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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के असम दौरे से नगा शांति को लेकर उम्मीदें
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, जोरहाट से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत सरकार ने पिछले साल चार सितंबर को राजधानी नई दिल्ली में कार्बी-आंगलोंग ज़िले के छह उग्रवादी गुटों के साथ शांति समझौता किया था.
केंद्र सरकार ने कार्बी-आंगलोंग ज़िले के हथियारबंद समूहों के साथ दस्तख़त किए गए उस 'ऐतिहासिक' शांति समझौते की सराहना करते हुए कहा था कि इससे उस पहाड़ी इलाक़े में स्थायी शांति क़ायम हो सकेगी.
इस शांति समझौते की शर्तों के अनुसार, हथियार डालने वाले कैडरों का पुनर्वास करने के साथ ही सरकार कार्बी क्षेत्रों के विकास के लिए एक हज़ार करोड़ रुपये का एक विशेष विकास पैकेज देगी. इसके तहत विकास की कई परियोजनाओं का काम शुरू किया जाएगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समझौते के अंतर्गत कई विकास परियोजनाओं की घोषणा करने 28 अप्रैल को कार्बी-आंगलोंग में हैं. पीएम मोदी ने गुरुवार को ज़िला मुख्यालय दीफू से क़रीब 75 किलोमीटर दूर लोरिंग थेपी नामक गाँव में एक विशाल रैली को भी संबोधित किया.
प्रशासन की ओर से दावा किया जा रहा है कि इस शांति समझौते के बाद लंबे समय से अशांत रहे इस इलाक़े में कई दशक पुराने संकट का अंत हो गया है. यहाँ के सशस्त्र संगठनों के एक हज़ार से अधिक काडरों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट आए हैं.
असम दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "सबका साथ, सबका विकास की भावना के साथ आज सीमा संबंधी समस्या को सुलझा लिया गया है. असम और मेघालाय के बीच हुआ हालिया समझौता बाकी राज्यों को भी प्रोत्साहित करेगा."
आफ़्स्पा पर पीएम मोदी ने कहा, "हाल ही में आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट को असम के 23 ज़िलों से हटा लिया गया है. हमने पूर्वोत्तर के कई इलाकों में कानून व्यवस्था सुधरने की वजह से इसे हटाया है."
नगा उग्रवादियों का असर घटने का अनुमान
यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि कार्बी-आंगलोंग में सक्रिय उग्रवादी संगठनों के मुख्यधारा में लौट आने से यहाँ नगा उग्रवादियों के प्रभाव में गिरावट आएगी.
दरअसल, असम का कार्बी-आंगलोंग ज़िला नगालैंड की सीमा से सटा हुआ है. यहाँ पूर्वोत्तर राज्य के सबसे पुराने अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) के कैडरों की काफ़ी सक्रियता रही है.
एनएससीएन-आईएम वही विद्रोही संगठन है, जिसके साथ भारत सरकार ने तीन अगस्त, 2015 को एक 'फ्रेमवर्क एग्रीमेंट' साइन किया है.
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत सरकार और नगा चरमपंथियों के बीच यह फ्रेमवर्क एग्रीमेंट किया गया था. फ्रेमवर्क एग्रीमेंट अर्थात एक ऐसे समझौते के ढांचे पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनी, जिसके आधार पर अंतिम समझौता किया जाना है.
हालांकि एनएससीएन-आईएम द्वारा अलग झंडे और अलग संविधान की मांग के चलते ये बातचीत फ़िलहाल अटकी हुई है क्योंकि भारत सरकार ये मांगें मानने को तैयार नहीं है.
नगालैंड में सुगबुगाहट
ऐसे में 28 अप्रैल को आ रहे पीएम मोदी के दौरे को लेकर नगालैंड में भी काफ़ी सुगबुगाहट है. इसका एक बड़ा कारण ये भी है कि पिछले सप्ताह नगा समुदाय के कई प्रमुख संगठनों ने दीमापुर में नगा शांति वार्ता के लिए भारत सरकार के वार्ताकार एके मिश्रा से मुलाक़ात की थी.
वार्ताकार एके मिश्रा ने नगा समुदाय को भरोसा दिया है कि 'समाधान सभी नगाओं के लिए सम्मानजनक और स्वीकार्य होगा.'
