गोरखपुर: योगी के लिए क्या अपनी सीट जीत जाना ही काफ़ी होगा?- ग्राउंड रिपोर्ट

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इमेज कैप्शन, प्रयागराज में चुनाव प्रचार के दौरान योगी आदित्यनाथ
    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गोरखपुर से

कहते हैं कि गोरखपुर की सियासत में एक भी पत्ता गोरखनाथ मठ की मर्ज़ी के बिना नहीं हिलता. बात साल 2002 की है जब योगी आदित्यनाथ गोरखपुर में बीजेपी के ख़िलाफ़ खड़े हुए थे. दरअसल, बीजेपी ने शिवप्रताप शुक्ला को विधानसभा का टिकट दिया और वो योगी आदित्यनाथ को पसंद नहीं थे, इसलिए विरोध में उन्होंने हिंदू सभा से डॉक्टर राधा मोहनदास अग्रवाल को अपना उम्मीदवार बना कर चुनावी मैदान में उतार दिया.

ये पहली बार था जब मठ खुलेआम बीजेपी के खिलाफ़ हिंदू महासभा के उम्मीदवार का समर्थन कर रहा था. हुआ ये कि जिस बीजेपी से शिवप्रताप शुक्ला चार बार चुनाव जीत रहे थे वो इस बार चुनाव हार गए. साथ ही इस चुनाव ने बीजेपी के हाईकमान को ये संदेश दे दिया कि योगी आदित्यनाथ और मठ गोरखपुर की राजनीति में क्या दम रखते हैं.

20 साल बाद अब योगी गोरखपुर शहर सीट से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. और इस बार उनके सामने वो उम्मीदवार खड़े हैं जो कभी उनके साथ खड़े रहे.

इस सीट पर समाजवादी पार्टी ने सुभावती शुक्ला को अपना उम्मीदवार बनाया है, जो गोरखपुर में बीजेपी के कद्दावर नेता रहे दिवंगत उपेंद्र दत्त शुक्ला की पत्नी हैं. योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद 2018 में उनकी लोकसभा सीट के उपचुनाव में बीजेपी ने उपेंद्र शुक्ला को टिकट दिया मगर वह सपा-निषाद पार्टी गठबंधन के प्रवीण निषाद से हार गए.

28 सालों में ये पहली बार था जब गोरखपुर से बीजेपी को लोकसभा चुनाव में हार का मुँह देखना पड़ा था. इस हार को लेकर राजनीतिक गलियारों में ये क़यास लगने लगे कि शुक्ला का बीजेपी के ही एक धड़े ने साथ नहीं दिया.

अब इस चुनाव में उनकी पत्नी योगी को चुनौती दे रही हैं जिनका अतीत में राजनीति से कोई वास्ता नहीं रहा.

कभी साथ खड़े लोग आज योगी के खिलाफ़

गोरखपुर शहर के उर्दू बाज़ार के पास एक बेहद संकरी गली में सुभावती शुक्ला के घर के पास गले में लाल सपा का पाटा डाले कार्यकर्ता दूर से ही नज़र आ जाते हैं. घर के अंदर जब हम दाखिल हुए तो एक बेहद कम रोशनी वाले कमरे में हमें बिठाया गया. थोड़ी देर में सुभावती शुक्ला उस कमरे में आईं. उनके साथ खड़े उनके भतीजे ने कहा कि- "ये बात ठीक से नहीं कर पाएंगी घरेलू महिला थीं, अब तक तो उन्हें पता नहीं मीडिया से बात कैसे करनी है."

बेहद शांत नज़र आने वाली सुभावती हमारे पहले सवाल पर ही भावुक हो गईं, आंखों में आंसू और रूंधी आवाज़ में उन्होंने कहा, "हमारे पति को गुज़रे दो साल होने को हैं लेकिन योगी जी और पार्टी के बड़े नेता हमारे दरवाज़े पर नहीं आए, हमें कोई नहीं पूछा, हम क्या करते. अखिलेश जी के पास गए तो उन्होंने सम्मान दिया, अपनी मां समान बताया, ये चुनाव हम अपने पति के सम्मान के लिए लड़ रहे हैं."

सुभावती की बात से बीजेपी से उनकी हताशा साफ़ दिखती है. वह कहती हैं, "मेरे पति ने 42 साल तक बीजेपी में जिन नेताओं के लिए सबकुछ किया, उनके झोले तक उठाए, उस पार्टी के दरवाज़े पर जब हम गए तो जवाब मिला कि ये मृतकों की पार्टी नहीं है. मुझे अखिलेश को जिताना है. हमारे पति को साल 2018 में उपचुनाव नहीं लड़ना था लेकिन उन्हें ज़बरदस्ती टिकट देकर चुनाव लड़ाया गया और हराया भी गया, ये सब किसके इशारे पर हुआ सभी को पता है."

