बिहार में शराबबंदी लागू है, फिर ज़हरीली शराब से कैसे मारे जा रहे हैं लोग- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
"जैसे दो-तीन दिन पहले शराब पीकर लोग मरने लगे, तो उन्हें (बाबूजी को) मना भी किए, लेकिन वो माने नहीं. वो रोज़ शराब पी लेते थे. खिरियांवां बाजार से उनको बराबर शराब मिल जाती थी. शराबबंदी जैसी कोई बात ही नहीं है." - रमेश पासी
"मेरा कुछ नहीं है. मेरा छह साल का बेटा भी गुज़र गया. मेरा आदमी भी 16 साल पहले गुजर गया और अब जवान बेटा भी नहीं रहा. मेरा घर चलाने वाला कोई नहीं बचा. मेरे आगे-पीछे कोई नहीं है. जो शराब बंद हो जाती, तो मेरे साथ ऐसी घटना तो नहीं घटती, और सिर्फ़ मेरे साथ ही तो ऐसा नहीं हुआ है. बहुतों के साथ ऐसा हुआ है." - विभा कुँवर
रमेश पासी (30 साल) ने जहाँ अपने पिता (नन्हकू पासी- 55) वर्ष को अपनी आंखों के सामने मरते देखा है.
वहीं विभा कुँवर (45 साल) अपने बेटे (राहुल मिश्रा- 24) को तमाम कोशिशों के बावजूद बचा न सकीं.
ये ऐसे लोगों के परिजन हैं, जिन्होंने शराब पीने की वजह से अपने बेहद करीबियों को खोया है, बावजूद इसके कि बिहार में आधिकारिक तौर पर शराबबंदी लागू है.

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बिहार के औरंगाबाद ज़िले से 21 मई को ज़िले में ज़हरीली शराब पीने से पहली मौत का मामला सामने आया. अगले दिन कुछ और मौतें, और देखते ही देखते मौतों का आँकड़ा बढ़ता चला गया.
औरंगाबाद ज़िले के मदनपुर ब्लॉक के अंतर्गत बेरी और खिरियांवां गांव के साथ ही आसपास के कई गावों के दर्जनों घरों में आज मातम पसरा है. उन्हीं मातमी घरों में से एक घर श्यामजी रविदास का भी है.
वे नज़दीक के खिरियांवां बाज़ार में पोलदारी का काम किया करते थे, और यदि किस्मत ठीक रही तो रोज़ाना 200-300 रुपये तक कमा लिया करते थे. वे अपने पीछे अपनी पत्नी, दो बेटे और एक बेटी के साथ ही दो सप्ताह पहले उनके घर आई बहू को छोड़ गए हैं.

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श्यामजी रविदास (40 साल) के बड़े बेटे सुरेन्द्र रविदास (18 साल) बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि वे तो अनपढ़ हैं. हैदराबाद में मज़दूरी किया करते थे लेकिन अब तो वहां जाना नहीं हो सकेगा. पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अब उन पर ही है. मां पछाड़ खाकर जहां-तहां गिर रही है. आख़िर उसे कौन संभालेगा? छोटी बहन और भाई को पढ़ाने की भी ज़िम्मेदारी उनके सिर आन पड़ी है. वहीं श्यामजी रविदास (दिवंगत) की पत्नी मुनिया देवी तो किसी से बातचीत करने की स्थिति में भी नहीं दिखतीं.
बिहार में साल 2016 के अप्रैल माह से आधिकारिक तौर पर शराबबंदी लागू है, लेकिन सूबे के अलग-अलग हिस्सों में पकड़ी जाने वाली शराब और ज़हरीली शराब की खेप के साथ ही होने वाली मौतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं.
सरकार जहां शराबबंदी को लेकर कई मौक़ों पर अपनी पीठ थपथपाती दिखती है, वहीं 'होम डिलिवरी' और 'शराब माफिया' जैसे शब्द लोगों के बीच आम बोलचाल का हिस्सा बन चुके हैं.

