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परिवारों के टूटने बिखरने की वजह जानते हैं आप
- Author, क्रिस्टीन रो
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
हमारे देश में परिवार को सबसे ज़्यादा अहमियत दी जाती है. लोग अपने परिवार के लिए क्या नहीं कर गुज़रते. कभी परिवार की ख़ुशी के लिए अपनी निजी ख़ुशियों की क़ुर्बानी देते हैं. तो, कभी परिवार के साथ मिल-जुलकर रहने और परिवार को ख़ुश रखना ही अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लेते हैं.
दुनिया के बहुत से देशों में परिवार को तरज़ीह देने की संस्कृति है. वहीं कुछ ऐसे देश भी हैं जहां मां-बाप और बच्चे ग़ैरों की तरह ज़िंदगी गुज़ारते हैं. ख़ुदपरस्ती इनकी संस्कृति का हिस्सा है. बुज़ुर्ग मां-बाप को साथ रखना निजी ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी माना जाता है.
पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि भूमंडलीकरण की वजह से उन देशों में भी परिवार टूट रहे हैं, जहां अकेले रहने की रिवायत नहीं है. भारत की ही बात करें तो बड़ी संख्या में लोग रोज़गार की तलाश में गांवों से शहरों में या विदेशों में पलायन कर रहे हैं.
जिसकी वजह से ना चाहते हुए भी परिवारों में एक दूरी बन रही है. यही हालात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैं और आज रिसर्च का विषय बन गए हैं.
ब्रिटेन में स्टैंड अलोन नाम की एक संस्था है, जो परिवार से अलग हो चुके लोगों की मदद करती है. इस संस्था की रिसर्च रिपोर्ट बताती है कि ब्रिटेन में हर पांचवें परिवार में कोई एक सदस्य परिवार से अलग होता है.
इसी तरह अमरीका में क़रीब दो हज़ार मांओं और उनके बच्चों पर की गई रिसर्च बताती है कि दस फ़ीसद माएं अपने बच्चों से अलग हो चुकी हैं. अमरीका की ही एक और रिसर्च बताती है कि कुछ समुदायों में मां-बाप का बच्चों से अलग होना इतना ही आम है जितना कि तलाक़ होना.
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आम चलन
स्टैंड अलोन संस्था की संस्थापक बेका ब्लैंड ख़ुद इसी तरह के तजुर्बे से गुज़री हैं. उनका अपने माता-पिता से कोई संपर्क नहीं है. इनका कहना है कि अब से पांच साल पहले तक ये बात इतनी चर्चा में नहीं थी.
लेकिन, जब से गूगल पर अकेलेपन से संबंधित शब्द को तलाशा जाने लगा ये शब्द गूगल ट्रेंड्स डेटा में सबसे ऊपर नज़र आने लगे. ख़ास तौर से कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर में तो ये शब्द गूगल पर सबसे ज़्यादा देखा गया.
बेका इसकी एक और वजह बताती हैं. उनका कहना है कि साल 2018 में ब्रिटेन के लोगों ने अपने राजकुमार प्रिंस हैरी की पत्नी मेगन मार्कल के बारे में गूगल पर सबसे ज़्यादा सर्च किया. मेगन मार्कल अमरीकियों की सर्च लिस्ट में दूसरे नंबर पर थीं.
असल में मेगन मार्कल अपने पिता से अलगाव की वजह से सुर्ख़ियों में थीं. उनके अपने पिता के साथ संबंध अच्छे नहीं रहे थे. कई और बड़े सेलेब्रिटी भी इसी तरह के अनुभव से गुज़र रहे हैं.
मिसाल के लिए साल 2018 में ही हॉलीवुड कलाकार सर एंथनी हॉपकिंस ने माना था कि पिछले बीस वर्षों में उन्होंने शायद ही कभी अपनी बेटी से बात की हो. ये चलन नामी शख़्सियतों के साथ-साथ आम लोगों की ज़िंदगी में भी आम बात बनता जा रहा है.
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अलग होने और साथ रहने की वजह
लगभग सभी देशों में आज बुज़ुर्गों के लिए ओल्ड एज हाउस बनने लगे हैं. उन्हें वहां हर तरह की सहूलतें मिल जाती हैं. जिन देशों में कल्याणकारी सुविधाएं बड़े पैमाने पर दी जाती हैं, वहां परिवार के नौजवान सदस्यों को अलग करने में कोई बुराई भी नज़र नहीं आती.
उन्हें लगता है कि हर उम्र के लोगों को हमउम्रों की ज़रूरत होती है. वो अपने बुज़ुर्गों के साथ रिश्ता मज़बूत बनाए रखने के लिए भी उनसे दूरी बना लेते हैं.ॉ
वहीं जिन देशों में सरकार की ओर से बेहतर सुविधाएं नहीं मिलतीं वहां बुज़ुर्ग, नौजवान और बच्चों के बीच मज़बूत रिश्ता और एक दूसरे से लगाव देखने को मिलता है. इसकी मिसाल हमें यूरोप के कुछ देशों में देखने को मिलती है.
इसके अलावा शिक्षा का उच्च स्तर भी अलगाव की एक वजह है. जिन लोगों के पास अच्छी शिक्षा है ज़ाहिर वो अच्छे पदों पर काम करते हैं. वो काम के सिलसिले में दूसरे देशों में जाते हैं.
इसकी वजह से माता-पिता से दूरी बन जाती है. साथ ही ऐसे परिवारों में आर्थिक रूप से लोग एक दूसरे पर निर्भर नहीं करते. लिहाज़ा उन्हें अलग होने में कोई हिचक भी महसूस नहीं होती.
