जातीय संघर्ष से उबर रहे समुदाय का गौरव वापस दिला रहे गैंडे

    • Author, गीतांजलि कृष्णा और सैली होवार्ड
    • पदनाम, बीबीसी

एक सितंबर 2008 की मध्यरात्रि को कॉल आता है कि असम में एक सींग वाले गैंडों में से एक को काजीरंगा नेशनल पार्क से मानस नेशनल पार्क लाया गया. ये गैंडा जंगल के बाहर एक गांव की तरफ़ बढ़ रहा था. ऐसे में इस जंगली जानवर का अगर इंसानों के साथ कोई संघर्ष होता तो यहां पर चल रहे गैंडे के संरक्षण कार्यक्रम के लिए वो कयामत का कारण बन सकता था.

उस वक्त को याद करते हुए वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) के एक जूनियर राइनो रिसर्चर देबा कुमार दत्ता बताते हैं, "जब मैंने 500 से अधिक गांववालों को इकट्ठा देखा, जो गैंडे को देखने आए थे तो मेरा दिल बैठ सा गया था."

लेकिन जैसे ही दत्ता करीब आए तो उन्होंने देखा कि आखिर गांव वाले क्या कर रहे थे. दत्ता कहते हैं, "वो गैंडे का गोबर इकट्ठा कर रहे थे उनका मानना था कि ये शुभ है."

उन्होंने देखा कि कैसे गांव वाले बांस की मदद से गैंडे के पदचिह्नों को चिह्नित कर रहे थे, तब जाकर दत्ता को महसूस हुआ कि मानस के पुनरुद्धार की बात महज़ एक सपना नहीं थी. जिस संघर्ष की बात वो सोच रहे थे उससे कहीं अलग गांव वाले गैंडे के आने का स्वागत कर रहे थे, वो भी ऐसे जिसकी कल्पना भी दत्ता नहीं कर सकते थे.

चौदह साल बाद अब मानस नेशनल पार्क में गैंडों का संरक्षण कार्यक्रम/ पुनरुद्धार कार्यक्रम (reintroduction programme) दूसरी जगहों पर चल रहे संरक्षण कार्यक्रमों के लिए एक सीख है.

स्थानीय लोगों और गैंडों के बीच के गहरे संबंध ने यहां के अतीत को पीछे छोड़ दिया है.

वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) के कार्यकारी निदेशक विवेक मेनन कहते हैं, "2003 से, नियमित रूप से असम सरकार ने मानस और आसपास के जंगलों के क्षेत्र का विस्तार किया है."

मेनन, इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर (IFAW) के वरिष्ठ सलाहकार भी हैं, वो कहते हैं कि 283,700 हेक्टेयर के पूरे इलाके को देखा जाए तो पार्क का विस्तार संरक्षण के लिहाज़ से काफी अहमियत रखता है.

रेस्क्यू किए गए गैंडों के अनाथ बच्चों, बारहसिंगा, भालू और हाथियों को WTI, IFAW और असम वन विभाग यहां लेकर आए. उनका पुनर्वास किया गया. असम के दूसरे हिस्सों से जंगली गैंडों को यहां लाया गया.

मानस का पुनरुद्धार इतना कामयाब रहा कि साल 2011 में यूनेस्को ने मानस को खतरे में आने वाली विश्व धरोहर स्थलों की सूची से हटा दिया.

जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की निदेशक धृति बनर्जी कहती हैं, " चाहे चीता हो , क्लाउडेड लेपर्ड या बाघ हो, प्रजातियों के पुनरुत्पादन (species reintroductions) की बात होगी तो मानस मॉडल पर ध्यान दिया जाएगा.''

लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था.

एक उथलपुथल भरा इतिहास

दरअसल, असम की बोडो जनजाति के लोग राज्य के बाकी हिस्सों से जातीय और भाषाई तौर पर अलग हैं. ये ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर जंगलों में रहते हैं.

एक अलग राज्य 'बोडोलैंड' की मांग ने 1980 के दशक के आखिर तक हिंसक रूप ले लिया था. ऐसे में सशस्त्र अलगाववादी समूह जैसे बोडोलैंड लिबरेशन टाइगर्स और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड से जुड़े लोग मानस के अंदर छिप गए.

स्थानीय संरक्षण संगठन, न्यू होराइजन के सचिव महेश मोशहरी उस दौर को याद करते हुए बताते हैं, "यहां वन संरक्षण, विकास कार्य और आर्थिक अवसर समाप्त हो गए थे. वनों की कटाई और अवैध शिकार आजीविका का एकमात्र साधन बन गया था."

मानस के सभी 100 गैंडे विलुप्त हो गए थे. यहां के हाथी, भालू और क्लाउडेड लेपर्ड की संख्या में भी तेजी से गिरावट आई थी.

यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की लिस्ट में आने के सात साल बाद साल 1992 में मानस खतरे में आने वाली विश्व धरोहर स्थलों की सूची में भारत की इकलौती प्रविष्टि बन गई.

साल 2003 में केंद्र सरकार, असम सरकार से शांति समझौते के बाद बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) बना.उस वक्त तक मानस पूरी तरह बदल चुका था.

