कपिल सिब्बल पर अखिलेश यादव ने दांव क्यों लगाया?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
15 राज्यों की 57 राज्यसभा सीटों के लिए 10 जून को चुनाव होने हैं.
इसमें से 11 राज्यसभा सीटें उत्तर प्रदेश की हैं.
विधायकों के संख्याबल के हिसाब से तीन सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में आसानी से जाती नज़र आ रही हैं. वहीं 7 सीटों पर बीजेपी अपने उम्मीदवारों को आसानी से जीता पाएगी.
इसके बाद दोनों पार्टियों के पास 14 विधायकों के वोट अतिरिक्त बच भी जाएंगे.
उत्तर प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार को जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को 37 वोट की आवश्यकता होगी.
ऐसे में उत्तर प्रदेश का 11वां राज्यसभा सांसद कौन सी पार्टी का होगा, इस पर सबकी निगाहें ज़रूर टिकीं हैं.
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समाजवादी पार्टी की दलील
समाजवादी पार्टी जिन तीन चेहरों पर दांव लगा रही है उनमें जयंत चौधरी, जावेद अली और पूर्व कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल हैं.
सिब्बल निर्दलीय उम्मीदवार होंगे, जिन्हें राज्यसभा की उम्मीदवारी में सपा ने समर्थन देना का फै़सला किया है.
जयंत चौधरी और जावेद अली के नाम पर हैरानी किसी को ज़्यादा नहीं हुई. लेकिन कपिल सिब्बल पर अखिलेश यादव ने दांव क्यों लगाया इस पर चर्चा बहुत हो रही है.
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर सिंह इसके पीछे तीन वजह गिनाते हैं. पार्टी से कपिल सिब्बल का पुराना रिश्ता, वकील के तौर पर उनकी दक्षता और समाजवादियों की आवाज़ बुलंद करने में उनका योगदान.
वो कहते हैं, "कपिल सिब्बल के नाम पर हैरानी किसी को नहीं होनी चाहिए. इससे पहले भी नेताजी के समय में वो समाजवादी पार्टी की मदद से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं. इस हिसाब से उनका समाजवादी पार्टी से पुराना रिश्ता रहा है.
इतना ही नहीं बीजेपी के राज में यूपी में समाजवादियों के उत्पीड़न का दौर चल रहा है. इस दौर में हमारी आवाज़ को मज़बूत करने में कपिल सिब्बल ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जिस तरह से आज़म ख़ान साहब की उन्होंने जमानत कराने में मदद की वो सबके सामने है.
वो एक सक्षम और जायज़ उम्मीदवार हैं. राज्यसभा इसी उद्देश्य से बनाई गई है कि अलग-अलग क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स वहाँ पहुँचें, जिस खांचे में वो पूरी तरह फिट बैठते हैं."

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वकीलों का राज्यसभा भेजने का चलन
वैसे वकीलों को पार्टियों द्वारा राज्यसभा भेजे जाने का चलन कोई नया नहीं है. अखिलेश यादव ने इस कड़ी में बस एक नया नाम ही जोड़ा है.
कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और नामी वकील अभिषेक मनु सिंघवी पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सांसद हैं. टीएमसी ने उनकी उम्मीदवारी को सपोर्ट किया था, क्योंकि कांग्रेस के पास विधायक कम थे.
केटीएस तुलसी भी कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं. इस लिस्ट में आरके आनंद, सतीश मिश्रा, राम जेठमलानी जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं.
इतना ही नहीं कांग्रेस ने तो जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को भी राज्यसभा भेजा था.
इसके अलावा वकीलों और जजों को मनोनीत करके राज्यसभा भेजने का भी एक चलन है. जस्टिस रंजन गोगोई उनमें से एक हैं. वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी दूसरे बड़े नाम हैं.

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वक़ालत
यूं तो वकील के तौर पर कपिल सिब्बल ने कई पार्टियों के मुक़दमें लड़े हैं. नेशनल हेराल्ड केस में वो सोनिया गांधी और राहुल गांधी का केस भी देख रहे हैं.
आज़म खान को जमानत दिलाने का मामला सबसे ताज़ा है.
यादव परिवार में साइकिल का चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा, इसमें भी वो अखिलेश के लिए लड़े थे.
इसके अलावा राम मंदिर मामला, हिजाब मामला, एनआरसी केस, जहांगीरपुरी का बुल्डोजर मामला - इन सब मामलों में वो वकील रहे चुके हैं.
ऐसे में कुछ जानकार मान रहे हैं कि सपा ने उन्हें राज्यसभा उम्मीदवारी में समर्थन देने का फैसला करके, 'एक वकील' अपने साथ कर लिया है. तो कुछ जानकार तर्क दे रहे हैं कि आज़म ख़ान के वकील को राज्यसभा भेजकर अखिलेश, आज़म ख़ान के साथ दूरियों को नज़दीकियों में बदलना चाह रहे हैं.
आज़म ख़ान का केस लड़ने का सम्मान कपिल सिब्बल को मिला है, ये बात तो सपा नेता उदयवीर सिंह स्वीकार करते है. लेकिन वो नहीं मानते की अखिलेश यादव और आज़म ख़ान के बीच कोई दूरी है.
जहाँ तक बात अखिलेश यादव और उनके परिवार पर चल रहे क़ानूनी मामलों की है - उसमें दो मामले अहम हैं. एक है आय से अधिक सम्पत्ति का मामला और दूसरा है लैंड स्कैम केस. ऐसा दोनों मामलों के याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का दावा है.
आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में अखिलेश यादव ने इस बार के विधानसभा चुनाव के दौरान कई मीडिया रिपोर्ट्स और न्यूज़ चैनल पर दावा किया था कि मामला ख़त्म है. लेकिन सीबीआई कोर्ट में इसी साल जनवरी में याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने दोबारा अर्ज़ी लगाई है.
लोकमत ग्रुप के सीनियर एडिटर शरद गुप्ता बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि अखिलेश यादव का कपिल सिब्बल पर दांव खेलने का सबसे अहम कारण यही मामले हैं जो कोर्ट में चल रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट का इतना बड़ा वकील पार्टी के साथ होगा, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है.
वैसे समाजवादी पार्टी से कपिल सिब्बल की पुरानी नज़दीकीयों का वो ज़िक्र भी करते हैं.

