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जब पहली बार महिलाओं ने मर्दों के साथ खाया खाना
- Author, गीता पांडेय
- पदनाम, बीबीसी न्यूज, दिल्ली
साथ में भोजन करना परिवारों को साथ लाता है. खाने के टेबल पर परिवार के सदस्य एक साथ जुड़ते हैं. स्वादों के साथ उन लज़ीज़ बातों का दौर शुरू होता है, जो उनके बीच के नजदीकियां बढ़ाता है.
लेकिन भारत में पांरपरिक रूप से साथ खाने की संस्कृति को बढ़ावा नहीं दिया गया है. पुरुष और बच्चों को पहले खिलाने की प्रथा रही है. बाद में घर की महिलाएं खाती हैं.
जिसका अनचाहा दुष्परिणाम देखने को मिलता है. लाखों गरीब परिवारों की महिलाएं कुपोषण की शिकार होती हैं.
महिलाएं अपने परिवार के साथ खाएं, इसके लिए अभियान चलाए जा रहे हैं. अभियान चलाने वालों का कहना है कि इसके सकारात्मक बदलाव देखने के मिल रहे हैं.
कोई नहीं जानता कि यह प्रथा कब, कैसे और कहां शुरू हुई, लेकिन पितृसत्ता के अन्य प्रतीकों की तरह, यह लोगों के दिमाग़ में पूरी तरह बैठ चुका है.
बचपन के दिनों में मैंने अपने परिवार में भी ये चीजें देखी. मेरी मां, दादी, चाची और भाभियां खाना बनाती थीं, लेकिन वे सभी सबसे आख़िर में खाना खाया करती थीं.
खाने से पहले भगवान के सामने व्यंजनों का भोग लगाया जाता था. मेरे ब्राह्मण परिवार में लोगों से पहले घर की गाय को खिलाया जाता था. मेरे दादाजी तब तक भोजन ग्रहण नहीं करते थे, जब तक उनके खाने का कुछ हिस्सा गाय को नहीं खिला दिया जाता था.
खाने की इस प्रथा के कारण घर में छोटे-मोटे मनमुटाव भी हुआ करते थे. अगर पुरुष खाने में देरी करते थे, तो महिलाओं को भी खाने के लिए इंतजार करना होता था, चाहे वे कितनी भी भूखी क्यों न हो.
मेरा परिवार ऐसा करने वाला कोई अकेला परिवार नहीं था. मेरे पड़ोसी और देश के घरों में भी ऐसा ही होता था. कई परिवारों में तो महिलाओं को अपने पतियों के जूठे बर्तन में खाना होता था.
जब कोई इसकी वजह पूछता था तो उससे कहा जाता था कि यह पुरानी प्रथा है, जो सदियों से चली आ रही है.
शहरों में पढ़ी-लिखी और कामकाजी महिलाएं अपने मनमुताबिक खाना खाती हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी यह प्रथा चलन में है.
मेरे घर में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी. लेकिन बाद में खाना खाने की इस प्रथा के कारण गरीब परिवारों में बच्चों और महिलाओं को अक्सर भूखा रहना पड़ता है.
फ्रीडम फ्रॉम हंगर इंडिया ट्रस्ट और ग्रामीण फाउंडेशन की राजस्थान पोषण परियोजना की वंदना मिश्रा कहती हैं, "कई बार ऐसा होता है कि महिलाएं खाने बैठती हैं और भोजन पर्याप्त नहीं होता."
वंदना बताती हैं कि राज्य के बांसवाड़ा और सिरोही ज़िलों में मार्च 2015 में 403 ग़रीब आदिवासी महिलाओं पर सर्वे किया गया, जिसमें एक ही घर में दो अलग-अलग चीजें देखने को मिली.
बांसवाडा में परियोजना के प्रबंधक रोहित समारिया ने बीबीसी को बताया, "पुरुषों का कहना था कि उन्हें काम पर और बच्चों को स्कूल जाना होता, इसलिए उन्हें पहले खाना होता है."