बीटीआर के उप प्रमुख और उस समय के वन और शिक्षा मंत्री 54 साल के कंपा बोर्गॉयरी (Kampa Borgoyary) उस वक्त को याद करते हैं,

"हम अपमान और अपराध-बोध से पीड़ित थे कि पूरी दुनिया ने मानस के विनाश के लिए बोडो लोगों को दोषी ठहराया."

वो आगे कहते हैं, ''मानस का गौरव फिर से बहाल करने की ज़रूरत हमारे खुद के जातीय गौरव से जुड़ी हुई थी.''

पुनरुद्धार का रास्ता

साल 2006 में मेनन, पिग्मी हॉग (एक तरह का जंगली सुअर) पर रिसर्च कर रहे थे. उस वक्त मेनन का सामना किंग कोबरा से हुआ, जो दुनिया का सबसे विषैला सांप है. दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के घने और अबाधित जंगलों में पाया जाता है. इस सांप की उपस्थिति से मेनन को ये समझ आया कि मानस का हैबिटेट अब भी मजबूत और दोबारा से बसाए जाने लायक है.

उन्हें लगा कि इस जंगल और घास के मैदान में लुप्त हो गए जानवरों की प्रजातियों को फिर से संरक्षित किया जा सकता है, क्योंकि ये एक सींग वाले गैंडों और हाथियों के लिए आदर्श जगह था.

मेनन कहते हैं, " रीवाइल्डिंग के नजरिए से देखा जाए तो जब तक लाइवस्टॉक का दबाव कम रहता है, घास के मैदान तेजी से पुनर्जीवित होते हैं."

मेनन और सहयोगियों ने यहां समुदाय आधारित संरक्षण परियोजना शुरू की. इसमें स्थानीय लोगों की आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भरता कम करने पर काम किया गया. साथ ही गैंडा, हाथी, बारहसिंगा, क्लाउडेड लेपर्ड और जंगली भैंसे को बसाया गया.

काजीरंगा के वन्यजीव पुनर्वास और संरक्षण केंद्र से अनाथ गैंडों के बच्चों, भालूओं को लाया गया और मानस में सावधानी से छोड़ा गया. साथ ही, WWF ने असम के अन्य हिस्सों से वयस्क गैंडों को मानस में स्थानांतरित करना शुरू किया. हालाँकि, मानस के पुनरुत्थान के असली हीरो खुद बोडो ही थे.

कंपा बोर्गॉयरी (Kampa Borgoyary) कहते हैं, ''मानस हमारी माता है, क्योंकि इसने पीढ़ियों से हमें भोजन, पानी और जलाऊ लकड़ी दिया है. शायद हम इसके विनाश के जिम्मेदार थे, हम इसके पुनरुद्धार के लिए भी जिम्मेदार होना चाहते थे.''

अब इसके लिए पहला काम था वैकल्पिक आजीविका के संसाधन तैयार करना. 35 वर्षीय राधिका रे (Radhika Ray) याद करती हैं कि कैसे उनके गांव की महिलाएं ईंधन, वन उपज और मांस के लिए जंगल पर निर्भर थीं. लेकिन अब ऐसा नहीं है, क्योंकि महिलाएं स्थानीय बाजारों से खरीदे गए रेशम और कपास से स्थानीय पोशाक, दोखोना, शॉल, तौलिये और बहुत कुछ बुनती और बेचती हैं.

राधिका कहती हैं, ''जंगल के साथ हमारा पीढ़ियों से चला आ रहा संबंध अटूट बना हुआ है.लेकिन अब, मेरे समुदाय की कई अन्य महिलाओं की तरह, मैं भी बुनाई से अपना जीवन यापन करती हूं और अब जीवित रहने के लिए जंगल के संसाधनों को ख़त्म करने की ज़रूरत नहीं है."

इस बदलाव के नतीज़े जंगल के चारों तरफ दिखाई दे रहे हैं. राधिका मुस्कुराते हुए कहती हैं, ''ये पहले से अधिक हरा-भरा और सुंदर है.''

राधिका जैसा ही काम कर रही 40 वर्षीय रोहिला रे कहती हैं कि काम से जो आय मिल रही हैं उससे उनकी निर्भरता सिर्फ जंगल से ही नहीं पुरुषों से भी ख़त्म हुई है.

शिकार के बाद वाली ज़िंदगी

इसके साथ ही, बीटीआर और अन्य संगठनों ने 400 से अधिक शिकारियों को मासिक वजीफा देकर जंगल के रक्षक बनने के लिए राजी किया है. महेश्वर बसुमतारी, जिन्हें प्यार से लोग 'ओंताई' (Ontai) (स्थानीय भाषा में चट्टान) भी कहते हैं, उनमें से एक हैं.

