आज़म ख़ान के दो क़रीबियों के बीच होगी रामपुर उपचुनाव में भिड़ंत, किसका पलड़ा भारी

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- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
89 मुक़दमों में बेल मिलने के बाद समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान जेल से बाहर हैं. सोमवार को उनकी तबीयत थोड़ी नासाज़ थी लेकिन वे अपने गढ़ रामपुर में चुनाव लड़ने-लड़ाने की पूरी तैयारी में हैं.
सोमवार को रामपुर में सपा कार्यालय पहुँच कर आज़म ख़ान ने अपने क़रीबी रहे आसिम राजा को रामपुर से उम्मीदवार घोषित किया.
दिल्ली में हुई अखिलेश यादव और आज़म ख़ान की मुलाक़ात के बाद यह संकेत मिल रहे थे कि आज़म ख़ान को रामपुर से पार्टी के लोकसभा उम्मीदवार चयन करने की पूरी छूट है.
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यह इस बात से भी साफ़ है कि आज़म खान के क़रीबी शानू ने मीडिया को रविवार शाम यह संदेश भेजा कि सोमवार को आज़म ख़ान पार्टी के उम्मीदवार का नाम एलान करेंगे. हालांकि परंपरागत तौर पर पार्टी लखनऊ में प्रेस विज्ञप्ति या ट्वीट कर ये घोषित करती है. इससे ज़ाहिर होता है कि आज़म ख़ान की पार्टी पर पकड़ मज़बूत है और वे पार्टी के सबसे कद्दावर मुस्लिम चेहरा हैं.
आसिम राजा के नाम का एलान करते वक़्त आज़म ख़ान ने कहा, "हमारे बहुत अज़ीज़ साथी, लम्बा सियासी तजुर्बा और इख़लाक़ से भरपूर शख़्सियत का नाम है आसिम राजा. यह चुनाव हम आसिम राजा साहब को लड़ाना चाहते हैं और आज से अपनी तकलीफ़ों का हिसाब लेना चाहते हैं."
आसिम राजा का राजनीतिक करियर
रामपुर के वरिष्ठ पत्रकार तमकीन फ़याज़ कहते हैं, "आसिम राजा सपा के पूर्व नगर अध्यक्ष रह चुके हैं. और आज़म ख़ान के सबसे क़रीबियों में से एक हैं. हालांकि यह कभी नगर पालिका के सदस्य भी नहीं रहे हैं, कभी एमएलए का भी चुनाव नहीं लड़े. यह इनका पहला चुनाव है. इससे पहले कई बार इनका नामांकन ज़रूर दाख़िल होता था लेकिन हर बार वापस ले लिया जाया था. यह पहली बार है कि इनका नामांकन हुआ है."
मीडिया में सोमवार सुबह से सुर्ख़ियों में यह छाया हुआ था कि आज़म ख़ान की पत्नी तन्ज़ीन फ़ातिमा को रामपुर से चुनाव लड़ाया जाएगा, लेकिन दोपहर आज़म ख़ान ने सपा कार्यालय में आसिम राजा को उम्मीदवार बनाया.
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क्या है भाजपा की रामपुर रणनीति?
रामपुर लोकसभा क्षेत्र में क़रीब 16 लाख से अधिक मतदाता हैं. रामपुर क्षेत्र में कुल 50.57 % मुस्लिम आबादी है. रामपुर क्षेत्र में कुल 45.97% हिंदू जनसंख्या है.
मुस्लिम बहुल सीट होने के बावजूद बीजेपी तीन बार रामपुर में लोक सभा चुनाव जीत चुकी है. लेकिन इस बार पार्टी ने आज़म ख़ान के क़रीबी रहे घनश्याम लोधी को टिकट दिया है.
लोधी को टिकट मिलने की अहमियत समझते हुए पश्चिम उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी कहते कहते हैं, "दरसल रामपुर में 95,000 लोध राजपूत हैं. इसके अलावा दूसरी पिछड़ी जाति के लोग हैं. सैनी हैं, दूसरे लोग हैं. तो भाजपा वहाँ जो समीकरण बनाना चाहती है वो मुस्लिम बनाम हिंदू बनाने की है. क्योंकि 2014 में इसी समीकरण पर वहाँ नेपाल सिंह पार्टी भाजपा संसद बन चुके हैं. इससे पहले मुख़्तार अब्बास नक़वी हिंदू पक्ष के बड़े वोट और मुस्लिमों में बड़ा सेंध लगा कर भाजपा से जीत चुके हैं. तो भाजपा नहीं चाहती है कि वोट इकट्ठा हो जाए और किसी तरह से ना बँटे."
