उत्तर प्रदेश चुनाव: पीएम मोदी ने बनारस में डाला डेरा, कितनी बदलेगी फ़िज़ा

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- Author, विक्रांत दुबे
- पदनाम, वाराणसी से, बीबीसी हिंदी के लिए
यूपी में सात मार्च को 54 सीटों पर होने वाले सातवें और अंतिम चरण के चुनाव में बनारस की आठ विधानसभा सीटें भी हैं. सातवें चरण में वाराणसी की वाराणसी दक्षिण, वाराणसी कैंट, वाराणसी उत्तर, रोहनिया, पिंडरा, अजगरा, सेवापुरी और शिवपुर में भी वोट डाले जाएंगे.
प्रधानमंत्री की संसदीय क्षेत्र होने के कारण वाराणसी की जनता को अपने पक्ष में करने के लिए सभी पार्टियों ने पूरी ताक़त झोंक दी है.
एक ओर पीएम नरेन्द्र मोदी से लेकर भारतीय जनता पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने वाराणसी में अपना डेरा-डंडा गाड़ दिया है.
तो दूसरी तरफ़ कांग्रेस से प्रियंका गांधी, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव भी यहां जमे हुए हैं. तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने भी वाराणसी का दौरा किया.
बीजेपी के लिए जहां वाराणसी की ये आठ सीटें प्रतिष्ठा का सवाल हैं. एसपी और कांग्रेस इन पर क़ब्ज़ा कर मोदी को ज़ोर का झटका देने की कोशिश में है.
बनारस क्यों है इतना ख़ास
प्रधानमंत्री की सीट होने के कारण क्षेत्र में जो भी कार्य होता है उसे पार्टी पूरे देश में एक मॉडल की तरह पेश करती है. कहा जाता है कि बनारस बीजेपी के विकास कार्यों का ग्लोशाइन बोर्ड है.
यहां की सड़कों, गंगा के घाट, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर के अलावा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर पर सबकी निगाहें हैं.
कॉरिडोर के ज़रिए समझा जाता है कि बीजेपी अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को भी साधने की कोशिश में है. यह कॉरिडोर बनारस के शहर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में आता है.
साल 2017 के चुनावों में बीजेपी गठबंधन ने यहां की आठों सीट पर अपना परचम लहराया था. लिहाज़ा एक सीट पर हुई हार को भी विपक्ष सीधे-सीधे पीएम मोदी की हार में रूप में प्रस्तुत करेगा.
पिछले विधानसभा चुनावों के उलट इस बार परिस्थितियां कुछ बदली हुई हैं. ओमप्रकाश राजभर बीजेपी का साथ छोड़कर अखिलेश की साइकिल पर सवार हो गये हैं और अपना दल मां-बेटी के आपसी मतभेदों के चलते दो भागों में बंट गया है. बेटी यानी अनुप्रिया पटेल अपना दल (स) बीजेपी के साथ हैं तो मां कृष्णा पटेल अपना दल (कमेरावादी) अखिलेश के साथ हो गई हैं.

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मोदी का रोड शो
स्थानीय स्तर पर प्रत्याशियों के प्रति लोगों की नाराज़गी बीजेपी के लिए मुश्किलें पैदा कर रही हैं. ऐसे में 'इलेक्शन की मशीन' कही जाने वाली बीजेपी आठों सीटों को बड़ी बढ़त से जीतने के लिए अपने तरकश के सभी तीर आज़मा रही है.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ख़ुद बनारस की सड़कों पर हैं. शुक्रवार को उन्होंने बनारस में रोड शो भी किया. ये यात्रा मलदहिया चौराहे से शुरू होकर लहुराबीर, मैदागिन चौक होते हुए विश्वनाथ कॉरिडोर पहुंची. जहां नरेन्द्र मोदी ने दर्शन-पूजा की.
कार्यक्रम में पंडित मदनमोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण भी शामिल है.
बनारस में डेरा
पिछले विधानसभा चुनावों की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री ने चुनाव के आख़िरी दौर में बनारस में डेरा जमा लिया है. तीन मार्च को बनारस पहुंचे मोदी पांच मार्च तक बनारस में बने रहेंगे.