वो अब मानस में एक पुरस्कार विजेता पशुपालक के तौर पर जाने जाते हैं. महेश्वर ने 1980 के दशक में अवैध शिकार की ओर रुख किया था क्योंकि उस वक्त अवसर कम थे और इससे आसानी से पैसे मिल जाते थे. उन्होंने 2005 में स्थानीय प्रशासनिक प्राधिकरण बीटीआर के सामने सरेंडर कर दिया था. इसके बाद ग्रेटर मानस कंज़र्वेशन प्रोजेक्ट का हिस्सा बन गए, दो तेंदुए के शावकों के पुनर्वास में सहायता की. तब से वो मानस में शिकारियों को पकड़ने, अवैध उत्पादों को जब्त करने, वन्यजीव सर्वेक्षण करने और गैंडों के बच्चों को बचाने में मदद कर रहे हैं.

महेश्वर कहते हैं, "मैंने इतने सारे गैंडे और दूसरे जानवरों के बच्चों का पेट भरा है, जैसे मैं अपने बच्चों को खाना खिला रहा हूं."

वो आगे कहते हैं, "मेरा दिल यह देखकर गर्व से भर जाता है कि कुछ ने अब जंगल में अपने बच्चे पैदा किए हैं."

मतलब ये कि वो शख्स जिसने पहले शिकारियों के लिए गैंडों को ट्रैक करने में मदद की है, आज वो पूरी तरह बदल चुका है.

महेश्वर कहते हैं, "हर जानवर जिसे हम बचाते हैं, पालते हैं और जंगल में लौटाते हैं, वो जंगल को और समृद्ध बनाता है.''

दूसरे पूर्व शिकारी भी कई स्थानीय संरक्षण संगठनों में शामिल हो गए हैं. जो मानस के आसपास ही हैं. इन संगठनों से जुड़कर ये असम जंगल विभाग के साथ पेट्रोलर्स (गश्ती दल) की तरह काम करते हैं.

ऐसा ही एक संगठन है-मानस मौज़िगेंद्री इकोटूरिज्म सोसाइटी. इस सोसाइटी के महासचिव रुस्तम बसुमतारी कहते हैं, ''पूर्व शिकारियों के ट्रैकिंग स्किल वास्तव में काम आते हैं. हम मानस को एक स्थायी पर्यटन स्थल बनने का सपना देखते हैं ताकि स्थानीय लोगों की इसके संरक्षण में और भी हिस्सेदारी हो."

पर्यावरण संरक्षण और प्रजातियों के लिए टूरिज़्म के फायदे पर बहस चलती आई है. हालांकि, बनर्जी और दूसरे विशेषज्ञों का मानना है कि टूरिज्म और उससे होने वाली आय से मानस को फायदा हो सकता है.

वो कहती हैं, "स्थानीय लोग ये भी महसूस करते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन न केवल टूरिज़्म रेवेन्यू को कम कर सकता है, बल्कि सरकार द्वारा पुलिसिंग को बढ़ा सकता है."

अब ऐसे राज्य में जहां प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 1,1120 डॉलर है, IFAW के मुताबिक, मानस के पुनरुद्धार में अबतक 2.5 मिलियन डॉलर का खर्च आया है. मेनन का कहना है कि इतनी लागत लगाने के लायक ये जगह है.

"मेगा-हर्बिवोर्स" के तौर पर, गैंडे की मौजूदगी इस जगह यानी मानस के घास के मैदानों के अच्छे होने के संकेत देते हैं. उनकी उपस्थिति से पता चलता है कि यहां का पारिस्थितक तंत्र सही स्थिति में है.

यहां के घास के मैदानों ने विलुप्त प्राय पिग्मी हॉग और दुनिया के सबसे दुर्लभ बस्टर्ड 'बंगाल फ्लोरिकन' जैसे प्रजातियों के संरक्षण में मदद की है.

2003 में जब बोडो शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे, उस वक्त तक मानस ने गैंडों और बारहसिंगा की अपनी पूरी आबादी खो दी थी. लेकिन 2021 में मानस 52 गैंडों, 48 बाघों, 1,000 से अधिक जंगली हाथियों और कई विलुप्तप्राय जानवरों जैसे क्लाउडेड लेपर्ड, पिग्मी हॉग और बंगाल फ्लोरिकन का घर था.

मानस मॉडल को यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज कंज़र्वेशन एंड मैनेजमेंट में बेस्ट प्रैक्टिस मॉ़डल के तौर पर प्रस्तावित किया गया है. ये मॉडल ऐसे ही अधिक क्षेत्रों की पहचान करने के लिए प्रेरित करता है. बनर्जी कहती हैं,

"कच्छ के रण (गुजरात), सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) या मध्य भारत के पश्चिमी घाट को इसी तरह की परियोजनाओं से फायदा हो सकता है.'' लेकिन इसके लिए समुदाय के लोगों का पूरा समर्थन और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की ज़रूरत होगी.

इस बीच, महेश्वर अपने दूरबीन और ट्रैकिंग गियर हाथ में लिए उन तीन गैंडों को ट्रैक करते हैं, जिन्हें उन्होंने अप्रैल, 2021 में जंगल में छोड़ा था. वो कहते हैं- ''मानस मेरा घर है, अगर ये फलता-फूलता है तो मैं भी फलता-फूलता हूं, अगर ये ख़त्म होता है तो मैं भी ख़त्म होता हूं.''

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