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शराब की चाहत, डिलिवरी और नेटवर्क के संदर्भ में औरंगाबाद निवासी रंजय सिंह कहते हैं, "यहां लोगों को दारू की लत पहले से लगी हुई है, वो पियेंगे ही पियेंगे. जब सप्लाई और खपत की तुलना आप दूसरे ज़िलों से करेंगे, तो आप पायेंगे कि झारखंड से बॉर्डर साझा करने की वजह से यहां सप्लाई और खपत बहुत ज्यादा है. यदि आप शहर की गलियों को कायदे से चेक करवा देंगे तो आपको यहां शराब ही शराब मिलेगी."
2021 के अक्टूबर-नवंबर महीने में भी सूबे के गोपालगंज-सिवान, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण जैसे ज़िलों से शराब पीकर एक माह के भीतर 65 से अधिक लोगों की मौत के मामले सामने आए थे. छठ पर्व के बीतते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 16 नवंबर 2021 को शराबबंदी की समीक्षा बैठक की थी. सरकार के आला मंत्री और उच्च अधिकारियों के साथ यह समीक्षा बैठक कई घंटों तक चली लेकिन इस बैठक के बाद भी शराब से होने वाली मौतों के मामले सामने आ रहे हैं.
सीएम नीतीश कुमार ने जहां समीक्षा से पहले बयान दिया था कि 'पियोगे तो मरोगे', वहीं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने सरकार पर हमला बोला था और 'समीक्षा बैठक' को 'भिक्षा बैठक' क़रार दिया था.

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औरंगाबाद में शराब से कितनी मौतें?
औरंगाबाद ज़िले के मदनपुर थानान्तर्गत रानीगंज बाजार से 21 मई को एक व्यक्ति की ज़हरीली शराब पीने से मौत की खबरें सामने आईं. उसके बाद से मदनपुर और सलैया थानान्तर्गत पड़ने वाले अलग-अलग गांवों से लोगों की मौतों के मामले सामने आने लगे.
हालाँकि स्थानीय अखबारों में छपी रिपोर्टों और पुलिस के वर्ज़न में लोगों की मौत के आँकड़े अलग-अलग हैं.
पीड़ित परिवारों के लोग मीडिया से बात करने से कतरा रहे हैं. मगर अख़बार दैनिक भास्कर के ब्यूरो हेड विपुल कुमार दावा करते हैं कि जहरीली शराब पीकर मरने वालों का आंकड़ा 20 तक पहुंच चुका हैं. हालांकि पुलिस के हिसाब से अब तक ज़िले में 12 लोगों की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है.

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औरंगाबाद जिले के पुलिस अधीक्षक कान्तेश कुमार मिश्र बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "21 तारीख के बाद हमलोगों को सूचना मिली कि मदनपुर थानान्तर्गत कुछ लोगों की मृत्यु हुई है. इस संबंध में जो कार्रवाई हुई उसमें 8 लोगों का पोस्टमॉर्टम कराया गया. इस संबंध में तीन एफआईआर हुए हैं. दो मदनपुर थाने में और एक सलैया थाने में, और इस पूरे मामले में 12 लोगों की गिरफ्तारी हुई है.''
''साथ ही विशेष अभियान चलाकर 234 लोगों को अलग-अलग जगहों से गिरफ्तार किया गया है. मदनपुर थाने के दो चौकीदारों और एंटी लिकर टास्क फोर्स के प्रभारी सब इंस्पेक्टर सुदर्शन चौधरी को निलंबित किया गया है. उनके विरुद्ध कार्यवाही शुरू की जा रही है."
पुलिस-प्रशासन भले ही अपनी ओर से मुस्तैदी और लगातार अभियान चलाकर ऐसी गतिविधियों पर लगाम कसने की बात कह रही हो लेकिन शराब की जद में आकर मरने वाले पीड़ित परिवार के परिजन पुलिस-प्रशासन के ऐसे दावों को सिरे से नकार देते हैं. इसके साथ ही वे पुलिस-प्रशासन पर गंभीर आरोप भी लगा रहे हैं.

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सलैया थानान्तर्गत पड़ने वाले बेरी गांव के रहने वाले दयानंद सिंह (25 वर्ष) ने इस बीच अपने पिता को खोया है.
वे कहते हैं, "यदि प्रशासन इसमें संलिप्त नहीं होता तो खिरियावां बाज़ार में शराब नहीं मिलती. आखिर ऐसा कैसे होता है कि प्रशासन के इलाके में पहुंचते ही दुकानें बंद होने लगती हैं. यहां खिरियावां बाज़ार में मदनपुर और सलैया दोनों थाने की पुलिस रहती है."
जब भी ज़हरीली शराब से मौत के मामले प्रकाश में आते हैं तो पुलिस-प्रशासन उन मौतों को संदिग्ध करार देती है. इसके साथ ही उन मौतों पर पर्दा डालने की अतिरिक्त कोशिशें होती हैं. जैसे बीते अप्रैल माह में ही छपरा जिले के तरैया और नवरतनपुर क्षेत्र से छह लोगों के संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत के मामले प्रकाश में आए थे. पीड़ित परिजनों का पुलिस-प्रशासन पर यह सीधा आरोप था कि उन पर बयान बदलने के लिए दबाव डाला जा रहा है.

