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उत्तराखंडः पोता-पोती नहीं होने पर मां-बाप ने बेटे-बहू पर किया मुक़दमा
- Author, वर्षा सिंह
- पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए
बुढ़ापे में मां-बाप की देखरेख न करने और दादा-दादी बनने की ख़ुशी से वंचित रखने पर हरिद्वार में एक महिला (मां) ने अपने बेटे-बहू पर मुक़दमा किया है. साधना प्रसाद ने साल भर के भीतर दादा-दादी बनने का सुख न दे पाने की स्थिति में बेटे-बहू से पांच करोड़ रुपए मुआवज़ा देने की मांग भी की है.
साधना प्रसाद के वकील एके श्रीवास्तव कहते हैं कि मुक़दमा घरेलू हिंसा से महिला का संरक्षण अधिनियम के तहत हरिद्वार की ज़िला अदालत में दाख़िल किया गया है.
एके श्रीवास्तव कहते हैं, "साधना प्रसाद और उनके पति संजीव रंजन ने जीवन भर की जमा-पूंजी बेटे को पालने, उसका भविष्य बनाने और शादी में ख़र्च कर दी. लेकिन अब बेटे ने उनसे बातचीत तक बंद कर दी है. वे दोनों मेरे पास आए और अपनी आपबीती सुनाई. हमें लगा कि घरेलू हिंसा अधिनियम-2005 की धारा 12 के तहत अदालत में आवेदन किया जा सकता है. ये महिला के मानसिक उत्पीड़न का मामला है."
इस सवाल पर कि बच्चा पैदा करना या न करना बहू का फैसला है, श्रीवास्तव कहते हैं कि 'तभी उन्होंने विकल्प के रूप में मुआवज़ा मांगा है. उन्हें पोता-पोती के सुख से वंचित किया जा रहा है, तो इसकी भरपाई की जाए.'
साधना प्रसाद के पति 60 वर्षीय संजीव रंजन प्रसाद बीएचईल के सेवानिवृत्त इंजीनियर हैं. उनका 35 वर्षीय बेटा श्रेय सागर गुवाहाटी की एक कंपनी में पायलट है. जबकि बहू नोएडा की एक कंपनी में काम करती है. दोनों की शादी 2016 में हुई थी.
अदालत को दिए प्रार्थना पत्र में साधना प्रसाद ने बेटे-बहू और बहू के माता-पिता और उनके दो भाइयों पर भी मुक़दमा किया है. इसमें लिखा गया है कि बेटा अपने ससुराल वालों के कहने में चल रहा है और उन्होंने बेटे के वेतन पर भी क़ब्ज़ा किया हुआ है.
मां ने मांगा हिसाब
साधना प्रसाद के मुताबिक़, बेटे के पालने, पढ़ाने और उसके करियर के लिए क़रीब 2 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. उसे पायलट बनाने के लिए अमेरिका से प्रशिक्षण दिलवाया, जिसमें 35 लाख रुपए ख़र्च हुए. अमेरिका में रहने पर क़रीब 20 लाख रुपए खर्च किए. बेटे को घूमने-फिरने के लिए 65 लाख की महंगी कार खरीद कर दी, जो कि लोन पर है.
अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए बेटे की शादी धूमधाम से की. उन्हें हनीमून के लिए थाइलैंड भेजा, जिसमें 5 लाख का ख़र्च आया. लेकिन शादी के बाद से बेटे-बहू उनसे अलग हो गए.
साधना कहती हैं, "यदि हमारे बच्चे हमसे बात किए बिना ख़ुश हैं, तो उन्हें ख़ुश रहने दो. हमने उनके जीवन में हस्तक्षेप नहीं किया. लेकिन जब हमने पोता या पोती के लिए आग्रह किया तो वे बहाने बनाने लगे. उनकी शादी को 5 साल से अधिक समय बीत गया है."
