आज़मगढ़: CAA के ख़िलाफ़ धरना पुलिस ने क्यों ख़त्म कराया?

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
आज़मगढ़ के बिलरियागंज क़स्बे में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ धरने पर बैठीं सैकड़ों महिलाओं के विरोध प्रदर्शन को 24 घंटों के भीतर पुलिस ने ख़त्म करा दिया है.
पुलिस का कहना है कि धरने की आड़ में शहर में दंगा भड़काने की साज़िश की जा रही थी जबकि धरने में शामिल महिलाओं ने पुलिस पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसाने और उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है.
बिलरियागंज क़स्बे के मौलाना जौहर पार्क में मंगलवार को सैकड़ों महिलाएं हाथों में तख़्तियां और पोस्टर लेकर सीएए के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गई थीं. शाम होते-होते इनकी तादाद बढ़ती गई.
पुलिस और प्रशासन के लोग ज्ञापन देकर धरना ख़त्म करने की अपील करते रहे लेकिन धरना रात भर जारी रहा.
बुधवार सुबह चार बजे पुलिस ने जबरन धरना ख़त्म कराया. आज़मगढ़ के पुलिस अधीक्षक त्रिवेणी सिंह बताते हैं, "कुछ लोग महिलाओं और बच्चों को आगे कर देश विरोधी, उत्तेजित करने वाले और ख़तरनाक नारे लगा रहे थे. जब पुलिस ने धारा 144 का हवाला देकर उन्हें रोकने की कोशिश की तो वे उग्र हो गए और पुलिस पर पथराव करने लगे."
"थाने की सरकारी जीप भी तोड़ दी. जवाब में पुलिस ने आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल भीड़ को तितर-बितर करने के लिए किया और पार्क को कब्ज़े में ले लिया. पुलिस ने 19 लोगों को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया है."
इस मामले में पुलिस ने पैंतीस लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द और सैकड़ों अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है. इन लोगों के ख़िलाफ़ देशद्रोह और कई संगीन धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया है.

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पुलिस अधीक्षक के मुताबिक़, तीन फ़रार लोगों के ख़िलाफ़ 25-25 हज़ार रुपये का इनाम भी घोषित किया गया है. गिरफ़्तार लोगों में उलेमा काउंसिल के नेता मौलाना ताहिर मदनी भी शामिल हैं.
हालांकि धरने में शामिल महिलाओं का कहना है कि धरना शांतिपूर्ण तरीक़े से चल रहा था, फिर भी सुबह अचानक पुलिस वाले जबरन उन्हें वहां से हटाने लगे और मैदान में पानी डालने लगे.
धरने में शामिल एक महिला यास्मीन ख़ान कहती हैं, "रात बारह बजे के बाद महिलाओं की तादाद काफ़ी कम हो गई थी. पार्क के बाहर मौजूद पुरुष भी कम ही संख्या में थे. पार्क के भीतर क़रीब डेढ़ सौ महिलाएं थीं जो नमाज़ पढ़ रही थीं. पुलिस वालों ने पहले धमकाने की कोशिश की लेकिन हम लोग नहीं उठे."
"क़रीब चार बजे पार्क के बाहर मौजूद लड़कों को पकड़कर मारना शुरू कर दिया और हमें गालियां देने लगे. देखते ही देखते वो पार्क में पानी भरने लगे, हवाई फ़ायर करने लगे और लाठियों से हमें पीटकर भगाना शुरू कर दिया."
एक प्रत्यक्षदर्शी दानिश ने बीबीसी को बताया, "कई महिलाओं को चोटें आई हैं, एक महिला का सिर फट गया है और बड़ी संख्या में औरतों को हिरासत में लिया गया है."
हालांकि पुलिस के मुताबिक, सिर्फ़ एक महिला को हिरासत में लिया गया था जिसे बाद में छोड़ दिया गया.

