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'नाबालिग प्रेम', मां-बाप और अदालत...
- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
15 साल की वो लड़की हाई कोर्ट में चीख-चीखकर कह रही थी कि उसे अपने पति के साथ रहना है.
वो उन जख़्मों के नीले निशान भरी अदालत में सबको दिखा रही थी जो उसके घरवालों की पिटाई के बाद उसके बदन पर साफ़ नज़र आ रहे थे.
उससे मिलने से पहले मैंने सोचा था कि मैं किसी उदास सी गुमसुम लड़की से मिलने जा रही हूं. गंभीर दिखने की पूरी कोशिश करते हुए मैं उसके घर के नीचे खड़ी थी. उसने छज्जे से आवाज़ दी,''आप ही हैं ना? ऊपर आ जाइए.''
मैंने सिर उठाकर देखा तो मुझे आंखों में चमक लिए मुस्कुराती हुई किशोरी नज़र आई.
वो धीरे-धीरे बोलना शुरू करती है, ''मैंने सोच लिया था, अब चाहे जो हो जाए पीछे नहीं हटूंगी. मुझे अपनी उतनी चिंता नहीं थी जितनी उनकी. जब हमारी दोस्ती शुरू हुई, मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि हमें इतना कुछ झेलना पड़ेगा.''
दिल्ली की इस बस्ती को देखकर ये यकीन करना मुश्किल है कि यहां एक ऐसी प्रेम कहानी पल रही है जो फ़िल्मी कहानियों को भी पीछे छोड़ देती है.
19 साल का विवेक और 15 साल की सुहानी (बदला हुआ नाम) की दोस्ती चार साल पहले स्कूल में शुरू हुई थी.
कैसे हुआ प्यार
सुहानी बताती है, ''हमारी पहली मुलाक़ात स्कूल के रास्ते में हुई थी. ये पहली नज़र का प्यार नहीं था. शुरुआत दोस्ती से हुई थी. फिर नंबर एक्सचेंज हुए और हमारी बातें होने लगीं.''
विवेक ने अपने मोबाइल में कुछ तस्वीरें दिखाते हुए बताया, ''मैंने 29 दिसंबर को उसे प्रपोज़ कर दिया. उसने हां कही और हम घूमने के लिए एक मॉल में गए.''
''मैंने इनसे तीन वादे कराए थे. पहला, ये मुझे अपने परिवार से मिलाएंगे. दूसरा, मुझसे शादी करेंगे और तीसरा, अपना करियर बनाएंगे'', ये बताते हुई सुहानी का चेहरा सुर्ख़ हो जाता है.
एक तरफ़ इनका इश्क़ परवान चढ़ रहा था और दूसरी तरफ़ सुहानी के माता-पिता का पारा. उसके पिता ने उसे फ़ोन पर बात करते हुए सुन लिया था. अगले ही पल सुहानी का फ़ोन तोड़कर फेंका जा चुका था और वो पिटाई के बाद रोती हुई एक कोने में दुबक गई थी.
विवेक को इन सबका पता चलता और वो सुहानी को कुछ और दिन बर्दाश्त करने की दिलासा देता था. दोनों को यकीन था कि वो जल्द ही शादी कर लेंगे.
दिसंबर की सर्दियों में दोपहर के करीब तीन बजे होंगे. विवेक नाइट ड्यूटी के बाद घर वापस आया था. उसकी मां उसके लिए खाना गरम कर रही थीं जब सुहानी अचानक उनके घर आई. कड़कड़ाती सर्दी में उसके शरीर पर सिर्फ एक ढीला टॉप और जींस था.
उसने विवेक की बांह पकड़कर रोते हुए कहा,''यहां से चलो, अभी चलो. मेरे घरवाले तुम्हें मार डालेंगे.'' विवेक उसके साथ निकल गया.
विवेक के माता-पिता को लगा कि वो आस-पास ही कहीं जा रहे होंगे इसलिए उन्होंने दोनों को रोकने की कोशिश भी नहीं की.
विवेक ने बताया,''हम पैदल चलकर नोएडा पहुंचे और वहां हमने एक मंदिर में शादी कर ली.'' उन्होंने रात कश्मीरी गेट बस अड्डे पर बिताई.
