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महाराष्ट्र: महिलाओं के इस्तेमाल किए सैनिटरी पैड्स क्यों जमा किए जा रहे हैं?
- Author, शिवा परमेश्वरन
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी तमिल
भारत में मासिक धर्म पर बोलना भी वर्जित माना जाता है, तो अगर महिलाओं के इस्तेमाल किए सैनिटरी पैड को इकट्ठा करने की बात की जाए तो सोचिए क्या प्रतिक्रिया होगी.
लेकिन पश्चिम भारत के महाराष्ट्र में स्वास्थ्यकर्मियों ने ठीक ऐसा ही किया. दरअसल, इसे ग्रामीण महिलाओं में सर्विकल कैंसर की आशंका का पता लगाने के लिए इकट्ठा किया गया है.
दुनियाभर में सर्विकल कैंसर के एक चौथाई से अधिक मरीज़ भारत में हैं.
इसके बावजूद कई कारणों से महिलाएं इसकी जांच के लिए नहीं जातीं. ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, इस पर खर्च और जांच में होने वाली परेशानी भी इसकी कुछ वजहें हैं.
ह्यूमन पैपिलोमा वायरस की जांच
कैंसर से जुड़ी एक रिसर्च के मुताबिक़ ग्रामीण महिलाएं शर्मीली होती हैं और जांच करवाने से न केवल डरती हैं, बल्कि इसे ज़रूरी भी नहीं समझतीं.
भारत में 90 फ़ीसदी से अधिक ग्रामीण महिलाएं घर के कपड़े को ही माहवारी के दौरान सैनेटरी नैपकिन के रूप में इस्तेमाल करती हैं.
टाटा मेमोरियल सेंटर और राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने इस्तेमाल की गई सैनिटरी पैड में लगे ख़ून के धब्बे से ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी इंफेक्शन की जांच की, जिसे सर्विकल कैंसर के मुख्य कारकों में माना जाता है.
इस संस्थान के प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर अतुल बुदुक कहते हैं, "ये सबसे आसान और सुविधाजनक तरीक़ा है. सर्विकल कैंसर की जांच को बड़े पैमाने पर करने में सबसे बड़ी बाधा महिलाओं की बहुत कम भागीदारी है."
इसलिए डॉक्टर बताते हैं कि महिलाओं में जब इस रोग का पता चलता है तब वो एडवांस अवस्था में फैल चुका होता है.
लगभग 5 फ़ीसदी महिलाओं में मिला वायरस
इस शोध के लिए 30 से 50 उम्र के बीच की 500 उन महिलाओं को चुना गया जिन्हें कभी कैंसर नहीं हुआ, ये शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और इनका मासिक धर्म नियमित था. इन्होंने दो साल के शोध के दौरान अपने इस्तेमाल किए सैनिटरी पैड्स शोधकर्ताओं को मुहैया कराए.
इनके इस्तेमाल किए गए पैड्स को -20 डिग्री तापमान पर रखा गया और फिर एचपीवी जांच के लिए बर्फ़ के कंटेनर में रख कर जांच केंद्र भेजा जाता था.
ख़ून के धब्बे से इनकी डीएनए जांच की गई. डॉक्टर बुदुक ने कहा, "इस जांच में 24 महिलाओं में एचपीवी पॉजीटिव पाया गया और आगे की इलाज के लिए उनकी पहचान की गई."
इसमें कॉल्पोस्कोपी तकनीक को भी शामिल किया गया, जिसमें महिला के जननांग के आंतरिक हिस्से में स्थित सर्विक्स का मुआयना किया जाता है.
इसमें यह जांच की जाती है कि कहीं सर्विक्स की कोशिकाएं असामान्य तो नहीं है और उन्हें उपचार की ज़रूरत तो नहीं है.
जननांग की सफ़ाई है बेहद ज़रूरी
शोधकर्ताओं ने महिलाओं के सामाजिक, प्रजनन इतिहास, उनके बाथरूम, शौचालय सुविधा और मासिक धर्म के दौरान वे किस तरह के नैपकिन इस्तेमाल करती हैं, इसे भी अपने अध्ययन में शामिल किया.
इस अध्ययन के नतीजे ने महिलाओं की जननांग स्वच्छता पर फ़ौरन ध्यान दिए जाने की ज़रूरत पर जोर दिया.
डॉक्टर बुदुक ने कहा, "भारत के ग्रामीण इलाकों में शौचालय की अच्छी सुविधा नहीं होने की वजह से महिलाएं अपने जननांग की अच्छे से सफ़ाई नहीं कर पातीं."
एक रिसर्च के मुताबिक जननांग की सफ़ाई नहीं करना यानी गंदा रहना डिस्प्लेज़िया और सर्विकल कैंसर के महत्वपूर्ण कारकों में रहे हैं, और इस ख़तरे को कपड़े से बने दोबारा इस्तेमाल किए जा रहे सैनिटरी पैड और बढ़ा देते हैं.
उन्होंने बताया कि भारत के गांवों में यह शोध करना बहुत आसान नहीं रहा क्योंकि यहां मासिक धर्म से जुड़े कई अंधविश्वास लोगों में व्याप्त हैं.
मासिक धर्म से जुड़े अंधविश्वास
भारतीय गांवों में मासिक धर्म से जुड़े कई अंधविश्वास हैं. आज भी कई घरों में माहवारी के दौरान महिलाओं का रसोई घर या मंदिर में प्रवेश करना वर्जित हो जाता है.
यहां तक की उन्हें किसी धार्मिक समारोह में भाग लेने से भी रोक दिया जाता है.
डॉक्टर बुदुक और उनकी टीम ने इस दौरान न केवल ग्रामीण लोगों को सर्विकल कैंसर और इससे जुड़ी जानकारियां दी बल्कि उन्होंने मासिक धर्म से जुड़े मिथकों के बारे में भी लोगों को बताया.
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