बिहार में शराबबंदी पर नीतीश अड़े, लेकिन ज़मीन पर बिगड़ रहे हालात

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से

सुरूचि के शब्द लड़खड़ाते हैं. उसने अपने दोस्तों की सोहबत में पहले शराब शुरू की. फिर बात गांजा, चरस और व्हाइटनर तक पहुंच गई. नतीजा ये है कि अब वो साफ़-साफ़ बोल भी नहीं पातीं.

(रिपोर्ट में नशा की लत के लोगों के नाम बदल दिए गए हैं)

पटना के एक नशा मुक्ति केन्द्र में भर्ती सुरूचि बताती हैं, "चार दोस्तों के साथ पीना शुरू किया था. फिर अच्छा लगने लगा. बाद में जब नहीं मिलता था तो घर में तोड़ फोड़ करने लगे. उसके बाद मम्मी ने यहां भर्ती करा दिया. मेरा बड़ा भाई भी नशा करता है."

23 साल के अविनाश पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के नशा मुक्ति केन्द्र में भर्ती हैं. उनके पिता कमलेश कुमार उन्हें नालंदा से लेकर आए हैं.

कमलेश कुमार कहते हैं, "अविनाश और मेरा छोटा बेटा जो 16 साल कहा है, दोनों गांजा पीते हैं. पहले ये शराब पीते थे. यहां नशा केन्द्र में भर्ती कराया है लेकिन सारी दवाइयां बाहर से लानी पड़ती हैं."

वीडियो कैप्शन, देसी शराब कैसे बन जाती है जानलेवा?

बिहार में सुरूचि और अविनाश जैसे लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है जो 'स्विच ओवर ऑफ़ ड्रग्स' की समस्या से जूझ रहे हैं. यानी शराब नहीं मिलने पर दूसरे तरह के नशे के आदि हो जाना. राज्य में गांजे की एक पुड़िया 30 से 50 रुपये में तो चरस की एक पुड़िया 500 रुपये में उपलब्ध है.

सुरूचि बताती हैं, "दो से तीन मिनट में ही पुड़िया ख़त्म हो जाती है."

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बिहार में शराबबंदी- उड़ता बिहार

नीतीश सरकार जब साल 2005 में सत्ता में आई तो उन्होंने सरकार की शराब नीति को उदार किया. इसके नतीजे में जहां सरकार के राजस्व में बेहताशा वद्धि दर्ज हुई, वहीं शराब की दुकानों का सघन नेटवर्क भी तैयार हुआ.

शराब की इस उपलब्धता और गांव के स्तर पर भी शराब की भठ्ठी खुलने के चलते राज्य में विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हुआ. साल 2016 में राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू हुई. लेकिन तब से मादक पदार्थों की मांग बढ़ती देखी गई है.

वीडियो कैप्शन, आख़िर देसी शराब ज़हरीली कैसे बनती है?

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में बिहार में 496.3 किलो गांजा ज़ब्त हुआ था. साल 2017 के फ़रवरी माह तक ये आंकड़ा 6884.47 किलो तक जा चुका था.

शुरुआती दौर में जहां गांजा बड़ी चुनौती था वहां अब स्मैक नई परेशानी है. पटना में 1989 से दिशा नशा मुक्ति केन्द्र चला रहीं राखी शर्मा बताती हैं, "गांजा से बड़ी चुनौती स्मैक है. स्नॉट करने की प्रवृत्ति बढ़ी है. स्मैक महंगी है इसलिए लोग उसे ख़रीदने के लिए ख़ून तक बेच रहे हैं."

पटना हाईकोर्ट और शराबबंदी

नीतीश कुमार

पटना हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सितंबर 2016 में शराबबंदी क़ानून के तहत मिलने वाली सज़ा को अनुचित बताते हुए इसे ग़ैर क़ानूनी करार दिया था. लेकिन नीतीश कुमार सरकार ने नया क़ानून लाकर इसे (2016 में) गांधी जयंती पर फिर से लागू कर दिया.

इससे जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए प्रत्येक ज़िले में एक्साइज़ कोर्ट भी बनाया गया. नवगछिया कोर्ट के लोक अभियोजक परमानंद साह बताते हैं, "एक्साइज़ कोर्ट के साथ साथ एक लोक अभियोजक की नियुक्ति हुई जिसको प्रत्येक सुनवाई के लिए तक़रीबन 2200 रुपये मिलते हैं."

लेकिन इससे भी परेशानी कम नहीं हुई. पटना हाई कोर्ट ने साल 2019 में कहा था कि शराबबंदी क़ानून से जुड़े 2 लाख से ज़्यादा मामले न्यायपालिका पर बोझ हैं.

पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील और एडवोकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश चन्द्र वर्मा बताते हैं, "इस क़ानून से गंभीर मामलों की सुनवाई पर असर पड़ रहा है. प्रत्येक 100 में से 20 मामले शराब से जुड़े रहते हैं. दूसरा ये कि जो इस क़ानून के तहत जेल में गए वो ज़्यादा पिछड़े और दलित हैं."

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देसी ही नहीं विदेशी भी ज़हरीली

हाल ही में जारी हुई नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे -5 के मुताबिक़ क़ानूनी तौर पर ड्राइ स्टेट बिहार में महाराष्ट्र की तुलना में शराब का उपभोग ज़्यादा हो रहा है. शहरी क्षेत्रों में पुरुषों के बीच 15 साल से ऊपर के आयु वर्ग के 14 फ़ीसद लोग शराब का सेवन करते हैं. ग्रामीण इलाक़ों में ये 15.8 फ़ीसदी है. वहीं महिलाओं में शहरी क्षेत्रों में ये आंकड़ा 0.5 फ़ीसद और ग्रामीण इलाकों में 0.4 प्रतिशत का है.

लेकिन ये आंकड़े मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सार्वजनिक तौर पर और भी ज़्यादा आक्रामक बना रहे हैं. हाल ही में उन्होंने बयान दिया था, "जो गड़बड़ चीज़ पिएगा, वो इसी तरह जाएगा."

16 नवंबर को अधिकारियों और मंत्रियों के साथ सात घंटे की मैराथन बैठक के बाद उन्होंने यहीं दोहराया कि "न राज्य में शराब आने देंगे और न ही किसी को शराब पीने देंगे."

बिहार पुलिस मुख्यालय के आंकड़े देखें तो इस साल अक्टूबर 2021 तक 38,72,645 लीटर शराब ज़ब्त की गई है. इनमें 1,590 राज्य के बाहर के लोगों समेत 62,140 गिरफ़्तार किए गए हैं जबकि 12,200 वाहनों को ज़ब्त किया गया है. सबसे ज़्यादा शराब वैशाली ज़िले में ज़ब्त हुई. गिरफ़्तारियां सबसे अधिक पटना में दर्ज हुईं.

वहीं क़ानून बनने के बाद अब तक इसके तहत तीन लाख से ज़्यादा गिरफ्तारियां हो चुकी है और 700 से ज़्यादा कर्मचारियों (पुलिस और उत्पाद विभाग) को बर्खास्त किया जा चुका है.

लेकिन सरकार के इन दावों से इतर ज़मीन पर देशी और विदेशी दोनों ही तरह की शराब बन रही है. गोपालगंज, पश्चिमी चंपारण, सिवान, मुज़फ़्फ़रपुर, समस्तीपुर में हाल में ज़हरीली शराब से हुई मौतें इसका उदाहरण हैं. ज़हरीली शराब पीने के चलते सिर्फ़ गोपालगंज के खजूरबन्नी में ही अगस्त 2016 में छह लोगों की आंख की रोशनी चली गई थी.

सहरसा ज़िले में काम करने वाले एक शिक्षक अजीत बताते हैं, "हरियाणा का लेबल लगा कर विदेशी शराब बिक रही है जो नक़ली हैं. इसलिए अब ज़्यादातर विदेशी पीने वाले हरियाणा लेबल की शराब की सप्लाई स्वीकार नहीं करते. शराब दोगुने दाम पर बहुत आसानी से हर जगह उपलब्ध है."

महिलाओं पर प्रभाव

शराब से मौतें

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ये कहते रहे हैं कि जीविका दीदियों की मांग पर शराबबंदी का फ़ैसला लिया गया. पूर्ण शराबबंदी के बाद बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में 'बिहार में मद्दनिषेध का प्रभाव' नाम से एक अध्ययन आया था. ये अध्ययन शराबबंदी लागू होने के 6 माह बाद किया गया था.

नवादा, पूर्णिया, समस्तीपुर, पश्चिम चंपारण और कैमूर के 20 गांव पर किए गए इस अध्ययन के मुताबिक़ शराबबंदी के बाद महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा (मानसिक, शाब्दिक, शारीरिक, आर्थिक, यौन) घटी हैं. इसके अलावा परिवार का खान पान पर व्यय 1,005 रुपये से बढ़कर 1,331 रुपये हो गया है. दूध से बने उत्पादों की खपत में 17.5 फ़ीसद की वृद्धि दर्ज हुई. इसके अलावा बलात्कार, हत्या, सड़क दुर्घटना, दंगा, डकैती घटी हैं.