तो क्या था घनश्याम सिंह लोधी का आज़म खान कनेक्शन?
दोनों के क़रीबी रिश्तों को बताते हुए शादाब रिज़वी कहते हैं, "घनश्याम लोधी आज़म ख़ान के इतने क़रीबी रह चुके हैं कि वो उनकी कमज़ोरियों को जानते हैं. आज़म खान ने उन्हें दो बार एमएलसी बनवाया. कहते हैं कि इतने क़रीब थी कि उनको टिकट बक़ायदा हेलीकॉप्टर से लखनऊ से भेजा गया था. 2022 विधानसभा के चुनावों से पहले तक यह आज़म ख़ान के काफ़ी क़रीबी रहे हैं. जब आज़म ख़ान जेल चले गए थे, तब से यह थोड़ा किनारे हो गए थे. उन्हें पार्टी में तवज्जो नहीं मिली तो इन्होंने पार्टी छोड़ दी और यह भाजपा में शामिल हो गए. भाजपा चाहती है कि आज़म ख़ान को उनकी किसी ख़ास रणनीति जानने वाले सलाहकार के ज़रिए ही मात दिया जाए."

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क्यों दे रहे हैं अखिलेश यादव आज़म ख़ान को खुली छूट
इस बारे में पत्रकार शादाब रिज़वी कहते हैं कि सपा की रामपुर इकाई नहीं चाहती कि यह नाराज़गी 2024 तक खिंचे क्योंकि सपा के पास-पास भी कोई मुस्लिम चेहरा नहीं है.
शादाब रिज़वी कहते हैं, "अभी भी आज़म ख़ान एक बड़ा मुस्लिम चेहरा हैं और दूसरी बात यह है कि मुसलमान एक तरफ़ा सपा को वोट दे रहा है. लेकिन अगर आज़म ख़ान फ़िर भी दिक़्क़त करते हैं तो परेशानी होगी. उसमें कहीं न कहीं सेंध लग जाएगी. अब यह वाला मामला है."
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बसपा और कांग्रेस नहीं लड़ रही हैं चुनाव
पिछले महीने मायावती ने आज़म ख़ान को बेल मिलने में देरी पर ट्वीट किया था कि, "यूपी सरकार द्वारा अपने विरोधियों पर लगातार द्वेषपूर्ण व आतंकित कार्यवाही तथा वरिष्ठ विधायक मोहम्मद आज़म ख़ान को क़रीब सवा दो वर्षों से जेल में बन्द रखने का मामला काफ़ी चर्चाओं में है, जो लोगों की नज़र में न्याय का गला घोंटना नहीं तो और क्या है?"
और अब बसपा ने रामपुर में चुनाव नहीं लड़ने का फ़ैसला किया है. पत्रकार शादाब रिज़वी का कहना है कि, "बसपा अगर चुनाव लड़ती तो फिर सीधे सीधे भाजपा को नुकसान होता. क्योंकि पिछले विधानसभा में बसपा को भी 81,000 वोट मिले हैं. बसपा ने इस चीज़ से बचने की कोशिश की है कि मुसलमान हमसे जुड़ा नहीं."
कांग्रेस ने चुनाव शुरू होने से पहले ही घुटने टेक दिए हैं. रामपुर के नवाब परिवार से बेगम नूर बानो संसद रह चुकी हैं और उनके बेटे क़ासिम अली ख़ान चार बार विधायक रह चुके हैं लेकिन उन्हें भी कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया.
पार्टी ने ट्वीट किया कि, "भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रामपुर व आजमगढ़ लोकसभा उपचुनावों में अपने प्रत्याशी नहीं उतारेगी. विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखते हुए यह ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस स्वयं का पुनर्निर्माण करे जिससे कि 2024 के आम चुनाव में स्वयं को एक मज़बूत विकल्प के रूप में पेश कर सके."
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अब देखना यह है कि रामपुर में आसिम राजा और घनश्याम लोधी के बीच होने वाला मुक़ाबला कितना दिलचस्प होता है और आख़िरकार 26 जून को इन दोनों में से बाज़ी किनके नाम होती है.
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