पार्टी के लोगों का कहना है कि अलग-अलग कार्यक्रमों के ज़रिए मोदी के माध्यम से जनता को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि क्षेत्र में होने वाली जीत बीजेपी की नहीं बल्कि बनारसियों की है. लोगों का कहना है कि मोदी के रोड शो और यहां कैंप करने से प्रत्याशियों के प्रति लोगों का गुस्सा ठंडा होगा और फिज़ा भाजपा के पक्ष में जाएगी.

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पीएम नरेन्द्र मोदी के रोड शो के बाद सपा का भी रोड शो शुरू हुआ. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस रोड शो में शामिल हुए. रोड शो के लिए दो घंटे की ही अनुमति मिली थी. और इसके बाद अखिलेश यादव का रोड शो भारत माता मंदिर से रात तक़रीबन आठ बजे शुरू हुआ जो सिगरा, रथयात्रा , गुरुबाग, लक्सा होते हुये गिरजाघर पर ख़त्म हुआ.
रोड शो में भारी संख्या समाजवादी पार्टी भीड़ जुटी थी. इस दौरान रास्ते में किसी भी स्थान पर जनसभा करने की अनुमति नहीं थी. अखिलेश यादव ने गुरुवार को भी वाराणसी में ममता बनर्जी के साथ बड़ी रैली में शामिल हुये थे.

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एक नज़र आठों क्षेत्र पर:
वाराणसी शहर उत्तर-
वाराणसी के शहरी इलाक़े में इस समय मुख्य रूप से तीन सीटें हैं- शहर उत्तर, शहर दक्षिण और कैंट. आप जब शहर ट्रेन या हवाई जहाज़ से आएंगे तो एंट्री शहर उत्तर के रास्ते होगी. यहां कुल मतदाताओं की संख्या 4,26,787 है.
शहर उत्तर का जातीय समीकरण ऐसा है कि कोई भी पार्टी लम्बे समय तक इसे क़ब्ज़े में नही रख पाती. इस सीट पर 1989 से पहले कांग्रेस और जनसंघ का क़ब्ज़ा रहा. इसके बाद भाजपा और सपा आती-जाती रहीं.
यहां से तीन बार समाजवादी पार्टी और पाँच बार भाजपा को सीट हासिल करने का मौक़ा मिल चुका है.
2017 में बीजेपी के प्रत्याशी रविंद्र जयसवाल एक लाख छह हज़ार से अधिक वोट हासिल कर दूसरी बार विधायक चुने गए थे.
वहीं समाजवादी और कांग्रेस गठबंधन से सपा के प्रत्याशी अब्दुल समद अंसारी को 70515 वोट मिले थे. लगभग 32 हज़ार मत पाकर बहुजन समाज पार्टी तीसरे स्थान पर रही.
इस सीट पर मुस्लिम, यादव और वैश्य का प्रभाव ज़्यादा रहा है. 1974 से सात बार मुस्लिम उम्मीदवार विधायक बन चुके हैं.

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वाराणसी शहर दक्षिण-
बनारस का पुराना शहरी इलाक़ा इसी क्षेत्र में आता है जो पक्का महाल के नाम से जाना जाता है. पहले इस विधानसभा का अधिकांश इलाका गंगा से सटा था. लेकिन नये परिसीमन के बाद थोड़ा बदलाव आया है.
इसे ठेठ बनारसी इलाक़ा कह सकते हैं. विश्वनाथ मंदिर समेत लगभग सभी चर्चित मंदिर यहीं हैं.
बनारस का मुख्य व्यवसाय और पूरी दुनिया में चर्चित बनारसी साड़ी का गढ़ भी यही इलाक़ा है. यह सीट भाजपा के लिए बेहद मुफ़ीद रही है. यहाँ भाजपा की जीत सुनिश्चित मानी जाती है, लड़ाई तो सिर्फ़ अंतर बढ़ाने की रहती थी.
साल 1989 से लगातार इस सीट पर भाजपा का क़ब्ज़ा है. बनारस में नरेन्द्र मोदी के आने से पहले श्यामदेव राय चौधरी लगातार सात बार यहां से विधायक रहे.