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शरद गुप्ता कहते हैं, "राज्यसभा की सीट वकीलों को केस मैनेज करने या केस को राजनीतिक तौर पर मैनेज करने के लिए दी जाती है. कपिल सिब्बल जनाधार वाले नेता नहीं हैं. उनकी पहचान एक बड़े वकील की ही है. वो सपा के लिए अच्छे मैनेजर साबित हो सकते हैं."
द हिन्दू अख़बार से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार उमर राशिद कहते हैं, "राज्यसभा के चुनाव लोकसभा और विधानसभा चुनाव से कई मामलों मे अलग होते हैं. यहाँ जाति और जनाधार का रोल नहीं होता है, ना ही क्षेत्र के प्रति कोई जवाबदेही होती है, ना ही उन्हें उस प्रदेश में ही केवल काम करने की ज़रूरत होती है. उनका फंड ज़रूर होता है. इस नज़रिए से देखें तो कपिल सिब्बल की एक वकील के रूप में अपनी अलग पहचान है."
"अखिलेश ने कपिल सिब्बल पर दांव क्यों खेला ये तो उन दोनों के अलावा कोई तीसरा नहीं बता सकता, लेकिन इस सवाल में 'क्यों' से ज़्यादा अहम बात है 'असर' की. कपिल सिब्बल इस समय में अखिलेश के लिए इतने अहम क्यों हैं.
और इसका जवाब तलाशेंगे तो पाएंगे कि कपिल सिब्बल एक वरिष्ठ नेता हैं, उनका राज्यसभा का पुराना अनुभव है, वो एक अच्छे वक्ता हैं, उत्तर प्रदेश से पहले भी चुनकर आएं हैं, मुलायम परिवार के नज़दीकी भी रह चुके हैं. वक़ालत के क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के पास कोई दूसरा बड़ा नाम नहीं है. सिब्बल से अच्छा विकल्प कोई दूसरा सपा के लिए नहीं हो सकता था."

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परिवारवाद का टैग - धोने की कोशिश
कई मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसी ख़बरें भी आ रही थी कि सपा कोटे से डिंपल यादव को भी राज्यसभा भेजा जा सकता है.
लेकिन तीन नामों की सूची से उनका नाम गायब है.
समाजवादी पार्टी राज्यसभा की चौथी सीट के लिए भी कोई उम्मीदवार उतारेगी या नहीं इसको लेकर अभी तय नहीं है.
उदयवीर सिंह का कहना है कि अभी नॉमिनेशन फाइल करने का वक़्त बचा है. पार्टी चौथी सीट जीतने के लिए आश्वस्त होगी तभी चौथा उम्मीदवार उतारेगी. इस सिलसिले में वो अपने सहयोगी दलों से बातचीत भी कर रहे हैं.
ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी बार बार समाजवादी पार्टी को 'एक परिवार की पार्टी' कह कर संबोधित कर रही थी.
ऐसे में तीन में एक नाम भी यादव परिवार का ना होना - क्या परिवारवाद के टैग को धोने की एक कोशिश है?
इस पर उदयवीर सिंह कहते हैं, "टैग उसी का होता है जो असल में नहीं होता. जो टैग लगाते आए हैं, उनसे ही इस बारे में पूछें. जयंत चौधरी को राज्यसभा भेजकर सपा ने गठबंधन धर्म निभाया है. जावेद अली पहले भी हमारे सांसद रह चुके हैं. जिन जिन वर्ग से पार्टी को वोट मिला, सबको प्रतिनिधित्व दिया जाता है."

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अपनों की नाराज़गी का जोख़िम
वैसे डिंपल यादव के अलावा स्वामी प्रसाद मौर्य, इमरान मसूद का नाम भी राज्यसभा जाने वालों की लिस्ट में चर्चा में था. लेकिन उनका नंबर भी नहीं आया.
स्वामी प्रसाद मौर्य विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे. लेकिन इस बार का चुनाव वो हार गए थे.
क्या पार्टी कपिल सिब्बल जैसे बड़े नाम को दांव लगा कर अपनों की नाराज़गी मोल लेने का जोख़िम उठा रही है?
इस सवाल पर उदयवीर सिंह कहते हैं, "स्वामी प्रसाद मौर्य जी को भी आने वाले समय में उनकी योग्यता, वरिष्ठता, ज्ञान के हिसाब से पदासीन किया जाएगा."
उमर राशिद भी मानते हैं कि राज्यसभा भेज कर स्वामी प्रसाद मौर्य, इमरान मसूद जैसे नेता का बेहतर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था. समाज के जिस तबके का वो प्रतिनिधित्व करते हैं, उनका इस्तेमाल सपा राज्य की राजनीति में बेहतर कर सकती है.
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