BBC Hindi: बीते हफ़्ते की वो ख़ास ख़बरें जिन पर शायद आपकी नज़र न पड़ी हो

मंकीपॉक्स वायरस

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नमस्ते, कैसा रहा आपका यह हफ़्ता? हर सप्ताह की तरह सपाट या एडवेंचर वाला. आपके जीवन की भागदौड़ के बीच देश-दुनिया में भी बहुत कुछ हुआ. कई ख़बरों पर आपकी नज़र भी गई होगी लेकिन हो सकता है कि कुछ ख़बरें आपकी नज़र में आने से रह गई हों.

ख़ैर, कुछ न कुछ तो छूटता ही है. इसमें परेशानी की कोई बात नहीं. हम बीबीसी हिंदी की पांच ख़ास खबरें आपके लिए ला रहे हैं, जो शायद आपकी नज़रों से छूट गई होंगी.

मंकीपॉक्स वायरस से क्या आपको परेशान होने की ज़रूरत है?

मंकीपॉक्स, एक ऐसी बीमारी जो दशकों से अफ्रीकी लोगों में आम है लेकिन अब वो दुनिया के अन्य देशों में भी फैल रही है. ख़ासकर अमेरिका, कनाडा और कई यूरोपीय देशों में इसके मामले सामने आ रहे हैं. 11 देशों में अब तक 80 मामले पाए जा चुके हैं.

हालांकि इस बीमारी का प्रकोप अभी बहुत व्यापक तो नहीं है लेकिन कुछ देशों में आए नए मामलों ने लोगों में चिंता ज़रूर पैदा कर दिया है.

स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि एक बार फिर वायरस के फैलने का कारण क्या है इसे लेकर अधिक जानकारी नहीं है, उनका कहना है कि फिलहाल आम जनता के लिए घबराने की कोई बात नहीं है.

रश्मि देसाई

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सिद्धार्थ शुक्ला और उमर रियाज़ के साथ रिश्ते पर क्या बोलीं रश्मि देसाई?

''मैंने उसे (सिद्धार्थ शुक्ला) हमेशा ये कहा था कि वो बड़े शरीर में एक दस साल का बच्चा है, वो ऐसा ही था. उसने अपनी शर्तों पर ज़िंदगी को जिया है.''

बीबीसी हिंदी से बातचीत में रश्मि देसाई, सिद्धार्थ शुक्ला के बारे में कुछ ऐसा कहती दिख रही हैं. रश्मि और सिद्धार्थ की जोड़ी टीवी की मशहूर जोड़ियों में से एक रही है. 2017 में रश्मि देसाई और सिद्धार्थ शुक्ला ने 'दिल से दिल तक' सीरियल में साथ काम किया था.

उस दौरान दोनों के रिलेशनशिप की काफ़ी चर्चा हुई थी. बिग बॉस-13 में भी दोनों साथ दिखे थे और शो में दोनों के बीच के झगड़े ने ख़ूब सुर्खियां बटोरी थीं. शो के बाद भी सोशल मीडिया पर रश्मि और सिद्धार्थ के फैंस आपस में बहस करते नज़र आते रहते थे.

पिछले साल सितंबर में सिद्धार्थ शुक्ला का निधन हो गया था.

गोल्डन गर्ल निखत ज़रीन

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बॉक्सिंग में हिजाब पर क्या बोलीं गोल्डन गर्ल निखत ज़रीन

महिला वर्ल्ड बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर धमाका करने वाली निखत ज़रीन अब देश लौट आई हैं. महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप के 52 किलो वर्ग का ये मुकाबला तुर्की के इस्तांबुल में हुआ.

मैरी कॉम, सरिता देवी, जेनी आरएल और लेखा केसी के बाद निखत ज़रीन पांचवीं भारतीय महिला मुक्केबाज़ हैं जिन्होंने विश्व चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीता है.

हालांकि यह पहला मौक़ा नहीं है जब निखत ने देश के लिए सोना जीता है. इससे पहले वह साल 2011 में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं और अब निखत ने देश लौटने के साथ ही आगे होने वाली प्रतियोगिताओं की तैयारी शुरू कर दी है.

अपने अभी तक के सफ़र पर बीबीसी की संवाददाता सारिका सिंह से बात करते हुए निखत ने बताया कि बॉक्सिंग शुरू करने से लेकर अभी तक बहुत कुछ बदल चुका है.

ग्रीन हाइड्रोजन का हब बनेगा भारत

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ग्रीन हाइड्रोजन का हब बनेगा भारत, लेकिन कहां पहुंचा है इसका ये मिशन?

ग्रीन हाइड्रोजन एक बार फिर चर्चा में है. दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के एक सेशन के दौरान पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने कहा कि भारत ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में लीडर बन कर उभरेगा. एक ऐसे देश के लिए ये एक महत्वाकांक्षी बयान माना जा रहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है.

लेकिन दुनिया भर में नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के बढ़ते दबाव की वजह से भारत ने भी क्लीन एनर्जी को लेकर आक्रामक नीति अख्तियार कर ली है. भारत अगले कुछ वर्षों में शीर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादक देशों में शामिल होना चाहता है. मोदी सरकार ने इसी साल अपनी नेशनल हाइड्रोजन पॉलिसी का एलान किया है.

भारत की प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन दर काफी कम है और इसने अपने नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य की डेडलाइन 2050 से 2070 कर दी है. लेकिन दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन के कड़े मानकों और ईयू के देशों में निर्यात किए जा रहे सामान पर ग्रीन टैक्स जैसे नियमों ने भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के बारे में गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित किया है.

अमेरिका में गोलीबारी

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अमेरिका में क्यों नहीं रुकती बंदूकों से होती गोलीबारी?

अमेरिका में लगभग 50 साल पहले वहाँ के राष्ट्रपति लिन्डन बेन्स जॉनसन ने कहा था - "अमेरिका में अपराधों में जितने लोगों की जान जाती है उनमें मुख्य वजह आग्नेयास्त्र (फ़ायरआर्म्स) होते हैं" और "ये मुख्य तौर पर इन हथियारों को लेकर हमारी संस्कृति के लापरवाही भरे रवैये और उस विरासत का परिणाम है जिसमें हमारे नागरिक हथियारबंद और आत्मनिर्भर रहते रहे हैं".

उस समय अमेरिका में लगभग 9 करोड़ बंदूक थे. मगर आज 50 साल बाद, वहाँ और भी ज़्यादा बंदूकें हैं, साथ ही मारे जाने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है.

मंगलवार रात टेक्सस के एक प्राइमरी स्कूल में एक बंदूकधारी ने बंदूक से 21 लोगों को मार डाला जिनमें 19 बच्चे थे.

बंदूक और इस तरह के हथियारों से अमेरिका में गोलीबारी में सामूहिक हत्याओं की ख़बरें अक्सर आती रहती हैं.

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