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पुलिस ने लगाया पत्थरबाज़ी का आरोप
बताया जा रहा है कि जब उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों में सीएए के विरोध में प्रदर्शन शुरू हुए थे उस वक़्त भी बिलरियागंज में महिलाएं लामबंद हो रही थीं.
दो बार पुलिस ने उन्हें समझाकर शांत कर दिया था और उन्हें धरने पर बैठने से रोका था. लेकिन मंगलवार को जब सैकड़ों की संख्या में महिलाएं जौहर अली पार्क में इकट्ठा हो गईं तो पुलिस और प्रशासन की उन्हें समझाने की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं.
आज़मगढ़ के ज़िलाधिकारी नागेंद्र प्रताप सिंह ने बीबीसी को बताया, "हमारे समझाने के बाद कई महिलाएं वापस चली गईं लेकिन बाहर गलियों में मौजूद कुछ लड़के उन्हें दोबारा पार्क में भेज रहे थे. 18-20 साल के ये लड़के तमाम तरीक़े से महिलाओं को भड़का रहे थे."
"उन लड़कों पर जब सख़्ती की गई तो उन्होंने पुलिस वालों पर पत्थरबाज़ी शुरू कर दी. कई पुलिसकर्मियों को चोटें भी आई हैं. ज़िले के तमाम अधिकारी वहां मौजूद थे. मजबूरन हमें आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. हमने लड़कों को गिरफ़्तार किया तो उसके बाद महिलाएं ख़ुद ही वहां से चली गईं. क्योंकि महिलाएं पहले से ही जाने के लिए तैयार थीं, उन्हें जबरन कुछ लोग बैठने के लिए भड़का रहे थे."
डीएम ने बताया कि पकड़े गए लड़के ज़्यादातर उलेमा काउंसिल से संबंध रखते हैं और लड़कों के बयान के आधार पर ऐसा लग रहा है कि इन लोगों ने ही धरने की योजना बनाई. डीएम के मुताबिक़, इसकी जांच की जा रही है और गिरफ़्तारियां जारी हैं.

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पुलिस पर ताक़त के इस्तेमाल का आरोप
धरना ख़त्म कराने के बाद पुलिस ने जौहर अली पार्क में पानी भर दिया.
डीएम भले ही दावा कर रहे हों कि महिलाएं ख़ुद ही वापस चली गईं लेकिन धरने में शामिल महिलाओं का आरोप है कि पुलिस ने महिलाओं पर लाठियां चलाईं, पकड़कर मारा-पीटा और पथराव करते हुए वहां से खदेड़ा. पार्क के आस-पास बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है.
वहीं, शांतिपूर्वक चल रहे प्रदर्शन को जबरन ख़त्म कराने को लेकर पुलिस की आलोचना भी हो रही है. ख़ुद पुलिस वाले भी ये मान रहे हैं कि धरना शांतिपूर्वक चल रहा था, ऐसे में बल प्रयोग करके उन्हें हटाने की क्या ज़रूरत थी, जबकि राज्य के अन्य हिस्सों मे भी इस तरह के प्रदर्शन हो रहे हैं.
स्थानीय पत्रकार सुधीर सिंह कहते हैं, "आज़मगढ़ में अपराध का ग्राफ़ जिस तरह से बढ़ा है और पुलिस प्रशासन बैकफ़ुट पर है, उससे ध्यान हटाने के लिए पुलिस ने धरने को औज़ार बनाया. अपराध की स्थिति ये है कि अपनी ही शादी में जा रहे दूल्हे को उसी दिन बारात में गोली मारकर हत्या कर दी जाती है, अफ़ग़ानी नागरिक फ़र्ज़ी पते से पासपोर्ट बनवा ले रहे हैं, आए दिन हत्या, बलात्कार हो रहे हैं."
"इन सब नाकामियों को छिपाने का यह अच्छा तरीक़ा था. अन्यथा प्रदर्शनकारी महिलाओं से उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं थी. पकड़े गए ज़्यादातर लड़के स्थानीय ही हैं और वालंटियर की तरह से महिलाओं की मदद के लिए वहां खड़े थे."
पुलिस का कहना है कि स्थिति शांतिपूर्ण है लेकिन इस मामले को लेकर लोगों में नाराज़गी भी है. आज़मगढ़ के शिबली नेशनल कॉलेज में इसे लेकर एक बैठक भी हुई है.
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