ये भी देखा गया है कि जो अल्पसंख्यक समुदाय के लोग एक दूसरे से ज़्यादा क़रीब रहते हैं. उनके यहां बड़े परिवार भी एक छत के नीचे रहना पसंद करते हैं. ये भी हो सकता है कि असुरक्षा का भाव उन्हें ऐसा करने को कहता हो.
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20 साल बाद कैसा होगा समाज
रिसर्च बताती हैं कि युगांडा के परिवारों में दूरी का चलन तेज़ी से जगह बना रहा है. कम्पाला यूनिवर्सिटी की रिसर्चर स्टीफ़न वनडेरा का कहना है कि रिवायती तौर पर युगांडा में बहुत बड़े-बड़े परिवार होते हैं. पूरा कुनबा एक साथ रहता है. लेकिन हाल के कुछ दशकों में इसमें बदलाव आया है.
पहले बड़े परिवारों के बहुत से सदस्य युगांडा में गृह युद्ध के शिकार या एड्स के मरीज़ों की मदद में सारा जीवन समर्पित कर देते थे.
पर, अब हालात बदल गए हैं. अब युगांडा में 50 से ऊपर की उम्र के क़रीब 9 फ़ीसद लोगों ने अकेले जीवन गुज़ारना शुरू कर दिया है. शायद इसकी वजह शहरीकरण है.
शहरों में बड़े परिवार को साथ रखना आसान नहीं है. इसलिए भी बुज़ुर्गों के साथ अलगाव की स्थिति पैदा हो रही है. और गुज़रते दौर के साथ ये स्थिति और मज़बूत होगी.
लेकिन कुछ रिसर्चर मानते हैं कि किसी भी समाज में सांस्कृतिक मूल्य बहुत मज़बूत होते हैं. वो आसानी से ख़त्म नहीं होते. लिहाज़ा जिन समाज में परिवार के साथ रहने का चलन है वो आगे भी रहेगा. लेकिन रिसर्चर वनडेरा को यक़ीन है कि आने वाले 20 साल में स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी.
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तलाक़ और अलगाव
समाज में तलाक़ का चलन बढ़ता जा रहा है और परिवार टूट रहे हैं. इसके अलावा अलग सेक्सुअल पहचान वाले लोगों के लिए भी परिवार के साथ रहना मुश्किल हो जाता है और ख़ामोशी से अलग हो जाते हैं.
ऐसा नहीं है कि परिवार में अलगाव तेज़ी से और रातों रात हो रहा है. बल्कि ये बहुत धीरे-धीरे हो रहा है. कई बार छोटी सी घटना भी परिवार को तोड़ देती है. कहने को तो वो एक घटना होती है लेकिन उसके नतीजे दूरगामी होते हैं.
उम्र के फ़र्क़ के साथ-साथ मां और बच्चों के मूल्यों में अंतर आ जाता है. मिसाल के लिए अगर मां बहुत धार्मिक हैं और उन्होंने बच्चों को भी वहीं संस्कार दिए तो भी ज़रूरी नहीं कि बच्चे उन्हीं संस्कारों को मानें.
यहीं से टकराव की शुरूआत होती है. अलगाव की स्थिति पैदा हो जाती है. ये भी देखा गया है कि आमतौर से अलग होने वाले माता-पिता और बच्चों के बीच अलग होने की वजह को लेकर कोई संवाद नहीं होता.
इसलिए पता ही नहीं चलता कि आख़िर वजह क्या है. इसके अलावा भाई-बहनों के अलग मिज़ाज और माता-पिता का किसी एक बच्चे के प्रति गहरा लगाव भी अलगाव की वजह बन जाते हैं.
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दूसरा पहलू
अलगाव के नतीजे हमेशा ही ख़राब हों ऐसा भी नहीं. बहुत से केस में इसके नतीजे बहुत सकारात्मक रहे हैं. मिसाल के लिए कई समाज में तलाक़ को बुरा माना जाता है. लेकिन एक तल्ख़ रिश्ते में रहने से बेहतर है अलग हो जाना.
हालांकि बच्चों के लिए मुश्किल होती है. लेकिन, पति पत्नी की ज़िंदगी बेहतर हो जाती है. जिंदगी में आगे बढ़ने का मौक़े मिल जाते हैं. मर्द हो या औरत वो स्वाभाविक तौर पर आज़ाद रहना चाहता है. और अलग होने के बाद वो इस आज़ादी का मज़ा ले पाता है.
ऐसा भी नहीं है कि परिवार में अलगाव स्थाई हो या पूरे परिवार से अलगाव हो. कई मर्तबा कुछ समय बाद लोग फिर से मिल जाते हैं. वियतनाम में ऐसे बहुत से परिवार हैं जहां एलजीबीटी सदस्यों को मां-बाप अपने से अलग कर देते हैं.
लेकिन, भाई बहन उनके साथ रहते हैं. इसके अलावा परिवार से अलग होने के मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होते हैं. लेकिन ये प्रभाव जज़्बाती तौर पर मज़बूत करते हैं.
महिलाओं पर ख़ास तौर से ज़ज़्बाती तौर पर बुरा असर पड़ता है. यहां तक कि कई परिवार समाज में अलग पड़ जाते हैं. वो अपने परिवार की स्थिति के बारे में किसी से बात करने से कतराते हैं.
इस सबके बावजूद रिसर्चरों का कहना है कि जो लोग परिवार से अलग होने का फ़ैसला करते हैं, वो ज़्यादा मज़बूत इरादों वाले और आत्मनिर्भर होते हैं. हर बात के एक नहीं कई पहलू होते हैं और हर पहलू अहम होता है.
अलगाव के अगर नुक़सान हैं तो फ़ायदे भी हैं. अलगाव किसी भी व्यक्ति को समाज में अपनी पहचान बनाने और अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीने का मौक़ा देता है.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
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