कश्मीर में सरकार के वादों की हक़ीक़त

शोपियां गांव

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इमेज कैप्शन, भारत के जम्मू और कश्मीर का शोपियां गांव
    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, श्रीनगर से

भारत प्रशासित कश्मीर के कुलगाम ज़िले के नंदीमार्ग में रहने वाले 78 साल के ग़ुलाम मोहम्मद मीर 'बैक टू विलेज' के दो चरण सफलतापूवर्क ख़त्म होने के सरकार के दावों से ख़फ़ा हैं.

इसी साल जून 2019 में भारत सरकार ने 'बैक टू विलेज' नाम से एक अभियान की शुरुआत की थी. जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों को गांव में लोगों के पास जाना होता है और उनकी मांगों को सुनकर पंचायत के विकास पर काम करना होता है.

कश्मीर में सरकार के वादों की हक़ीक़त

ग़ुलाम मोहम्मद कहते हैं, " 'बैक टू विलेज' के पहले चरण में जब सरकारी अधिकारी हमारे गांव आए थे तब हमने उनके सामने अपनी मांगें रखी थीं. उन्होंने बड़े-बड़े दावे भी किए थे. लेकिन उसके बाद भी ज़मीनी स्तर पर कोई काम नहीं हुआ है."

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इमेज कैप्शन, सरकार के कश्मीर के गावों से किए वादों की हक़ीक़त

"यहां पर सड़कें ख़स्ताहाल हैं. बारिश और बर्फ़बारी के वक़्त ये सड़कें गाड़ियां चलाने लायक नहीं रहतीं. सर्दियों के मौसम में हमारे गांव में जम कर बर्फ़ पड़ती है. हमने सड़क दुरुस्त करने के अलावा एक स्वास्थ्य केंद्र और एंबुलेंस की मांग भी की थी. लेकिन ये सभी मांगे अब तक कागज़ों पर ही हैं."

"मैं चुनौती दे सकता हूं कि एक भी मांग को पूरा नहीं किया गया है. वो लोग यहां आए, काग़ज़ों पर हमारी मांगें लिखीं और फिर ग़ायब हो गए. ज़िले के डिप्टी कलेक्टर भी हमारे गांव आए थे, लेकिन उसका कोई लाभ नहीं हुआ."

कुलगाम के नंदीमार्ग गांव जाने वाली सड़क पर गाड़ियों को कई तरह की मुश्किलें आती हैं, उन्हें बार-बार थोड़ा आगे और पीछे जाकर अपना रास्ता बनाना पड़ता है क्योंकि सड़क में फिसलन अधिक होती है और इस कारण लोगों की जान को भी ख़तरा होता है.

एक वक़्त में दो गाड़ियां रास्ता पार नहीं कर सकतीं क्योंकि सड़क पर इतनी जगह अब बची ही नहीं है.

'सरकार के वादे हक़ीक़त नहीं बनते'

कश्मीर में 'सरकार के वादे हक़ीक़त नहीं बनते'

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इमेज कैप्शन, कश्मीर में 'सरकार के वादे हक़ीक़त नहीं बनते'

सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी नूर मोहम्मद भी नंदीमार्ग गांव से हैं. जब हम उनके घर पहुंचे तो वो घर के बाहर कुर्सी डाले मौसम का मज़ा ले रहे थे. बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों की तरफ़ देखते हुए उन्होंने कहा कि आप तो जानते हैं कि सरकार बड़े वादे तो करती है लेकिन उन वादों को हक़ीक़त बनते आप कम ही देखते हैं.

नूर मोहम्मद कहते हैं, "जब हमारे गांव के लोगों ने 'बैक टू विलेज कार्यक्रम के बारे में सुना तो उन्हें खुशी हुई क्योंकि उन्हें लगा कि उनकी मुश्किलें अब हल हो जाएंगी. लेकिन इस कार्यक्रम के दो चरण पूरे हो चुके हैं और हमारी एक भी मांग को गंभीरता से नहीं लिया गया है."

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इमेज कैप्शन, 'बैक टू विलेज' अभियान की अख़बार में दी गई सूचना

"हमारे गांव की कई मुश्किलें हैं - यहां पीने के पानी की समस्या है, सड़क की समस्या तो है ही, साथ ही एक स्वास्थ्य केंद्र की भी ज़रूरत है."

