कपिल सिब्बल ने कांग्रेस छोड़ी, पार्टी पर कितना होगा असर?

कपिल सिब्बल

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    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

'' कांग्रेस और मेरे रिश्तों में कोई खटास नहीं है.मेरे आज भी उनसे अच्छे संबंध हैं. लेकिन इस्तीफ़ा देने का वक्त आ गया था. कांग्रेस में नहीं हूं इसलिए अब इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा.''

समाजवादी पार्टी के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के लिए पर्चा दाखिल करने के बाद कपिल सिब्बल के यही शब्द थे. सिब्बल के इस बयान पर चौंकना लाज़मी है क्योंकि कांग्रेस में असंतुष्ट नेताओं के गुट जी-23 के सबसे मुखर सदस्य में उनकी गिनती होती थी.

इस्तीफ़ा देने की वजह के बारे में पूछे जाने पर सिब्बल ने कहा, '' कांग्रेस से इस्तीफ़ा देने की कोई वजह नहीं है. एक परिवार से 30-31 साल से जुड़े थे. लेकिन अब लगा कि वक्त आ गया है. मुझे अगर निर्दलीय के तौर पर सदन में जगह मिलती है तो मैं एक आज़ाद प्रतिनिधि के तौर पर संसद में आवाज़ उठाउंगा'' .

जिन कपिल सिब्बल ने खुलेआम ये कहा था कि गांधी परिवार को कांग्रेस का नेतृत्व छोड़ देना चाहिए, लेकिन उन्होंने पार्टी छोड़ते वक्त ये क्यों कहा कि उन्हें कांग्रेस से कोई गिला-शिकवा नहीं है.

'सिब्बल ने एक दरवाज़ा खुला रखा है'

कपिल सिब्बल सधे हुए राजनेता और वकील हैं. इसलिए कांग्रेस में गांधी परिवार से खुलेआम टकराने के बावजूद उन्होंने शब्दों की मर्यादा नहीं खोई.

हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा कहते हैं, '' कपिल सिब्बल कांग्रेस नेतृत्व की खामियों पर सबसे ज्यादा मुखर थे. लेकिन उन्होंने हार्दिक पटेल और सुनील जाखड़ जैसी तल्ख टिप्पणी नहीं की. उन्होंने कांग्रेस छोड़ी है, लेकिन किसी नई पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं. राज्यसभा में वह भले ही समाजवादी पार्टी के समर्थन से पहुंचेंगे लेकिन एक आज़ाद मेंबर के तौर पर अपनी बात रखेंगे. राजनीति में इसे एक दरवाज़ा खुला रखना कहा जाता है. सिब्बल ने यही किया है''

इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस के असंतुष्ट गुट G-23 के नेताओं में सिब्बल ने कांग्रेस नेतृत्व के ख़िलाफ़ सबसे खुला मोर्चा लिया था, इसलिए पार्टी नेतृत्व के साथ उनके रिश्ते काफी कड़वे हो गए थे. लिहाज़ा उनके लिए कांग्रेस में रहना अब नामुमकिन था.

कपिल सिब्बल

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क्या कांग्रेस को सिब्बल के जाने की परवाह है?

'द हिंदू' की एसोसिएट एडिटर स्मिता गुप्ता कहती हैं, '' दो साल पहले G-23 बना था. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने उनके उठाए मुद्दों को तवज्जो नहीं. उल्टे वो G-23 के नेताओं में छोटे-छोटे पद बांट कर इसमें फूट डालने लगा. आखिरकार बेचैनी और छटपटाहट में सिब्बल ने सीधे तौर पर गांधी परिवार से कांग्रेस नेतृत्व छोड़ने की मांग कर डाली''

वह कहती हैं, '' इस पर जो प्रतिक्रिया आई उससे सिब्बल को लगा कि अब पार्टी में उनका टिकना मुश्किल है. मैंने सुना कि कांग्रेस के हालिया चिंतन शिविर में उन्हें भी आने का निमंत्रण मिला था. लेकिन वो नहीं गए. उन्होंने अपने करीबियों से कहा कि वो नहीं जाएंगे. जाएंगे भी तो उनका अपमान ही होगा. ''

लेकिन क्या सिब्बल ने पार्टी में सुधार की बात न सुने जाने पर निराश होकर इस्तीफ़ा दिया या फिर उनकी नज़र राज्यसभा की सीट पर थी?

स्मिता गुप्ता कहती हैं, '' इस महीने कांग्रेस की ओर से राज्यसभा की तीन-चार सीटों के लिए नामांकन होने वाले हैं. पार्टी नेतृत्व के ख़िलाफ़ खुल कर बोलने के बाद सिब्बल को जरूर लगा होगा कि अब वे कांग्रेस से दोबारा राज्यसभा में नहीं पहुंचने वाले. सिब्बल कट्टर बीजेपी विरोधी हैं. लिहाज़ा उनके बीजेपी में जाने का सवाल ही नहीं उठता. अब वो निर्दलीय सांसद के तौर पर राज्यसभा में आवाज़ उठाएंगे. ''

कपिल राज्यसभा निर्दलीय सांसद के तौर पर भी कांग्रेस का ही काम करेंगे. यानी बीजेपी विरोधी विचारधारा की ही आवाज़ बनेंगे. लेकिन क्या कांग्रेस को इसकी परवाह है. क्या वह कपिल सिब्बल जैसे नेताओं के पार्टी से जाने और इसके असर की चिंता करती है.

