र में बीजेपी ने ही अलग जन-जातीय मंत्रालय गठित किया. बिरसा मुंडा के जन्मदिन को विश्व आदिवासी गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय बीजेपी ने ही लिया. बीजेपी का विचार परिवार है, संघ परिवार. संघ परिवार ने बहुत पहले से ही जन-जातीय क्षेत्रों में काम करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की. हमने सबसे पहले समझा की भारत के मूल वासी आदिवासी हैं. किसी दूसरी पार्टी में आदिवासियों के लिए ये कमिटमेंट आपने देखा है."
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