लेकिन महिलाएं अभी भी परेशान हैं. पंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए बीच काम कर रही शाहिना परवीन कहती हैं, "महिलाओं ने शराब बंदी की मांग अपने गांव में खुली शराब की भठ्ठी को लेकर की थी. जो अब तक बंद नहीं हुई है. शराबबंदी से पहले महिलाएं सामूहिक रूप से जाकर भठ्ठी तोड़ती थीं लेकिन अब तो स्थानीय पुलिस प्रशासन की मिलीभगत के चलते वो भी संभव नहीं रहा. क्योंकि महिलाएं ये भठ्ठी तोड़ेंगी तो सरकार का पूरा अभियान सवाल में आ जाएगा."

बिहार की महिलाओं ने सरकार के शराबबंदी के फ़ैसले का स्वागत किया था.

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दूसरी बात ये है कि महिलाओं की संख्या नशा मुक्ति केन्द्रों में न के बराबर है. नशा मुक्ति केन्द्र की राखी शर्मा कहती हैं, "सोशल टैबू के चलते महिलाएं बहुत कम इलाज के लिए आती हैं. जो आती भी हैं उनमें से बहुत कम ही इलाज पूरा कराती हैं."

वहीं अगर हाल के सालों में देखें तो शराब की होम डिलेवरी करने वाला महिलाओं का एक वर्ग तैयार हो गया है.

शराब

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खाने पीने वाले लोग शराब ढूंढते हैं..

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि शराबबंदी से बिहार में आने वाले पर्यटकों की तादाद में कमी आएगी. लेकिन बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक पर्यटकों की संख्या में इजाफ़ा हुआ है.

साल 2015 में जहां 289,52,855 (28029118 देशी- 923737 विदेशी) पर्यटक आए, वहीं 2019 में ये बढ़कर 350,83,179 (33990038 देशी- 1093141 विदेशी) हो गए.

लेकिन इन आंकड़ों से इतर पर्यटन मंत्री नारायण प्रसाद ने बीबीसी से कहा, "स्वाभाविक है कि पर्यटन पर शराबबंदी का असर पड़ा है. कोई भी कहीं घूमने जाता है तो वो आनंद लेना चाहता है. जो 'अच्छे लोग' है वो नहीं पीते हैं. उन्हें आने-जाने में कहीं कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन जो खाने-पीने वाले लोग हैं वो देखते हैं कि शराब कहां पर मिलती है, कहां पर नहीं मिलती है."

पर्यटन मंत्री के पास फिलहाल पर्यटन पर शराबबंदी के असर का कोई आंकड़ा नहीं है. लेकिन इसकी मार होटल इंडस्ट्री झेल रही है. बिहार में बोधगया एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल है. वहां क़रीब 125 गेस्ट हाउस और छोटे-बड़े होटल हैं.

बोध गया होटल एसोसिएशन के महासचिव सुदामा कुमार बताते हैं, "बोध गया में जो सभी कांफ्रेस-मीटिंग होती थीं. वो ख़त्म हो गईं. ग़ैर-बौद्ध जो यहां इन्जॉय करने आते थे वो भी आना बंद हो गए. शराबबंदी के बाद बोधगया के होटल 40 से 50 फ़ीसद नुक़सान में चले गए हैं."

शराब बंदी

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अल्कोहल टूरिज्म- पड़ोसी राज्य बने केन्द्र

शराब से बिहार सरकार को मिलने वाले राजस्व की बात करें तो राज्य उत्पाद शुल्क उन पांच करों (बिक्री कर, स्टैम्प एवं निबंधन शुल्क, राज्य उत्पाद शुल्क, माल एवं यात्री कर और वाहन कर) में से एक था जिनसे बिहार की अर्थव्यवस्था को 93 फ़ीसद टैक्स की प्राप्ति होती थी.

साल 2010-11 में राज्य उत्पाद शुल्क से 1523 करोड़, 2011-12 में 1981, 2012-13 में 2430, 2013-14 में 3168, 2014-15 में 3217, 2015-16 में 3142, 2016-17 में ये 30 करोड़, 2017-18 में -3 करोड़ हो गया. इसी तरह से जो बीते साल की अपेक्षा वृद्धि दर जो 2010-11 में 30 फ़ीसद थी, वो 2014-5 में घटकर -2.3 (ऋणात्मक) फ़ीसद हो गई.