गोरखपुर विधानसभा चुनाव

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सुभावती जिनका परिवार सालों साल तक योगी आदित्यनाथ के लिए वोट मांगता रहा आज योगी के खिलाफ़ खड़ा है.

लेकिन वो अकेली नहीं हैं, कांग्रेस ने भी गोरखपुर की सियासत में दांव उसी पर लगाया है जिसका अतीत कहीं ना कहीं बीजेपी और योगी से जुड़ा रहा है.

चेतना पांडे इस बार कांग्रेस की उम्मीदवार हैं. साल 2005 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में छात्र की उपाध्यक्ष रहीं चेतना लंबे वक़्त तक आरएसएस से संबद्ध छात्र संगठन एबीवीपी से जुड़ी रहीं.

जब कांग्रेस ने उनके नाम पर मुहर लगाई तो सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर सूबे के वर्तमान सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ सोशल मीडिया पर शेयर की जाने लगी.

चेतना 2019 में कांग्रेस में शामिल हो गई थीं, लेकिन एबीवीपी से वो 2005 से ही जुड़ी रहीं.

चेतना ने बीजेपी छोड़ कांग्रेस का रुख़ क्यों किया वो भी ऐसे समय में जब राज्य में कांग्रेस की हालत ख़स्ता है?

इस सवाल पर चेतना कहती हैं, "मैंने उस वक़्त एबीवीपी से छात्रसंघ का चुनाव लड़ा जब लड़कियाँ छात्र राजनीति में आती भी नहीं थी, सालों-साल तक वो किया जो बीजेपी और एबीवीपी में करने को कहा गया. मैंने तो उस विचारधारा का साथ दिया ही लेकिन आपको पता है कि वो (योगी अदित्यनाथ) कितने पावरफुल हैं, वो अपनी ही पार्टी नहीं, दूसरी पार्टी की राजनीति भी यहां प्रभावित करने में सक्षम माने जाते हैं. मैं बीजेपी की विचारधारा से जुड़ी थी और उसके लिए दिन रात एक करती रही, लेकिन पार्टी मुझे नहीं अपना पाई. बीजेपी के सभी वरिष्ठ नेताओं को पता है कि मैंने क्या किया है लेकिन वहां रास्ता रोकने वाले बहुत हैं."

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"मैं साफ़ करना चाहती हूं कि मैं योगी जी के साथ नहीं, विचारधारा के साथ थी, मैं हमेशा योगी जी के बयानों के खिलाफ़ रही हूं."

अपनी उम्मीदवारी को लेकर चेतना कहती हैं कि "मैं सबसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी उम्मीदवार हूं, जनता के लिए पहले से ही काम करती रही हूं इसलिए चेतना को ही जनता चुनेगी."

गोरखपुर का ब्राह्मण बनाम ठाकुर फ़ैक्टर

योगी के खिलाफ़ दोनों ही उम्मीदवार ब्राह्मण हैं. गोरखपुर में ब्राह्मण बनाम ठाकुर की लड़ाई दशकों पुरानी है जो यहां की राजनीति में सबसे बड़ा फैक्टर है.

ये लड़ाई शुरू हुई मठ के महंत दिग्विजय नाथ के ज़माने से. बताया जाता है कि दिग्विजय नाथ और उस वक़्त ब्राह्मणों के नेता सुरतिनारायण त्रिपाठी के बीच अनबन थी और यहीं से इस लड़ाई की शुरुआत हुई. इसके बाद ब्राह्मणों के नेता और बाहुबली हरिशंकर तिवारी ने ब्राह्मण बनाम ठाकुर की लड़ाई में ब्राह्मणों की कमान संभाल ली. और ठाकुरों के सबसे बड़े नेता हुए वीरेंद्र प्रताप शाही.

जानकार बताते हैं कि साल 1998 में गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला ने वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या की जिसके बाद ठाकुरों के नेतृत्व में आए खालीपन को योगी आदित्यनाथ ने भरा, यहीं से योगी आदित्नाथ के हाथों में ठाकुरों की कमान आ गई. दबदबे की लड़ाई मठ और हाता (हरिशंकर तिवारी के आवास को गोरखपुर में हाता के नाम से जाना जाता है) के बीच तेज़ हो गई. लंबे वक्‍त तक ये लड़ाई चलती रही और आखिरकार 90 के दशक में योगी आदित्यनाथ ने मठ की ताकत को बढ़ा लिया और हाता का वर्चस्व कम होता चला गया.