कांग्रेस की असली दिक्कत

विनोद शर्मा का मानना है कि कपिल सिब्बल जाने-माने वकील और काफी अच्छे वक्ता हैं. उनका एक स्वतंत्र सदस्य के तौर पर राज्यसभा में जाना लोकतंत्र और लोकंतंत्र में बहस के लिए अच्छा साबित होगा. लेकिन कांग्रेस के लिए यह बुरा साबित होगा.

वह कहते हैं, '' कांग्रेस में जो माहौल है उसमें किसी ऐसे नेता के लिए काम करना मुश्किल है. कांग्रेस को इस बात को समझना होगा कि जब भी किसी पार्टी, संस्था या देश से टैलेंट का निकलना शुरू हो जाता है तो ये खतरे की घंटी होती है. याद कीजिये, सोवियत संघ के विघटन की शुरुआत से पहले वहां के जाने-माने लोग पश्चिमी देशों में शरण लेने लगे थे. कांग्रेस को इस बात की चिंता करनी होगी पार्टी के प्रतिभाशाली लोग इसे छोड़ कर क्यों जा रहे हैं''

वो कहते हैं, '' समस्या कांग्रेस के साथ है. जो लोग पार्टी छोड़ कर गए हैं उनका भविष्य कांग्रेस में अंधकार में नहीं था. उन्हें लगता था कि वो जिस पार्टी में हैं उसी का भविष्य अंधकार में है. असली बात यही है. ''

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क्या कांग्रेस सुधरेगी?

लेकिन कांग्रेस सुधरती क्यों नहीं दिखती? नए-पुराने नेताओं के पार्टी छोड़ने के बावजूद पार्टी में सुधार के संकेत क्यों नहीं मिल रहे हैं?

स्मिता गुप्ता कहती हैं, '' पार्टी के हालिया चिंतन शिविर में शामिल एक नेता ने बताया कि वहां कोई चिंतन नहीं हुआ. वहां विमर्श बड़े ही बंधे तरीके से हुआ. कश्मीर, पूर्वोत्तर और सांप्रदायिकता जैसे सवालों पर चर्चा हुई. इसका मतलब ये था कि आप सिर्फ बीजेपी के खिलाफ के बात करें. जिस आत्मचिंतन की ज़रूरत थी कि वह नहीं हुआ. इस बात पर बात नहीं हुई कि कांग्रेस कहां भटक गई. उसे सीटें क्यों नहीं आ रही. मतलब कांग्रेस के दोबारा खड़ा करने पर कोई बात नहीं हुई ''

वो कहती हैं, '' कांग्रेस से हाल के दिनों में कई नेता निकल गए. अश्विनी कुमार, आरपीएन सिंह, सुनील जाखड़, हार्दिक पटेल. 2017 में हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवाणी की तिकड़ी की बदौलत ही कांग्रेस ने बीजेपी को 100 से कम सीटों पर कामयाबी हासिल की थी''.

राजनीतिक विश्लेषक हाल में हार्दिक पटेल और सुनील जाखड़ और अब कपिल सिब्बल के के पार्टी से जाने के बाद भले ही कांग्रेस के भविष्य के प्रति चिंता ज़ाहिर कर रहे हों लेकिन लगता है कि पार्टी को इससे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता.

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सिविल सर्विस ठुकरा कर अपनाई वकालत

स्मिता गुप्ता कहती हैं, कपिल सिब्बल लगातार काम करने वाले नेता हैं. उनका मिजाज हरफनमौला है. वह वकील हैं. नेता भी हैं और कवि भी. वो काफी चीजों में सक्रिय हैं. इसलिए उनका जाना निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए नुकसान है. ''

कपिल सिब्बल ने भले गांधी परिवार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला हो लेकिन वे लंबे वक्त से इसके विश्वासपात्र भी रहे हैं. चांदनी चौक जैसी अहम सीट पर सिब्बल को पार्टी उम्मीदवार के तौर पर खड़ा करना पार्टी में उनकी अहमियत बयां करती है. कई अहम मौके पर वह पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार बन कर उभरे.

जालंधर में पैदा हुए कपिल सिब्बल सिविल सर्विस में चुने गए थे. लेकिन उन्होंने प्रशासनिक सेवा न चुन कर वकालत का पेशा अपनाया और तरक्की करते हुए भारत के अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल के पद तक पहुंचे.

राज्य में सिब्बल की पहली एंट्री 1998 में बिहार से हुई. 2004 में वह चांदनी चौक सीट से स्मृति ईरानी को हरा कर लोकसभा पहुंचे थे. हालांकि 2014 में वो चुनाव हार गए. लेकिन 2016 में यूपी के कोटे से राज्यसभा पहुंच गए.

2006 में वो मनमोहन सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री बने. उन्हें पहले विज्ञान और टेक्नोलॉजी मंत्रालय दिया गया. फिर वो मानव संसाधन विकास और कानून मंत्री बनाए गए.

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