साफ़ है कि बिहार के राजस्व को नुकसान हुआ. और ये नुकसान दूसरे राज्यों (ख़ासतौर पर पड़ोसी राज्यों के लिए) मुनाफ़ा साबित हुआ. इसी साल जुलाई में अंग्रेज़ी अख़बार 'द टेलीग्राफ़' में 'कोडरमा इज़ बिहार गोवा पोस्ट2015 अल्कोहल बैन' छपी है. यानी झारखंड का कोडरमा जो कभी माइका (खनिज) के लिए प्रसिद्ध था वो शराबबंदी के बाद बिहार के लिए 'गोवा' बन गया है.

इस ख़बर में एक और महत्वपूर्ण पहलू ये है कि बिहार के एक डीएसपी आशुतोष कुमार कोडरमा अपने दोस्तों के साथ गए थे, जहां अचानक चली गोली में उनके एक दोस्त की मौत हो गई थी. ख़बर के मुताबिक बिहार राज्य में शराबबंदी के बाद कोडरमा के साथ साथ बोकारो, हज़ारीबाग, धनबाद, रामगढ़ में शराब की बिक्री कई गुना बढ़ गई है.

वीडियो कैप्शन, पुरानी शराब के नाम पर नकली बोतल?

मुंगेर में अधिवक्ता और वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार कहते हैं, "बिहार पुलिस ने दो चीज़ों से बहुत पैसा कमाया है- शराब और बालू. पहले शराब से जो राजस्व आता था वो शिक्षा पर लगता था. लेकिन अब तो हमारे लोग ही शादी ब्याह, मीटिंग, क़ॉन्फ़्रेंस के लिए दूसरे राज्यों में जाते है. ग़ैर-क़ानूनी शराब की सप्लाई हो रही है. हरियाणा, झारखंड और बंगाल का राजस्व बढ़ा है जबकि हमारा घाटा हो रहा है."

अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स ने भी इस संदर्भ में एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट छापी थी. उसके मुताबिक बिहार के पड़ोसी राज्य बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश के साल 2017-18 और 2018-19 के उत्पाद राजस्व, साल 2001-02 के बाद उच्चतम हैं.

जहरीली शराब

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पड़ोसी देश नेपाल

बिहार से नेपाल की सीमा सटी हुई है. राज्य के सात ज़िले पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सहरसा, अररिया, किशनगंज नेपाल के साथ सटे हुए हैं. नेपाल के बारे में कहा जाता है- सूरज अस्त, नेपाल मस्त.

नेपाल के बीरगंज में रहने वाले पत्रकार चन्द्रकिशोर कहते हैं, "हम अंतरराष्ट्रीय सीमा को पारंपरिक तौर पर 'दसगजा' कहते हैं. अगर आप दसगजा के पास जाइए तो नेपाल वाले हिस्से में दिखेगा कि शराब की भठ्ठी बड़े पैमाने पर खुल गई है. नेपाल के लोगों के लिए ये नया व्यवसाय है. वो आर्थिक तौर पर समृद्ध हुए हैं लेकिन सामाजिक बुराइयां भी आई हैं. इस पूरे काम को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है."

वहीं नेपाल की सीमा से सटे किशनगंज ज़िले के एसपी कुमार आशीष ने बीबीसी से कहा, "नेपाल से आने वाली 1291 लीटर शराब हमने जब्त की है जिसमें 99 फ़ीसद रेशमा लीचिका नाम की देशी शराब है. नेपाल से ज़्यादा बड़ी चुनौती किशनगंज ज़िले के लिए पश्चिम बंगाल के विधाननगर, दालकोला और सिलीगुड़ी हैं. जहां से हम 1 लाख लीटर से भी ज़्यादा शराब जब्त कर चुके हैं. वहां के हमने दो बड़े सरगना शाहिद रज़ा और विश्वजीत सरकार को भी गिरफ़्तार किया है."

वीडियो कैप्शन, शराब की लत

बिहार में कर्पूरी ठाकुर ने 1977 में शराबबंदी लागू की थी, लेकिन ये पाबंदी ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी थी. कर्पूरी ठाकुर की विरासत का दावा करने वाले नीतीश कुमार फिलहाल इस क़ानून को लेकर मुश्किल में हैं.

प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पहले ही अवैध शराब तस्करी को 20 हज़ार करोड़ रुपये का बता चुके हैं. वहीं सत्ता में जेडीयू की साझेदार बीजेपी ने भी इस क़ानून पर सवाल उठाया है.

पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी इस पर पहले ही सवाल उठाते रहे हैं. ऐसे में राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों ही तरह का दबाव झेल रहे नीतीश कुमार ने बिहार के सख्त आईएएस केके पाठक पर अपना दांव लगाया है. देखना होगा, इसके नतीजे क्या आते हैं.

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