कश्मीरी मुसलमान नूर मोहम्मद डार, जो 11 सालों से कर रहे हैं मंदिर की देखरेख

नूर मोहम्मद डार

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

जम्मू और कश्मीर के अनंतनाग ज़िले के लागरीपुरा के रहने वाले एक स्थानीय मुसलमान नूर मोहम्मद डार पिछले 11 सालों से अपने गाँव के एक मंदिर की निगरानी कर रहे हैं.

नूर मोहम्मद ने 2011 में अपने गाँव से पलायन कर चुके कश्मीरी पंडितों को अपने गाँव आकर मंदिर में त्योहार मनाने का न्योता दिया था.

लागरीपुरा के मंदिर को खीर भवानी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. इस मंदिर से कुछ ही क़दमों की दूरी पर एक और छोटा सा मंदिर है. इन दोनों मंदिरों की निगरानी का काम नूर मोहम्मद ही करते हैं.

नूर मोहम्मद पेशे से कुक हैं और उनकी दो बेटियां हैं.

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'पंडितों से मिल उन्हें गाँव आने का न्योता दिया'

मोहम्मद बताते हैं कि जब उनके गाँव से पंडित पलायन कर गए तो बाद में कई बार वो अपने गाँव के उन पंडितों के पास जम्मू गए और उनसे वापस कश्मीर आने को कहा.

वो बताते हैं, "2011 तक, मैं कई बार अपने गाँव से पलायन कर चुके पंडितों के पास जम्मू गया. मैंने उन्हें वापस आने को कहा. हर बार वो गाँव के अपने मंदिर के बारे में पूछते थे. मैं उनसे कहता था कि हम उसकी देखरेख करते हैं. जब भी मैं अपने गाँव के पंडितों के पास जम्मू जाता, वो मेरी बहुत इज़्ज़त करते."

नूर मोहम्मद बताते हैं, "गाँव आकर मंदिर में त्योहार मनाने के मेरे आग्रह पर पंडितों ने मुझसे कहा कि जब उनका मन बनेगा तब हम फ़ोन पर बताएंगे. कुछ समय के बाद उनका फ़ोन आया कि वो त्योहार मनाने इस बार अपने गाँव आएंगे. गाँव के पंडितों से यह सुनने के बाद मैंने मंदिर को सजाना शुरू किया.''

उन्होंने आगे बताया, ''कई दिनों तक मंदिर सजाने के बाद आख़िरकार 21 जून, 2011 को पंडित लोग गाँव पहुंचे. जब उन्होंने मंदिर को दुल्हन की तरह सजा हुआ पाया, तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्होंने यहां खीर भवानी का त्योहार मनाया और कई दिनों तक हमारे पास ही मुसलमानों के घरों में ठहरे."

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'मुसलमानों ने कभी नहीं रोका टोका'

नूर मोहम्मद का कहना था कि 2011 से आज तक वो अपने गाँव के इस मंदिर की देखरेख कर रहे हैं.

मालूम हो कि कश्मीर में चरमपंथ शुरू होने के बाद 1990 में कश्मीर से पंडितों ने पलायन किया और भारत के अलग-अलग शहरों में जाकर रहने लगे. उस समय लागरीपुरा कश्मीरी पंडितों के कुल 31 मकान थे.

वो बताते हैं कि उनके गाँव के मुसलमानों ने कभी भी उन्हें इस बात के लिए नहीं टोका कि वो मंदिर की देखरेख क्यों करते हैं?

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नूर मोहम्मद कहते हैं कि मुसलमानों ने इस मंदिर की निगरानी करने में हमेशा उनका साथ दिया.

उनका कहना था, "मुझे आज तक इस मंदिर की निगरानी करने में कोई मुश्किल नहीं आई. अपने पड़ोसी मुसलमानों ने हमेशा मेरा साथ दिया. बल्कि मैं ये कह सकता हूँ कि हम सब ने मिलकर मंदिर की सुरक्षा की और आज भी कर रहे हैं. मुझे किसी ने यह नहीं कहा कि आप मुसलमान होकर मंदिर क्यों जाते हैं?"

'मेरे लिए मंदिर-मस्जिद ख़ुदा के घर हैं'

नूर मोहम्मद के मुताबिक़ उनके लिए मंदिर और मस्जिद एक ही जैसे हैं.

वो कहते हैं, "मेरे लिए मस्जिद और मंदिर जाना एक जैसा है. दोनों ही जगहें ख़ुदा के घर हैं. मैं मंदिर जाकर अगरबत्ती जलाता हूँ, पानी डालता हूँ, झाड़ू लगाता हूँ. मेरे मज़हब में ऐसा करने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मंदिर की निगरानी के साथ-साथ मैं अपने मज़हब का भी पालन करता हूँ.''

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उनके अनुसार, ''मैं नमाज भी पढ़ता हूँ और रोज़ा भी रखता हूँ. मंदिर जाने से मैं अपने धर्म से दूर नहीं हुआ. मुझे ऐसा करने से सुकून ही मिलता है."

नूर मोहम्मद बताते हैं कि वो इसके लिए ख़ुदा और अपने पंडित भाइयों के शुक्रगुज़ार हैं कि उन्हें इस काम के लिए चुना गया.

यह पूछने पर कि उनके दिमाग़ में मंदिर की निगरानी करने का ख़्याल कैसे आया, तो उनका कहना था, "मेरे दिमाग़ में इस बात को ख़ुदा ने ही डाला. मैं समझता हूँ कि यह एक तरह से मेरी ज़िम्मेदारी बनती थी कि मैं ऐसा करूं."

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