जम्मू-कश्मीरः लोकसभा और पंचायत चुनाव हो गए, विधानसभा में देरी क्यों?: नज़रिया

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- Author, अनुराधा भसीन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
क्या जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों के लिए तैयार है?
अगर पिछले छह महीने में राज्य में पंचायत चुनाव और फिर उसके बाद लोकसभा चुनाव कराए जा सकते हैं तो निश्चित रूप से इसका जवाब हां होना चाहिए.
बीते साल नवंबर-दिसंबर में पंचायत और इस साल अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव राज्य में सफलतापूर्वक कराए गए थे.
लेकिन इस सवाल का जवाब ज़रूरी नहीं है कि इतना सीधा-सपाट हो. यह बहुत ही बारीक हो सकता है. चुनाव कराने की संभावना के सवाल से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह लोकतांत्रिक क़वायद सचमुच में सार्थक हो सकेगा?
स्थानीय निकायों और लोकसभा के चुनावों में मतदान का प्रतिशत बहुत ही कम था, ख़ासकर दक्षिण कश्मीर के इलाक़ों में, जिसके बाद यह पूरी प्रक्रिया महज़ एक तमाशे की तरह दिखती है.
राज्य में भाजपा और पीडीपी के गठबंधन की सरकार थी. जून 2018 में दोनों ने अपनी-अपनी राहें जुदा कर लीं और राज्यपाल के हाथों में राज्य की कमान आ गई. इसके छह महीने बाद दिसंबर 2018 में राज्यपाल ने जल्दबाज़ी में विधानसभा भंग कर दिया.
राज्यपाल के इस फ़ैसले का उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी का कांग्रेस के साथ गठबंधन की कोशिशों को रोकना था.
विधानसभा भंग होने के बाद से ही राज्य में चुनाव कराया जाना बाक़ी है.

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राष्ट्रपति शासन क्यों?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि छह महीने और बढ़ाए जाने का प्रस्ताव लेकर संसद में आए.
अमित शाह का यह प्रस्ताव इस बात की ओर इशारा करता है कि केंद्र सरकार राज्य में चुनाव कराने के मूड में नहीं है.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन तब लगाया जाता है जब वहां की विधानसभा भंग कर दी गई हो.
लेकिन जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान है. इसके अनुच्छेद 92 के अनुसार विधानसभा भंग होने के बाद छह महीने के लिए राज्यपाल शासन लगाया जा सकता है.
अगर इस छह महीन के भीतर राज्य में विधानसभा चुनाव नहीं होते हैं और नई सरकार नहीं चुनी जाती है तो उस स्थिति में भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 लागू होता है और जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाता है.
तकनीकी रूप से विधानसभा के भंग होने और राज्यपाल शासन के एक साल बाद यह क़दम संवैधानिक रूप से ज़रूरी है.
जम्मू-कश्मीर पर नौ बार केंद्र का शासन रहा है और तीन बार यहां राज्यपाल के बाद राष्ट्रपति शासन लगाए जा चुके हैं.
1990 से 1996 तक भी राज्य की विधानसभा भंग रही थी.

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वोटरों का कम उत्साह
हालांकि जो चीज़ वर्तमान स्थिति को असाधारण बनाती है वो है सत्ताधारी भाजपा की हिपोक्रेटिक सोच.
जम्मू-कश्मीर के अलावा जहां भी विधानसभा चुनाव होने थे, वे सभी लोकसभा चुनाव के साथ कराए गए. सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर में ही चुनाव नहीं कराया गया. यहां सिर्फ़ लोकसभा चुनाव हुए.
भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में तीन स्तर पर सरकारें होती हैं. पहला संसदीय स्तर पर, दूसरा विधानसभा के स्तर पर और तीसरा स्थानीयक निकाय स्तर पर.
इन सभी में विधानसभा चुनाव प्रतिनिधित्व लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण समझा जाता है क्योंकि यह लोगों की ज़रूरतों को सबसे बेहतर समझता है और उसे पूरा करता है.
कश्मीर में हाल ही में हुए निकाय चुनावों के बारे में यह कहा गया था कि यह एक न दिखने वाले चुनाव की तरह था. क्योंकि इन चुनावों में वोटरों का उत्साह बहुत कम देखा गया और प्रत्याशियों तक के बारे में लोगों को पूरी तरह पता नहीं था.
100 से ज़्यादी सीटों पर मुक़ाबला हुआ ही नहीं और कई इलाक़ों में वोटिंग का प्रतिशत दहाई अंकों में पहुंच नहीं पाया. 1600 सीटों पर कोई चुनाव नहीं हो सका था.
लोकसभा चुनावों के दौरान कुछ क्षेत्रों में मतदान एक से दो प्रतिशत ही देखने को मिले थे. इतना ही नहीं, दक्षिण कश्मीर के कुछ पोलिंग बूथों पर एक भी वोट नहीं पड़े थे. यह स्थिति तब हुई जब राज्य में चार चरण में चुनाव कराए गए थे.

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देरी क्यों?
विधानसभा चुनावों में हो रही देरी केंद्र के उन दावों की पोल खोलती है जिनमें वो कहते हैं कि राज्य में क़ानून व्यवस्था बेहतर हैं.
एक ओर जहां यह कहा जा रहा है कि राज्यपाल शासन में सुरक्षा की स्थिति में सुधार हो रही है, वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है राज्य में विधानसभा चुनाव कराने के लिए सुरक्षा व्यवस्था अनुकूल नहीं है.
एक साल पहले राज्य में सत्ताधारी गठबंधन के टूटने और राज्यपाल शासन के लागू होने के बाद से कश्मीर में प्रदर्शनों, प्रतिबंधों, इंटरनेट सेवा पर रोक, रेल सेवाओं के बाधित होने, शैक्षणिक संस्थानों के बंद किए जाने, गिरफ़्तारी, छापे, झड़प, छर्रों के उपयोग और मुठभेड़ों का दौर पहले की तरह चलता रहा है, जिसमें आम नागरिक और सुरक्षा बल हताहत हुए हैं.
यह कहना बहुत मुश्किल है कि चुनाव में देरी और लोगों को दुविधा में रखने के पीछे की असल मंशा क्या है?
लेकिन हालिया घटनाक्रम भाजपा की मंशा को उजागर ज़रूर कर रहा है. राज्यपाल शासन के दौरान क्षेत्रीय दलों के नेताओं पर भ्रष्टाचार और कर चोरी के आरोप में कार्रवाई की गई है.
अगर यह सबकुछ सुशासन और बेहतर प्रशासन के नाम पर किया जा रहा है तो केवल कश्मीरी नेता ही इस कार्रवाई का सामना करने वाले नहीं होते.
अन्य दल की उपस्थिति जहां एक ओर सिकुड़ रही है, वहीं भाजपा न केवल हिंदू बहुल जम्मू और लद्दाख में बल्कि कश्मीर में भी मज़बूत हो रही है.
जहां भी कम मतदान हुए, वहां भगवा झंडा लहराया है. भाजपा इसी स्थिति को क़ायम रखना चाहती है ताकि पार्टी को बहुमत मिले.
और चुनावों में देरी उस मक़सद को पूरा करने क लिए अनुकूल है.
(लेखक कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादकहैं. ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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