वो कहती हैं, "समाज के लोग उन्हें ताना देते हैं और मानसिक उत्पीड़न कर रहे हैं. उनका वंश समाप्त होने की कगार पर है. भविष्य में उनका नाम लेने वाला कोई नहीं रहेगा, जिससे उन्हें बहुत मानसिक पीड़ा पहुंच रही है."
साधना के पति संजीव रंजन प्रसाद बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहते हैं, "हम लोग बहुत दुखी हैं. हम रिटायर्ड लोग हैं. दादा-दादी बनना चाहते हैं. बेटे की शादी के कई साल हो गए. पोता-पोती मिलने से कितनी ख़ुशी होती है. हम उस ख़ुशी से वंचित हैं."
"अदालत में जाने के अलावा हमें कुछ और समझ नहीं आ रहा था. हम उनसे लगातार बात करने की कोशिश कर रहे थे. हम उनसे जब भी पोता-पोती के लिए कहते, तो वे उसे टाल-मटोल करते."
संजीव कहते हैं कि हमारी देखरेख भी उनकी ज़िम्मेदारी है. हम पोता-पोती को पालने को तैयार हैं. इस बहाने हमारी देखरेख भी हो जाएगी. हमारा भी गुज़ारा चल जाएगा. मुझे पेंशन के नाम पर सिर्फ़ 4-5 हज़ार रुपये मिलते हैं.
'बच्चे को जन्म देना या न देना महिला का अधिकार'
लैंगिक समानता को लेकर मुखर सामाजिक कार्यकर्ता गीता गैरोला कहती हैं, "मां-बाप का नैतिक अधिकार है कि बुढ़ापे में उनकी देखभाल हो और उन्हें मानसिक-भावनात्मक मदद मिले. अपने बेटे पर उनका पूरा हक़ है और वे उससे आर्थिक देखभाल की मांग कर सकते हैं."
गैरोला आगे कहती हैं, "लेकिन बच्चे को जन्म देना या न देना किसी स्त्री का अधिकार है. पोता-पोती की मांग रखकर वे उस स्त्री के अधिकार का हनन कैसे कर सकते हैं. पोता-पोती का या उससे जुड़ी संवेदनाओं का विकल्प पैसा नहीं हो सकता. यदि कोई स्त्री मां नहीं बनना चाहती तो वंश के नाम पर उसे जबरन बच्चा पैदा करने को मजबूर नहीं किया जा सकता. बच्चे को जन्म देने की मांग का मैं विरोध करती हूं."
'असुरक्षा से उपजे हालात'
देहरादून के मनोचिकित्सक डॉ प्रियरंजन अविनाश कहते हैं कि बेटा यदि अपने मां-बाप को शारीरिक, भावनात्मक या आर्थिक ख़्याल नहीं रख रहा, तो इसका दुख होना जायज़ है.
वो कहते हैं, "हमारी संस्कृति-समाज की बुनावट ऐसी है कि अगर उनका इकलौता बेटा ही बच्चे को जन्म देना नहीं चाहता तो उन्हें बुरा लगता होगा और शायद शर्म भी आती होगी. उनमें आर्थिक असुरक्षा होगी."
डॉ अविनाश आगे कहते हैं, "साथ ही इससे उपजा दुख होगा कि उनका वंश आगे नहीं बढ़ रहा है. इसी असुरक्षा के चलते उन्होंने बेटे पर मुक़दमा करने जैसा क़दम उठाया होगा. लेकिन कोई मां-बाप अपने बच्चों से पोता-पोती या वारिस की मांग नहीं कर सकता. शादी करना या बच्चे को जन्म देना एक व्यक्ति का अपना अधिकार होता है."
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के मुताबिक़, मां-बाप अपने बच्चों से भरण-पोषण पाने के हक़दार हैं. 2019 में इस क़ानून के प्रस्तावित संशोधन में बच्चों की परिभाषा में बहू और दामाद को भी शामिल किया गया है.
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