कर्नाटक में बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या : अपनी ही पार्टी से ख़फा क्यों है कार्यकर्ता

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- Author, इमरान कु़रैशी
- पदनाम, बेंगुलुरू से, बीबीसी हिंदी के लिए
शायद ही कोई मुख्यमंत्री अपनी सरकार का पहला साल पूरा होने की खुशी में होने वाले जश्न समारोहों को रद्द करना चाहेगा. कर्नाटक के सीएम वासवराज बोम्मई के मामले में ऐसी उम्मीद तो बेमानी ही होती. उनके लिए तो यह और भी ज़्यादा खुशी का मौका था क्योंकि उनके पिता सिर्फ़ आठ महीने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रह पाए थे. लेकिन वासवराज ने सरकार में एक साल पूरा कर लिया है.
कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता में आए तीन साल हो गए हैं. पहले दो साल बीएस येदियुरप्पा ने सरकार चलाई थी. तीसरे साल बोम्मई के हाथ में सत्ता आई.
बोम्मई ने अपनी सरकार के एक साल पूरा होने पर होने वाले आयोजन को रद्द करने का ऐलान अपने आवास पर आधी रात को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में किया. इसमें कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष नवीन कुमार कटील भी मौजूद थे.
वह उसी वक्त मेंगलुरू से बेंगलुरू लौटे थे. पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उन्हें उस अनुभव से गुज़रना पड़ा था, जिससे होकर अब तक राज्य का कोई बीजेपी अध्यक्ष नहीं गुज़रा था.
कटील को पार्टी कार्यकर्ताओं का भारी गुस्सा झेलना पड़ा था. कार्यकर्ता दक्षिण कर्नाटक जिले में सुलिया तालुक के बेल्लारे में स्थानीय बीजेपी की हत्या पर गुस्से से पागल थे. कार्यकर्ताओं ने पार्टी अध्यक्ष की कार का घेराव किया. वे उन पर चिल्ला रहे थे.
कार्यकर्ताओं का गुस्सा इतना बढ़ गया था कि उन्होंने कार को बुरी तरह हिलाना शुरू कर दिया. अगर कुछ कार्यकर्ताओं ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो कार पलट जाती. कुछ गुस्साए कार्यकर्ताओं ने उनकी कार के टायरों की हवा निकाल दी.
कार्यकर्ताओं ने की योगी मॉडल की मांग
बेल्लारे में चाकू घोंप कर मार डाले गए बीजेपी नेता प्रवीण नेत्तारू के अंतिम संस्कार और समर्थकों पर लाठी चार्ज के बाद कार्यकर्ताओं ने 'शोक के वक्त जश्न' का मैसेज सर्कुलेट करना शुरू कर दिया. ये मैसेज पार्टी कार्यकर्ताओं और मंत्रियों तक पहुंचने शुरू हुए.
बुधवार को बेल्लारे में हुए हंगामे के दौरान योगी आदित्यनाथ के समर्थन में नारे लग रहे थे. कार्यकर्ताओं का कहना था कि कर्नाटक में योगी मॉडल लागू हो.
बोम्मई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, '' उत्तर प्रदेश में हालात यहां से बहुत अलग हैं. वहां के लिए योगी जी बिल्कुल फिट हैं. कर्नाटक में हालात काबू करने के लिए हम हर तरीका अपना रहे हैं. अगर ज़रूरत पड़ी तो यहां भी हम गवर्नेंस का योगी मॉडल अपना सकते हैं'' .
नाम न छापने की शर्त पर बीजेपी कुछ नेताओं ने बीबीसी हिंदी से कहा,''अभी ये साफ़ नहीं है कि पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं ने उन्हें कार्यक्रम रद्द करने के लिए कहा था या नहीं, क्योंकि इसमें पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को शिरकत करनी थी.''हालांकि कल दोपहर सीएम ने खुद कहा था कि कार्यक्रम रद्द करने का फैसला उनका था. हालांकि वह चाहते थे कि इसे रदद् करने से पहले पार्टी सहयोगियों से मशविरा कर लिया जाए. ''
बीजेपी की सुलिया विधानसभा सीट के जनरल सेक्रेट्री राकेश राय ने बीबीसी हिंदी से कहा,'' पार्टी कार्यकर्ता इस घटना से काफी दुखी हैं. उनका मानना है कि किसी को भी प्रवीण नेत्तारू जैसे पार्टी कार्यकर्ताओं की हत्या की परवाह नहीं है. कार्यकर्ताओं का कहना है कांग्रेस की सरकार चली गई है. अब बीजेपी की सरकार है. लेकिन बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या का सिलसिला जारी है. ''