असम में पीएम मोदी के दौर को लेकर नगालैंड में नगा समुदाय के सर्वोच्च जनजातीय संगठन नगा होहो के प्रमुख एचके झीमोमी को उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नगा शांति वार्ता के लिए भी कुछ ठोस संदेश देंगे.
कार्बी-आंगलोंग में प्रधानमंत्री के दौरे को लेकर एचके झीमोमी ने बीबीसी से कहा, "असम, नगालैंड का निकटतम पड़ोसी है और प्रधानमंत्री जिस जगह आ रहे हैं, वो हमारे राज्य से बहुत क़रीब है. चूंकि नगा मुद्दे को सुलझाने की प्रतिबद्धता भी प्रधानमंत्री की है, इसलिए हम ये उम्मीद कर रहे हैं कि वे नगा मुद्दे पर भी ज़रूर कुछ कहेंगे."
फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर नगा होहो के प्रमुख कहते हैं, "फ्रेमवर्क समझौता हुआ है, लेकिन इसमें मौजूद तय शर्तों को लागू भी करना होगा. इसलिए जब तक अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक इस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट से नगा समुदाय को क्या नफ़ा-नुक़सान हुआ, ये नहीं कहा जा सकता. हमने भारत सरकार के वार्ताकार से मुलाक़ात के दौरान ये बात पूछी थी कि क्यों सरकार इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने में विलंब कर रही है. एग्रीमेंट तो 2015 में ही साइन कर लिया गया था और बातचीत अभी भी चल रही है."
उन्होंने आगे कहा, "भारत सरकार के वार्ताकार ने हमारी बातें धैर्यपूर्वक सुनी और उन्होंने हमें समझाने की कोशिश भी की कि क्यों सरकार इतना लंबा समय ले रही है. इस बार वार्ताकार ने सभी हितधारकों के साथ गहन परामर्श किया है. हमें उम्मीद है कि सरकार नगा मुद्दे का जल्द ही समाधान निकालेगी और अंतिम समझौते पर निर्णय लेगी."
50 के दशक से संघर्ष
नगालैंड में 1950 के दशक से सशस्त्र संघर्ष चल रहा है. इस आंदोलन की मांग है कि नगा लोगों को अपना स्वायत्त क्षेत्र दिया जाए. इसमें नगालैंड के अलावा उनके पड़ोसी राज्यों असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के साथ-साथ म्यांमार के नगा-आबादी वाले सभी इलाक़े भी शामिल हों.
साल 1975 में एक समझौते के बाद सबसे बड़े नगा विद्रोही गुट 'नगा नेशनल काउंसिल' ने आत्मसमर्पण कर दिया था. हालांकि एक दूसरे गुट 'नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) ने उस समझौते की निंदा करते हुए हथियारबंद लड़ाई जारी रखने का फ़ैसला किया. अलगाववादी संगठन एनएससीएन में कथित तौर पर चीन से प्रशिक्षण और हथियार पाए लड़ाके भी शामिल थे.
हालांकि 1997 में टी. मुइवा के नेतृत्व वाले एनएससीएन-आईएम ने युद्ध विराम पर सहमत होते हुए भारत सरकार के साथ बातचीत करनी शुरू कर दी. लेकिन इतनी लंबी खींची गई इस शांति वार्ता के कारण नगालैंड में कई और तरह की समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं.
इस बीच सुरक्षाबलों के जवानों और एनएससीएन-आईएम के कैडरों के बीच संघर्ष की कई घटनाएं भी सामने आई. भारत सरकार जहाँ नगा विद्रोही संगठन के कैडरों पर संघर्ष विराम के नियम तोड़ने का आरोप लगाती है, वहीं कई विद्रोही नेता वार्ता में हो रहे विलंब को सरकार की कथित लापरवाही बताते हैं.
कार्बी-आंगलोंग ज़िले में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार सुशांत रॉय कहते हैं, "हो सकता है कि प्रधानमंत्री यहाँ से नगा वार्ता पर कुछ ठोस संदेश दें. क्योंकि यहाँ पास में ही नगालैंड का बॉर्डर है और आए दिन वहाँ कोई न कोई विवाद होता रहता है. इन सभी विवादों में एनएससीएन का नाम लिया जाता है. लिहाजा भारत सरकार को पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थायी शांति कायम करने के लिए ख़ासकर एनएससीएन के मामले में जल्द ही निर्णय लेना होगा."