जून 2019 में जम्मू कश्मीर सरकार ने सीधे तौर पर लोगों से संपर्क कर उनकी समस्याओं को समझकर उनका निपटारा करने के लिए 'बैक टू विलेज' नाम से एक अभियान की शुरुआत की थी.

जून के बाद से जम्मू कश्मीर के सरकारी अधिकारियों ने दो बार गांवों का दौरा किया.

'बैक टू विलेज' अभियान के बारे में लोगों तक जानकारी पहुंचाने के लिए अख़बारों, टेलीविज़न और रेडियो पर भी बढ़-चढ़ विज्ञापन दिए गए. दावा किया गया है इसके साथ सरकार लोगों के दरवाज़ों तक पहुंचेगी.

कश्मीर में सड़कों की हालत

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इन विज्ञापनों में प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर गिरीश चंद्र मुरमु का संदेश स्पष्ट था, "आइए 'बैक टू विलेज' अभियान के दूसरे चरण में उसी तरह बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें जैसा अभियान के पहले चरण में हमने लिया था. मुझे यकीन है कि साथ में काम करने पर हम अपने गांवों का सही विकास कर सकेंगे."

'कश्मीर में अचानक बदल गए थे हालात'

शरीफ़ अहमद दमहल हांजिपुरा के ब्लॉक डेवेलपमेंट काउंसिलर हैं जिसके तहत नंदीमार्ग गांव आता है. वो इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं कि गांव के लोगों की मांगें अब तक केवल काग़ज़ों पर ही हैं और अधिकारी उनकी मांगों पर काम कर रहे हैं.

वो कहते हैं कि 'बैक टू विलेज' अभियान के पहले चरण के बाद कश्मीर में स्थितियां अनुकूल नहीं थीं जिस कारण लोगों की मांगों पर अमल नहीं हो सका.

वो कहते हैं, "लोगों का कहना सही है. ज़मीनी स्तर पर अब तक कोई काम नहीं हो पाया है. आपको पता है कि बीते चार महीनों से कश्मीर की स्थिति कैसी है? अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद कश्मीर में क्या क्या हुआ आप तो जानते हैं."

"जहां तक ' बैक टू विलेज' के पहले चरण की बात है सभी तरह के कामों का आकलन कर लिया गया है. कई गांवों के लिए वर्क ऑर्डर भी जारी किए गए हैं. उसके बाद बर्फबारी के कारण दूसरे चरण के काम में देरी हो रही है. एक और वजह जिस कारण काम में देरी हो रही है वो है संचार व्यवस्था में रुकावट होना."

"आपको पता है कि इंटरनेट यहां काम नहीं कर रहा और बिना इसके किसी भी आकलन की स्वीकृति आला अधिकारियों से नहीं ली जा सकती. हमें उम्मीद है कि पहले चरण में जो मांगे सरकार के सामने रखी गई थीं उन पर अगले 15 दिनों में काम कर लिया जाएगा."

कुलगाम के ज़िलाधिकारी डॉक्टर शौकत ऐजाज़ भट ने बीबीसी को बताया कि वो पहले गांव की ज़मीनी स्थिति का जायज़ा लेंगे जिसके बाद ही वो आगे की जानकारी साझा करेंगे.

कश्मीर में विकास की स्थिति

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'रेडियो पर सरकार सिर्फ़ झूठ बोलती है'

पांच अगस्त को भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद के कुछ हिस्सों को निरस्त कर दिया था.

इसके बाद तीन महीने तक लगातार कश्मीर में कर्फ़्यू की स्थिति रही, संचार और यातायात माध्यमों पर पाबंदी जारी रही. कश्मीर घाटी में अब भी इंटरनेट और मोबाइल प्री-पेड पर पाबंदी जस की तस है.

'बैक टू विलेज' अभियान के दूसरे चरण के तहत शोपियां के रावलपुरा गांव में अब तक कोई सरकारी अधिकारी नहीं पहुंचे हैं.

अभियान के पहले चरण के दौरान जून 2019 में रावलपुरा के गांववालों ने यहां दौरे पर आए सरकारी अधिकारियों को कई मांगों की एक सूची थमाई थी. गांववालों का आरोप है कि अब तक उनकी किसी भी मांग पर कोई काम नहीं किया गया है.