उन्होंने कहा, "हमने घर के पुरुषों और महिलाओं की थालियों को देखा. महिलाओं की थाली में वो खाना होता था जो पकाने के बर्तन की पेंदी में सटा होता था."
इस प्रवृति को तोड़ने के लिए उन्होंने एक साधारण रणनीति के तहत परिवारों को साथ खाना खाने के लिए प्रोत्साहित किया.
दो साल की यह परियोजना पूरी हो चुकी है और ये कई बदलाव लाने में सफल हुई है. पिछले महीने मैं बांसवाडा में आदिवासियों के गांव अंबापाड़ा गई थी.
मैं मंशू दामोर के घर पहुंची, मैंने देखा कि वह हरी पत्तियां काट रहे हैं. उनकी पत्नी और बहू रसोई में खाना बना रही थी.
अंबापाड़ा, देश के गरीब गांवों में से एक है, जहां 89 फीसदी लोग खुले में शौच करते हैं. बाल विवाह यहां चलन में है. साक्षरता दर काफी कम है और महिलाएं आज भी पुरुषों के सामने अपने सिर ढंकती हैं.
जब परियोजना के तहत महिलाओं और पुरुषों को साथ खाने की सलाह दी गई तो यह किसी क्रांति से कम न थी.
दामोर ने मुझे बताया कि पहले वह अपनी पत्नी बरजू के साथ कभी खाना नहीं खाते थे. उनकी बहू कर्मा उनके बगल में बैठेगी, ये तो उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था.
वह कहते हैं, "लोग कहते थे कि एक महिला अपने ससुर के सामने कैसे खा सकती है? यह हमेशा हमारी प्रथा के ख़िलाफ़ रहा है. इसलिए शुरुआत में मैंने इसका विरोध किया. यह थोड़ा अटपटा सा था."
समारिया ने कहा, "हमने जेंडर मुद्दों पर उन्हें जागरूक किया."
सिर्फ़ पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी अलग-अलग खाने की प्रथा में यकीन करती थीं. बहुत समझाने के बाद वो लोग साथ खाने को तैयार हुए. और इसके बाद महिलाओं की दुनिया में बदलाव आने लगे.
दामोर की बहू कर्मा कहती हैं, "मैं हमेशा खाना बनाती थी, खाने के वक्त बहुत कम भोजन बचता था. घर के मर्द सब्जी खा जाते थे. मुझे नमक के साथ रोटी खानी पड़ती थी. अब सब बदल गया है. अब सबको समान भोजन मिलता है."
उनकी पड़ोसी रमिला दामोर ने बताया कि उनके परिवार ने दो साल पहले पहली बार साथ ही खाना खाया था.
वह कहती हैं, "जब पहली बार मैंने साथ खाने के बारे में सुना, मैं घर गई, खाना बनाया और अपने पति से कहा कि हम लोग साथ खाना खाएंगे. अच्छा लगा."
मैंने गांव की दूसरी महिलाओं से भी बात की. उन्होंने कहा कि यह अब उनके घरों का नियम बन चुका है.
परियोजना के दो साल पूरे होने पर, बीते मई के महीने में सर्वे किया गया, जिसमें चौंकाने वाले परिणाम मिले. महिलाओं के बीच खाद्य सुरक्षा दोगुनी पाई गई. बच्चों की परवरिश महिलाओं से जुड़ी होती है. सर्वे में उनकी खाद्य सुरक्षा में भी बढ़त देखी गई.
साथ खाने की प्रथा से न सिर्फ़ पोषण का स्तर बढ़ा है, बल्कि कई अन्य सकारात्मक बदलाव भी देखे गए हैं. दमोर अब अपनी बहू को सिर ढंकने को नहीं कहते हैं.
"वह मुझे अब हाहो (ससुर) की जगह बा (पिताजी) और अपनी सास को हाहारोजी (सासू मां) की जगह आई (मां) कहकर बुलाती है."
खाना वाकई परिवारों को साथ लाता है, जैसा कि दामोर के परिवार के साथ हुआ.
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