पिछली बार उनकी जगह डा. नीलकंठ तिवारी को भाजपा ने टिकट दिया और मंत्री बनाया. लेकिन विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने के बाद भी बीजेपी इस सीट को लेकर सबसे ज़्यादा मुसीबत में है.
वैसे भी पिछले चुनाव में भी नीलकंठ तिवारी बनारस की सभी सीटों में सबसे कम वोटों से जीतने वाले प्रत्याशी थे.
नीलकंठ तिवारी के ख़िलाफ़ लोगों में नाराज़गी बहुत ज़्यादा है जिसका फ़ायदा समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार किशन दीक्षित को मिल रहा है.
किशन की दावेदारी को बल मिलने के दो-तीन बड़े कारण भी हैं. पहला कि वो बनारस के बड़े ही चर्चित मंदिर महा मृत्युंजय के महंत परिवार से हैं लिहाज़ा सभी मंदिरों के पुजारी और पंडा उनके साथ आ सकते हैं जो पिछली बार भाजपा के साथ रहे. इसके अलावा यादव वोट और मुस्लिम वोट इनके साथ हैं.
निषाद वोटर भी यहां अच्छे ख़ासी तादाद में हैं.
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वारणसी शहर कैंट
इस सीट पर पिछले लगभग दो दशक से बीजेपी का या यूं कहें कि एक ही परिवार का क़ब्ज़ा है.
जनसंघ के नेता रहे हरीश चंद्र श्रीवास्तव की पत्नी ज्योत्सना श्रीवास्तव ने 1991 में इस सीट से चुनाव लड़ा और जीत गईं. उसके बाद लगातार इस सीट पर उन्हीं के परिवार का वर्चस्व रहा है.
इस सीट पर चार बार ज्योत्सना श्रीवास्तव और दो बार हरीश चंद्र श्रीवास्तव विधायक हुए. साल 2017 में उनके बेटे सौरभ श्रीवास्तव इस सीट से निर्वाचित हुए और इस बार भी वही प्रत्याशी हैं.
सौरभ ने 2017 में कांग्रेस के अनिल श्रीवास्तव को 58 हज़ार से अधिक वोटों से शिकस्त दी थी.
हालांकि अनिल श्रीवास्तव इस सीट से पांच बार चुनाव लड़े हैं पर उन्हें हर बार दूसरे तीसरे नंबर पर ही संतोष करना पड़ा है.
जातिगत समीकरण की बात करें तो ऐसा माना जाता है यहां कायस्थ, ब्राह्मण, मुसलमान, कुर्मी और दलित मतदाताओं की संख्या प्रभावी है. क्षत्रिय व बनिया मतदाता इस सीट में हार और जीत का अंतर तय करते हैं.
सेवापुरी विधानसभा
वाराणसी की सेवापुरी विधानसभा सीट में ज़िले का ग्रामीण इलाका आता है. यहां कुल मतदाताओं की संख्या 3,45,294 है.
2012 में परिसीमन के बाद सेवापुरी विधानसभा की सीट अस्तित्व में आई थी.
भाजपा के सहयोगी दल अपना दल (एस) के नील रतन पटेल वर्तमान में यहां के विधायक हैं. 2017 के चुनावों में उन्होंने समाजवादी पार्टी के सुरेंद्र सिंह पटेल को 54 हज़ार से ज़्यादा वोटों से हराया था.
पटेल बाहुल्य मतदाता वाली सीट में इस बार भी बीजेपी ने वर्तमान के विधायक नील रतन पटेल को ही टिकट दिया है.
समाजवादी पार्टी से सुरेन्द्र सिंह पटेल मैदान में हैं.
क्षेत्र में पटेल मतदाताओं की बड़ी संख्या है. ब्राह्मण, दलित, क्षत्रिय व भूमिहार मतदाता भी हैं लेकिन हार जीत तय करने में पटेल बिरादरी ही निर्णायक साबित होती है.

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रोहनिया विधानसभा
इस सीट के कुछ हिस्से शहर में हैं लेकिन अधिकतर इलाक़े ग्रामीण हैं.
फिलहाल ये सीट बीजेपी के पास है. विधायक हैं सुरेन्द्र सिंह. उन्होंने 2017 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के महेंद्र सिंह को हराया था.