गांव के एक बुज़ुर्ग अब्दुल अज़ीज़ बताते हैं, "पहले चरण के दौरान जो अधिकारी गांव आए थे उन्होंने वादा किया था कि पंद्रह दिनों के भीतर गांव तक जाने वाली सड़क को दुरुस्त कर दिया जाएगा."

वो कहते हैं, "जून में सरकारी अधिकारी आए थे. सभी गांववालों ने उनकी बात सुनी थी. हमने उनको अपनी मुश्किलों के बारे में बताया था. हमारे गांव की सड़क यहां रहने वाले 250 परिवारों के लिए जीवनरेखा के समान है, लेकिन अब इस सड़क की स्थिति ऐसी है कि इस पर हम पैदल भी नहीं चल सकते."

"अगर कोई महिला सिर पर कोई बोझ उठा कर इस सड़क पर चले तो इसके बेहद संकरे और ऊबड़-खाबड़ होने से गिरने का ख़तरा बना रहता है. हम अपने सेब के बाग़ानों तक इसी सड़क से पहुंचते हैं."

कश्मीर में सड़कों की हालत

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"रेडियो पर सरकार सिर्फ़ झूठ बोलती है. उन्हें लगता है कि दूसरे मुल्कों को कश्मीर के बारे में सिर्फ़ ये बताएंगे कि यहां सोना भरा पड़ा है. दूसरे चरण में तो किसी एक अधिकारी ने हमारे गांव में क़दम तक नहीं रखा है. वो सिर्फ़ कागज़ तैयार करते हैं और इसी काम में सरकार ढेर सारा इंक बर्बाद कर देती है."

सरकारी अधिकारी मानते हैं कि देरी हो रही है

अधिकारियों का कहना है कि 'बैक टू विलेज' अभियान के दूसरे चरण में सरकार के दौरे के दौरान अनंतनाग के अकूरा गांव में चरमपंथियों का हमला हो गया था. इसी कारण सरकार ने चार गांवों की मुश्किलों को एक जगह में सुनने की योजना बनाई थी.

शोपियां के डिप्टी कमिश्नर यासिन चौधरी बताते हैं, "अनंतनाग में हमले के बाद हमने चार गांवों के लोगों को एक जगह बुलाने की योजना बनाई थी. पहले चरण का काम पांच अगस्त से पहले पूरा हो गया था. लेकिन आप जानते हैं कि इसके बाद कैसे यहां स्थितियों ने करवट ली. मुझे अपने इलाक़े में आने वाले गांवों की मुश्किलों के बारे में चिंता है."

कश्मीर में बिजली के खंबों की स्थिति

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उत्तरी कश्मीर के बारामुला के तंगमार्ग के गांव ड्रू ड्रगड़ में भी सरकार के इस अभियान को लेकर कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया है.

गांव के प्रमुख अब्दुल रशीद कहते हैं, "जून के महीने में हमारे गांव में 'बैक टू विलेज' की बैठक हुई थी. इसी साल नवंबर के आख़िरी सप्ताह में दूसरे चरण की बैठक भी हुई. लेकिन हमारी मांगें अभी तक पूरी नहीं हुईं हैं."

"हमने सरकार से कहा था कि हमारे गांव के कब्रिस्तान के चारों तरफ बाड़ा लगाया जाए. साथ ही पानी के कनाल की मरम्मत और बिजली के खंभे लगाने की मांग हमने की थी. आप आज भी इन खंभों की बुरी हालत देख सकते हैं."

"हमने मांग की थी कि हमारे गांव में मौजूदा माध्यमिक स्कूल की हालत को भी दुरुस्त किया जाए. हमारी मांगें काग़जों पर तो हैं लेकिन कहीं पूरी होतीं नहीं दिखतीं."

ड्रू ड्रगड़ गांव के एक और निवासी शमस दिन डार भी रशीद की हां में हां मिलाते हैं और कहते हैं कि सरकार ने ज़मीनी स्तर पर अब तक कोई काम नहीं किया.

बीबीसी ने बारामुला के डिप्टी कमिश्नर से बात करने की कई कोशिश की, लेकिन इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक उनसे संपर्क नहीं हो सका.

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