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पार्टी के ओबीसी कार्यकर्ताओं में नाराजगी
राय कहते हैं ''पार्टी के अंदर कुछ समूहों ने भी कार्यकर्ताओं को भड़काया है. इन लोगों का कहना है कि पिछले दिनों मारे गए मेंगलुरू के शरद माड़ीवाला, मूड़ाबिदरी के प्रवीण पुजारी और अब प्रवीण नेत्तारू जैसे बीजेपी कार्यकर्ता ओबीसी समुदाय के थे. उनका कहना है कि सिर्फ ओबीसी कार्यकर्ता मारे जा रहे हैं. ''
उन्होंने कहा,''बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या जारी है लेकिन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और एसडीपीआई जैसे संगठनों की गैरकानूनी गतिविधियों को काबू करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है.''
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव सी टी रवि ने रिपोर्टरों से कहा,'' हमारे कार्यकर्ताओं को दुख पहुंचा है. हमें यह सोचना होगा कि हम कैसे इस हालात से निपटें. हम चीजों हल्कों में नहीं ले सकते. हमें चिकमेंगलुरू और ऐसी ही जगहों से बीजेपी कार्यकर्ताओं के इस्तीफे़ मिल रहे हैं. हमें उनसे बात करने की ज़रूरत है.
बीजेपी के कार्यकर्ता पीएफआई और एसडीआईपी जैसे संगठनों पर बैन की मांग कर रहे हैं. लेकिन बोम्मई का कहना है कि केंद्र और दूसरे राज्यों के चाहने पर पर ही ये संभव है. इस दिशा में कोशिश हो रही है. शिमोगा में हर्षा और अन्य लोगों की हत्या के आरोपी पकड़े जा चुके हैं और अब उनके ख़िलाफ़ अदालती कार्रवाई चल रही है.

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कर्नाटक में बीजेपी का मौजूदा संकट क्या है?
राजनीतिक विश्लेषक और जागरण लेकसाइड यूनिवर्सिटी के उप कुलपति प्रोफेसर संदीप शास्त्री ने बीबीसी से कहा,''कटील के साथ कार्यकर्ताओं ने जो किया वो कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सुबूत है. वो यह कहना चाह रहे हैं सत्ता में बैठे लोगों ने कार्यकर्ताओं के लिए कुछ नहीं किया है. सत्ताधारी पार्टी के लिए पार्टी प्रमुख और सरकार के बीच सजग होकर पुल बनाने का काम चुनौती भरा है. यह सिर्फ़ एक पार्टी का संकट नहीं है. ''
उनका कहना है, ''आप देखेंगे तो पाएंगे कि बीजेपी न तो पार्टी संगठन के मोर्चे और न सरकार चलाने के मामले में राहत की स्थिति में है. पार्टी इस वक्त चुनौती से जूझ रही है क्योंकि आधे विधायक बीजेपी में शामिल हो गए हैं. सवाल है कि अब अगले चुनाव में कितने लोगों को तवज्जो दी जाएगी. पार्टी में बाहर से आए लोग इसे कितनी मजबूती दे पाएंगे.

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राजनीतिक विश्लेषक और फैकल्टी ऑफ आर्ट्स के चेयरमैन प्रोफेसर मुज़फ़्फ़र असदी का कहना है, ''1990 के बाद कर्नाटक के तटीय इलाकों में बड़ी तादाद में ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजातियों के लोग बीजेपी में शामिल हुए. उन्होंने पहचान और रोजगार पाने के लिए बीजेपी का दामन थामा था. लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी है. कटील पर हमले की जो घटना है, वह इसी निराशा का नतीजा है.
प्रोफेसर असदी कहते हैं, '' ओबीसी समुदाय के लोग बीजेपी के पास इसलिए आए थे क्योंकि वे सामाजिक और आर्थिक तौर पर कांग्रेस में संकट का सामना करना रहे थे.लेकिन बीजेपी ने उन्हें पार्टी में पद तो दिया लेकिन उनकी आकांक्षाएं पूरी करने करने में नाकाम रही. अगर पार्टी ओबीसी समुदाय के कार्यकर्ताओं को पर्याप्त सीट और महत्व नहीं देती है तो वो फिर कांग्रेस और दूसरी पार्टियों का दामन थाम सकते हैं. ऐसी पार्टी का जो उनकी महत्वाकांक्षा पूरी कर सके. ''
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