चुनावी गठबंधन के तहत इस बार यह सीट बीजेपी के सहयोगी दल अपना दल (एस) के खाते में चली गई है. पटेल बाहुल्य इस सीट पर यहां से चार राजनीतिक दलों ने पटेल जाति के लोगों को ही टिकट दिया है.
अपना दल (एस) ने जहां डॉ सुनील पटेल को टिकट दिया है वहीं अपना दल (कमेरावादी) ने अभय पटेल पर दांव खेला है. कांग्रेस ने राजेश्वर पटेल को मैदान में उतरा है तो बसपा ने भी अरुण पटेल के ज़रिए जातिगत समीकरण को साधने की कोशिश की है.
यह सीट पटेल बाहुल्य है लेकिन निर्णायक भूमिका भूमिहार वोटरों की होती है.
शिवपुर विधानसभा
वर्तमान में योगी सरकार में मंत्री अनिल राजभर यहां से विधायक हैं.
2017 के विधानसभा चुनाव में यह से उन्होंने समाजवादी पार्टी के आनंद मोहन यादव को क़रीब 54 वोटों से मात दी थी. इस बार भी अनिल राजभर ही बीजेपी के उम्मीदवार हैं. लेकिन इस बार की परिस्थितियां इनकी जीत में बाधा बन सकती हैं.
पिछली बार बीजेपी को ओमप्रकाश राजभर का साथ मिला था लेकिन इस बार उन्होंने समाजवादी पार्टी से हाथ मिला लिया है.
सपा-सुभासपा ने अनिल राजभर के मुक़ाबले अरविंद राजभर को मैदान में उतारा है. मुक़ाबला इन्हीं दो उम्मीदवारों के बीच है. इस सीट के जातिगत समीकरण पर गौर करें तो यहां दलित मतदाताओं की संख्या अधिक है. राजभर और यादव मतदाता यहां का मूल वोटर है लेकिन क्षत्रिय मतदाता भी यहां निर्णायक भूमिका अदा करते हैं.
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पिंडरा विधानसभा
वाराणसी ज़िले के पिंडरा विधानसभा में ग्रामीण इलाक़े आते हैं.
पिछली बार बीजेपी के टिकट से जीते डॉ अवधेश सिंह को इस बार भी टिकट दिया गया है. पिछले चुनाव की लहर में अवधेश सिंह ने बीएसपी के बाबू लाल को तक़रीबन 40 हज़ार मतों से शिकस्त दी थी.
कांग्रेस से ताल ठोक रहे थे बाहुबली कहे जानेवाले विधायक अजय राय जो तीसरे नंबर पर थे. राय यहां से चार बार विधायक रहे. दो बार बीजेपी ने इन्हें टिकट दिया और ये जीते भी.
इस बार भी कांग्रेस ने अजय राय को इस सीट से उम्मीदवार बनाया है. एंटी इन्कमबेंसी फैक्टर यहां इस बार प्रभावी लग रहा है जो अजय राय के पक्ष में जा सकता है.
इनके पहले कम्युनिस्ट पार्टी का यहां बड़ा दखल हुआ करता था. पार्टी के उदल इस सीट से आठ बार विधायक रह चुके हैं.
वर्तमान में यहां कुल मतदाताओं की संख्या 372639 है. जातिगत राजनीति में कुर्मी, भूमिहार व ब्राह्मण यहां के बेस वोटर हैं.
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अजगरा विधानसभा
वाराणसी जिले के अंर्तगत आने वाली अजगरा विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित यानी सुरक्षित सीट है.
पिछले चुनाव में यहां से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने जीत हासिल की थी.
सुभासपा के कैलाश नाथ सोनकर ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार लालजी सोनकर को हराया था. बीएसपी के त्रिभुवन राम तीसरे नंबर पर थे.
अजगरा से इस बार बीजेपी ने त्रिभुवन राम को उम्मीदवार बनाया है. 2022 के चुनाव में यहां सुभासपा-एसपी गठबंधन, बीजेपी और बीएसपी के बीच त्रिकोणीय मुक़ाबले की संभावना है.
दलित वोटरों की निर्णायक भूमिका की वजह से बीएसपी का यहां वर्चस्व रहा है.
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