सुहानी याद करती है, ''इन्होंने अपनी जैकेट मुझे पहना दी थी और मैं इनकी गोद में सिर रखकर सो गई थी. ये पूरी रात जागते रहे.''
फिर उन्होंने नोएडा के पास ही एक गांव में किराए पर छोटा सा कमरा ले लिया और साथ रहने लगे. सुहानी बताती है कि दोनों वहां ख़ुश थे लेकिन विवेक के परिवार को धमकियां मिल रही थीं.
पुलिस, जेल और अदालत
विवेक के माता-पिता ने थाने में उनके लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी और सुहानी के माता-पिता दिल्ली महिला आयोग जा चुके थे. इसलिए विवेक ने अपने घर में फ़ोन करके अपना ठिकाना बताया.
इस बीच मेडिकल रिपोर्ट भी आ गई थी जिसमें विवेक और सुहानी के बीच संबंध होने की बात कही गई थी. पुलिस ने विवेक को पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ़्रॉम सेक्शुअल ऑफ़ेसेंज) और बलात्कार के आरोप में जेल में डाल दिया.
उसने जेल में चार महीने बिताए. वहां रोज़ सुहानी को याद करके रोता और अपने जज़्बात एक डायरी में लिखता.
क्या इस दौरान दोनों का भरोसा नहीं डगमगाया? एक दूसरे के पलटने का डर नहीं लगा? विवेक के मन में थोड़ा डर ज़रूर था लेकिन सुहानी 'ना' में सिर हिलाती है. उसने कहा,''मैंने सब भगवान पर छोड़ दिया था.''
मामला अदालत में पहुंचा. सुहानी ने जज के सामने अपने परिवार के साथ जाने से साफ़ इनकार कर दिया.
उसने बताया,''मैंने कोर्ट में सच-सच बता दिया कि मैं इन्हें लेकर घर से निकली थी, ये मुझे नहीं. हम दोनों अपनी मर्ज़ी से साथ हैं. इस पूरे मामले में इनकी कोई ग़लती नहीं है.''
आख़िर जज ने फ़ैसला सुनाया, ''दोनों याचिकाकर्ता अपनी मर्जी से साथ हैं. ये भी नहीं कहा जा सकता कि लड़की समझदार नहीं है. लेकिन चूंकि अभी दोनों नाबालिग हैं, इन्हें साथ रहने की इजाज़त नहीं दी सकती.''
जज ने विवेक पर पोक्सो एक्ट और बलात्कार के आरोपों को ख़ारिज कर दिया.
अदालत के फ़ैसले में कहा गया कि दोनों के पिता 15 दिन में एक बार उन्हें किसी सार्वजनिक जगह पर मिलवाएंगे. इस दौरान लड़की को दिल्ली से बाहर नहीं भेजा जाएगा और ना उसकी मर्ज़ी के बगैर किसी और से उसकी शादी कराई जाएगी.
विवेक और सुहानी आज कल अपने दिन तारीखें गिनकर कट रहे हैं. उनके सामने अभी तीन साल हैं. तीन साल बाद दोनों बालिग होंगे और उनकी शादी को क़ानूनी मान्यता मिल जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के तहत नाबालिग पत्नी से सेक्स को रेप के दायरे में रखा गया है. इसलिए अब भी उनके रिश्ते की राह में कानून की अड़चनें हैं.
सब ठीक होने की उम्मीद में...
फिलहाल दोनों अपने-अपने परिवार के साथ हैं. विवेक कोई नौकरी ढूंढने की कोशिश कर रहा है और सुहानी सब कुछ ठीक होने के इंतज़ार में है.
दोनों मिलते तो नहीं पर फ़ोन पर बात ज़रूर करते हैं.
विवेक के गढ़वाली माता-पिता वाल्मीकि समुदाय की सुहानी को अपनी बहू बनाने के लिए तैयार हैं क्योंकि वो भी मानते हैं कि जो भी हुआ हो, सुहानी अच्छी लड़की है.
(इनके नाम बीबीसी की संपादकीय नीति के तहत गोपनीय रखे गए हैं.)
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