कार्बी-आंगलोंग क्षेत्रफल के हिसाब से असम का सबसे बड़ा ज़िला है. यह इलाक़ा मुख्य रूप से आदिवासियों और जातीय आबादी का माना जाता है. यहाँ कार्बी, बोडो, कुकी, दिमासा, हमार, गारो, रेंगमा नगा, तिवा और मैन समुदायों के लोग बसे हुए हैं.
भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में अशांति सिर्फ़ केंद्र या स्थानीय सरकारों से लड़ने वाले विभिन्न जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले सशस्त्र अलगाववादी समूहों के कारण नहीं है. बल्कि विभिन्न जातीय लोगों के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए बार-बार होने वाले हिंसक संघर्ष भी इस अशांति के कारक हैं.
अशांति की वजहें
कार्बी-आंगलोंग में भले ही स्थायी शांति कायम करने के लिए सरकार तमाम प्रयास कर रही है, लेकिन यहाँ एक अलग स्वायत्त राज्य की मांग कई दशकों से चली आ रही है.
साल 1990 के दशक के मध्य में अलग राज्य के लिए किए जा रहे आंदोलन ने यहाँ हिंसक रूप ले लिया था. इसी तरह 1996 में इस ज़िले में कार्बी नेशनल वालंटियर्स और कार्बी पीपल्स फ़ोर्स नामक दो चरमपंथी संगठनों का जन्म हुआ. काफ़ी हिंसा के बाद 1999 में यूनाइटेड पीपल्स डेमोक्रेटिक सॉलिडेरिटी (यूपीडीएस) के बैनर तले दोनों गुटों का विलय हो गया था.
हालांकि 23 मई, 2002 को अलगाववादी संगठन यूपीडीएस ने भारत सरकार के साथ युद्ध विराम समझौता कर लिया और 2011 तक औपचारिक रूप से इस संगठन को भंग कर दिया गया.
कई रिपोर्टों में यह बात सामने आई कि यह संगठन एनएससीएन-आईएम की सक्रिय मदद से बना था, जिसे नगा चरमपंथी संगठन ने ही हथियार और गोला-बारूद दिया था.
हालांकि कार्बी-आंगलोंग में अलग राज्य की मांग अब भी ख़त्म नहीं हुई है. प्रधानमंत्री के दौरे से ठीक तीन दिन पहले स्थानीय क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी ऑटोनोमस स्टेट डिमांड कमेटी (एएसडीसी) ने फिर से एक अलग स्वायत्त राज्य के गठन की मांग उठाई है.
लंबे समय से एक अलग राज्य की मांग करते आ रहे एएसडीसी का कहना है कि अनुच्छेद 244 (ए) के तहत तीन पहाड़ी ज़िलों दीमा हसाओ, कार्बी आंगलोंग और पश्चिम कार्बी आंगलोंग को मिलाकर एक स्वायत्त राज्य बनाया जाए. हालांकि भारत सरकार ने 1995 में भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत कार्बी-आंगलोंग स्वायत्त परिषद की स्थापना की थी.
भारतीय जनता पार्टी की असम इकाई के वरिष्ठ नेता और असम वित्त निगम के अध्यक्ष विजय गुप्ता कार्बी-आंगलोंग और एनएससीएन-आईएम के साथ शांति वार्ता से जुड़े तमाम सवालों पर बीबीसी से कहा, "प्रधानमंत्री मोदी कार्बी आंगलोंग समेत समूचे पूर्वोत्तर राज्यों के विकास और शांति के लिए काम कर रहे हैं. यही वजह है कि आज सैकड़ों चरमपंथियों ने हथियार डाल दिए हैं और मुख्यधारा में लौट आए हैं. हमारी सरकार नगा मुद्दे को भी गंभीरता से सुलझाने के लगातार प्रयास कर रही है.''
उन्होंने बताया, ''कार्बी-आंगलोंग में जिस जगह प्रधानमंत्री का कार्यक्रम है, वहां से नगालैंड महज़ कुछ दूरी पर ही है, लिहाज़ा प्रधानमंत्री के मन में इस क्षेत्र की शांति और विकास के लिए जो भी बातें हैं, वे जनता से ज़रूर साझा करेंगे."
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