मणिपुर भूस्खलन: 'नाउम्मीदी और उम्मीद' का संघर्ष, 34 लोग अब भी लापता

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नोनी, मणिपुर से

ये सफ़र उतना आसान नहीं है. कमज़ोर दिल वालों के लिए तो बिलकुल ही नहीं.

मणिपुर की राजधानी इम्फाल से नोनी ज़िले के मरांगचिंग' पहुंचना अपने आप में बड़ी चुनौती है.

टूटी हुई सड़कें. भूस्खलन से पहाड़ों के मलबे का सड़क पर जमा ढेर और उसे हटाती हुई बड़ी-बड़ी मशीनें.

जगह-जगह पहाड़ों पर पत्थर तोड़ने का काम चल रहा है. कर्मचारी वाहनों को रोक देते हैं ताकि ऊपर से गिरने वाली बड़ी चट्टान से लोग बच सकें.

हर एक किलोमीटर की दूरी पर यही दिखता है. बारिश की वजह से पहाड़ी सड़कों पर कीचड़ ही कीचड़ है. गाड़ियां फंस रहीं हैं. बारिश हो रही है.

'नाउम्मीद नहीं हैं'

चट्टानें गिर रहीं हैं. किसी तरह इन गाड़ियों को निकाला जा रहा है. ये रोंगटे खड़ा कर देने वाला दृश्य है.

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के नोनी ज़िले में हुए भूस्खलन की घटना में लापता लोगों के बचने की उम्मीद अब ना के बराबर ही है. मणिपुर में हुए हादसे वाली जगह पर मलबे में दबे लोगों में सात असम के भी हैं

असम सरकार के मंत्री पियूष हज़ारिका ने घटनास्थल का मुआयना करने के दौरान पत्रकारों से ये ज़रूर कहा कि वो 'नाउम्मीद नहीं हैं'.

मगर राहत और बचाव कार्य में लगी सेना और 'एनडीआरएफ़' के साथ-साथ राज्य सरकार के राहत दल के अधिकारियों को लगता है कि 'अब किसी का बचना नामुमकिन ही है'.

वो मानते हैं कि कोई 'चमत्कार' ही अगर हो जाए तो ही कोई जिंदा मिल सकता है.

ख़राब मौसम से राहत काम में बाधा

तेज़ बारिश और रह-रह कर हो रहे भूस्खलन के बीच शवों के मिलने का सिलसिला जारी है. मगर भूस्खलन की वजह से मलबे का इतना ज़्यादा ढेर है कि बचाव दल को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव एसएम खान आपदा प्रबंधन विभाग के प्रमुख भी हैं और उनकी देख-रेख में ही राहत और बचाव कार्य चल रहे हैं.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं कि सिर्फ़ मलबा नहीं है बल्कि ये कीचड़ का पहाड़ है.

वो कहते हैं कि अगर सूखी मिट्टी होती तो उसके नीचे 'एयर पॉकेट' बन जाते हैं, जिस वजह से किसी के भी जिंदा बचने की संभावना होती है.

बचाव अभियान

अतिरिक्त मुख्य सचिव खान कहते हैं कि तेज़ बारिश की वजह से मलबा कीचड़ के रूप में गिरा और यही वजह है कि इसके नीचे दबने वालों के बचने की संभावना बिलकुल कम ही है.

घटना के फ़ौरन बाद जो बचाव अभियान चला उसमें लगभग 18 लोगों को घायल अवस्था में बचाया जा सका.

लेकिन जैसे-जैसे समय बीतने लगा, किसी के भी जिंदा बचाए जाने की संभावना कम होती जा रही है.

बचाव का काम कई फीट नीचे की गहराई में चल रहा है जहां जेसीबी मशीनों से मिट्टी हटाई जा रही है. कतारबद्ध होकर बचाव दल के कर्मी नीचे जाते हैं.

जान का ख़तरा

हम मौजूद थे तभी किसी शव के मिलने की बाद अधिकारियों के वायरलेस सेट पर आने ली.

फिर एक लंबी रस्सी को नीचे ले जाया गया, जिससे स्ट्रेचर बाँध कर शव को ऊपर खींचा गया.

शव की पहचान फ़ौरन तो नहीं हो पाई. ये सिलसिला जारी है.

बारिश और रह-रह कर ऊपर से जो मलबा आ रहा है उससे बचाव दल को भी जान का ख़तरा बना हुआ है.

सैनिकों की भी मौत

मणिपुर सरकार के अनुसार अब भी 34 लोग लापता हैं.

अधिकारी कहते हैं कि अब तक जिन लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं उनमे सेना के एक 'जूनियर कमीशंड' अफसर भी शामिल हैं. '

टेरिटोरियल आर्मी' के 14 जवानों के शव मलबे में से बरामद किये जा चुके हैं और सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सभी शवों को उनके पैतृक गाँव भेज दिया गया है जहां उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जा रहा है.

'टेरिटोरियल आर्मी'

सरकार के अधिकारियों का कहना है कि इस इलाक़े में 'टेरिटोरियल आर्मी' की 107वीं बटालियन को इसलिए तैनात किया गया था ताकि परियोजना में शामिल कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान की जा सके.