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शराबबंदी का राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक पक्ष
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शराबबंदी को लागू रखने के पक्ष में जो दलीलें देते हैं, उन दलीलों में वे इस बात पर हमेशा ज़ोर देते हैं कि कैसे जब सूबे में शराबबंदी लागू की गई तब यह सर्वसम्मति से किया गया था. सूबे का कोई भी राजनीतिक दल इसके विरोध में नहीं था. हालांकि बीते वर्ष शराबबंदी को लेकर हुई समीक्षा बैठक से पहले भी सूबे की सरकार में साझेदार भाजपा और हम जैसी पार्टियों ने शराबबंदी पर पुनर्विचार की बातें कही थीं.
इसके साथ ही सरकार व शासन-प्रशासन चलाने वाले कई आला अफसर व नेता भी ऑफ द रिकॉर्ड (दबी ज़ुबान) यह बात स्वीकारते हैं कि शराब की तस्करी के बढ़ते मामलों को कंट्रोल करना मुश्किल होता जा रहा है.
वहीं सूबे की मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह सूबे में लागू शराबबंदी को लेकर सरकार को हमेशा कठघरे में खड़ा करते रहते हैं.
वे सीएम नीतीश कुमार पर तंज कसते हुए कहते हैं, "ऐसा राज्य और ऐसा मुख्यमंत्री इस देश में कहीं नहीं मिल सकता. मैं स्वयं उसकी तारीफ करता हूं. कौन सा ऐसा प्रदेश है जो नशे के व्यापार में 20,000 करोड़ रुपये अपनी जेब में डाल ले? नीतीश कुमार पीने वाले को तो पकड़ लेते हैं, लेकिन यह कहां से आया और कहां उसका उत्पादन हुआ. किसने होल सेल में ख़रीदा और किसने रिटेलर को बेचा यह नहीं पकड़ पाती."

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शराबबंदी के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक पक्ष के सवाल पर ए.एन.सिन्हा इन्स्टीट्यूट के पूर्व निदेशक प्रोफेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, "शराबबंदी सैद्धांतिक रूप से अच्छी चीज़ है, इसे सभी अच्छा मानते हैं, लेकिन जब सरकार शासन चलाने के बजाय समाज सुधार करने लगे तो दिक्कतें आने लगती हैं. यह सरकार का काम नहीं है. यदि सरकार मदद ही करना चाहती है तो जो पहले से नशाबंदी की मुहिम में लगे हैं, उनकी मदद करनी चाहिए. हां, सरकार चाहे तो ऐसे प्रावधान बनाए जिन्हें लागू किया जा सके. नहीं तो सरकार की भद्द पिटती है."
वे सरकार की दुविधा पर कहते हैं कि, "सरकार ने राज्य में शराबबंदी लागू की है तो वह मौतें स्वीकारती भी नहीं. यदि वह ऐसा स्वीकारेगी कि मौतें शराब पीने से हुई हैं तो विपक्ष हमलावर हो जाएगा. तो सरकार उसे राजनीतिक तौर पर स्वीकार नहीं करती."
"शराबबंदी को लागू करने के लिए जो सोशल स्क्वॉयड बनाने की जरूरत थी वो तो हुआ नहीं. धरपकड़ के नाम पर कैरियर और पेडलर पकड़े जा रहे और शराब बनानेवाले तो कहीं पकड़ में आते नहीं."
मुख्यमंत्री के गृह ज़िले के 11 साल के बच्चे सोनू को तो अभी भूले नहीं ही होंगे. जिसने सूबे के मुखिया के सामने अपनी पढ़ाई-लिखाई की गुहार लगाई और साथ ही अपने पिता के शराबी होने की बात कही. सवाल 'शराबबंदी' वाले राज्य में सोनू के पिता को शराब कैसे मिल जा रही और ज़हरीली शराब से मौतौं का सिलसिला क्यों नहीं थम रहा है?
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