म्यांमार से लगी राज्य की सीमा की वजह से चरमपंथी गतिविधियाँ इस इलाके में काफ़ी बढ़ गयीं हैं.

नगा और कुकी समुदाय के कई भूमिगत संगठनों की सक्रियता की वजह से इस इलाके में सुरक्षा को लेकर सरकार किसी भी तरह की कोई चूक नहीं करना चाहती है.

महत्वाकांक्षी रेल परियोजना

मणिपुर में शुरू की गई महत्वकांक्षी रेल परियोजना के काम में लगी दो निजी कंपनियों और कुछ रेल कर्मचारियों के भी शव बरामद हुए हैं.

लेकिन कुछ स्थानीय ग्रामीण जो इस परियोजना में काम कर रहे थे, उनके बारे में कोई जानकारी नहीं हो पाई है.

इनमे एक परिवार ऐसा भी है जो 'टेरिटोरियल आर्मी' के तूपुल स्थित कैम्प के पास ही एक दुकान चलाते थे.

स्थानीय ग्रामीणों ने बीबीसी को बताया कि घटना के वक़्त दुकान में एक स्थानीय महिला और उनका दो साल की बेटी भी मौजूद थे, जिनका अभी तक कोई अता-पता नहीं है.

एल मखुवाम भी तीन दिनों से यहीं जमे हुए हैं.

वो अपने बेटे-बहू और दो साल की पोती की तलाश में जुटे हुए हैं.

अभी तक सिर्फ गैस के दो सिलेंडर ही बरामद हो पाए हैं, जो उनकी बहू की दूकान में थे.

मखुवाम कहते हैं कि कई और ग्रामीण भी हैं जो परियोजना में छोटा-मोटा काम करते थे और घटना के बाद से उनका भी कोई सुराग नहीं है.

उन्होंने स्थानीय ज़िला प्रशासन से ऐसे ग्रामीणों की पहचान करने की मांग की है.

भूस्खलन का ख़तरा बढ़ा : सीएम

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा कि उनके राज्य में जो पहाड़ हैं वो कमज़ोर हैं जिसकी वजह से भूस्खलन का ख़तरा बढ़ रहा है.

उनका कहना था कि रेल परियोजना बहुत महत्वाकांक्षी है और इसके पूरा हो जाने के बाद मणिपुर का रेल संपर्क पूरे देश से हो जाएगा.

इस परियोजना के तहत ही विश्व के सबसे ऊँचाई वाले रेलवे ब्रिज का काम भी ज़ोरों पर चल रहा है.

उन्होंने इस परियोजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'ड्रीम प्रोजेक्ट' की संज्ञा दी.

इस बीच तेज़ बारिश की चेतावनी के बीच नोनी के जिलाधिकारी एच गुईटे ने घटनास्थल के पास रहने वाले ग्रामीणों को सतर्क रहने की हिदायत दी है.

मौसम विभाग की लगातार मिल रही चेतावनी को देखते हुए प्रशासन ने ग्रामीणों से कहा है कि हालात बिगड़ भी सकते हैं और भारी बारिश के साथ कई स्थानों पर भूस्खलन भी हो सकता है.

तूपुल में जहां ये हादसा हुआ है वहां रह रह कर भूस्खलन हो ही रहा है.

इसलिए स्थानीय प्रशासन ने लोगों को इलाके से किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाने का सुझाव भी दिया है.

हालांकि परियोजना का काम दिन रात चल रहा है और इसकी वजह से ही नोनी के मरांगचिंग जाने के 80 किलोमीटर के रास्ते में जगह-जगह पहाड़ों को तोड़कर पत्थर निकाले जा रहे हैं.

सड़क के चौड़ीकरण का काम भी चल रहा है. लेकिन इससे पहाड़ और भी कमज़ोर होने लगे हैं और बड़े पैमाने पर लोगों पर भूस्खलन का ख़तरा भी मंडरा रहा है.

राजधानी इम्फाल से नोनी जाने के लिए अमूमन एक घंटे का समय लगता है.

मगर सड़कों की हालत ऐसी हो चुकी है कि अब पहुंचने में चार से पांच घंटे लग रहे हैं.

बड़े पैमाने पर चौड़ीकरण के काम और विभिन्न परियोजनाओं की वजह से मणिपुर के पहाड़ भी वैसे ही संवेदनशील हो गए हैं जैसे उत्तराखंड के.

इस बात को लेकर मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह भी चिंतित ज़रूर हैं क्योंकि ये इलाक़ा 'सेस्मिक' ज़ोन में आता है जहां किसी भी दिन एक बड़े भूकंप की आशंका हमेशा प्रबल रहती है.

सिंह कहते हैं, "हम 'फाल्ट लाइन' पर बैठे हैं. किसी भी दिन बड़ा भूकंप आ सकता है और भारी तबाही मच सकती है."

"इसलिए हम बेहद सावधानी बरत रहे हैं. परियोजना पूरी होने तक हम पहाड़ों में व्यापक वृक्षारोपण भी करा रहे हैं. उन्हें मज़बूत बनाने के सभी उपाय भी कर रहे हैं."

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