गोरखपुर की राजनीति को दशकों से काफ़ी करीब से देखने वाले पत्रकार मनोज सिंह कहते हैं, "गोरखपुर की राजनीति में ठाकुर बनाम ब्राह्मण के वर्चस्व की लड़ाई का पुराना इतिहास रहा है, ये संघर्ष शुरू हुआ जब गोरखपुर विश्वविद्यालय बन रहा था. उस समय के महंत दिग्विजय नाथ ने विश्विद्यालय के लिए ज़मीन दान दी और वो शहर पर अपना वर्चस्व चाहते थे, और एक दूसरी लॉबी भी थी जो ब्राह्मणों का दबदबा चाहती थी. आगे चलकर ये वर्चस्व की लड़ाई खूनी गैंगवॉर में बदल गई. आज भी ये राजनीतिक द्वंद्व बना हुआ है और आज भी ब्राह्मणों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि योगी ठाकुरों के नेता हैं."

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गोरखपुर सीट योगी आदित्यनाथ के लिए सुरक्षित सीट है. भले ही ये उनका पहला विधानसभा चुनाव हो लेकिन वो गोरखपुर से 1998 से 2014 तक पांच बार सांसद रह चुके हैं. साल 2002 में एक नारा उछला आज तक गोरखपुर के गली-नुक्कड़ों पर सुनाई पड़ता है - गोरखपुर में रहना है तो योगी-योगी कहना है.

मनोज सिंह कहते हैं, "गोरखपुर शहर सीट से बीजेपी को हराना मुश्किल है, खासकर साल 2012 में जब नया परिसीमन हुआ तो गोरखपुर शहर सीट का जातीय समीकरण कुछ ऐसा बना कि इस सीट पर ऊंची जाति वाले लोग ज़्यादा हो गए जो बीजेपी का कोर वोटर है, तो इससे हमेशा उसे फ़ायदा होता है. आप देखेंगे कि साल 2012 से सीट पर बीजेपी का वोट प्रतिशत और भी बढ़ा है. इस सीट के आसान बनने का एक कारण ये भी है कि समाजवादी पार्टी हो या कांग्रेस या बसपा किसी भी पार्टी ने यहां बड़े नेता स्थापित करने की कोशिश भी नहीं की. ये पार्टियां हर साल एक नया उम्मीदवार उतारती हैं तो इनका कोई नेता यहां का चेहरा नहीं बन पाया लेकिन योगी यहां के लोगों के बीच एक जाना हुआ और अपना नाम हैं."

जानकार बताते हैं कि गोरखपुर शहर सीट के जातीय समीकरण में सबसे ज़्यादा कायस्थ हैं जिन्हें बीजेपी का वोटबैंक माना जाता है. इस सीट पर करीब 4.50 लाख वोटर हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ इसमें कायस्थ 95 हज़ार, ब्राह्मण 55 हज़ार, मुसलमान 50 हज़ार, क्षत्रिय 25 हज़ार, वैश्य 45 हज़ार, निषाद 25 हज़ार, यादव 25 हज़ार और दलित 20 हजार हैं.

चंद्रशेखर की चुनौती

बीते कई सालों से गोरखपुर की राजनीति में योगी के सामने कोई ऐसा उम्मीदवार भी नहीं उतर सका जो सुर्खियां बना सके, लेकिन इस चुनाव में योगी के साथ-साथ जो सबसे ज़्यादा चर्चा में बने रहे वो हैं भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद.

चंद्रशेखर अपने करियर का पहला चुनाव लड़ रहे हैं, और उनकी पहली ही लड़ाई मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ है.

लेकिन गोरखपुर की सड़कों पर ये अहसास तक नहीं होता कि यहां की चुनावी लड़ाई में चंद्रशेखर भी हैं. ना वो सड़कों की होर्डिंग में दिखते हैं ना ही स्थानीय अखबारों के पन्नों पर और ना ही किसी नुक्कड़ पर उनकी दावेदारी को लेकर चर्चा सुनाई पड़ी.

चंद्रशेखर

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जब ये सवाल हमने चंद्रशेखर से किया तो उन्होंने कहा, "आप मुझे जहां खोज रही हैं वो पैसे वालों की जगह हैं, मैं पैसे दूंगा तो अखबार छाप देगा. हां मैं चाहता था कि होर्डिंग लगे लेकिन हमें बैनर लगाने के लिए अनुमति नहीं मिल रही. यहां हम अपने पोस्टर भी लगाते हैं तो उसे फाड़ दिया जा रहा है. लेकिन मैं लोगों से मिल रहा हूं और लोग कह रहे हैं कि वो मुख्यमंत्री के शासन से परेशान हैं और अब परिवर्तन लाएंगे."

योगी को चुनौती के सवाल पर चंद्रशेखर कहते हैं, "मुझे आसान लड़ाई पसंद नहीं, मैंने तो कहा था कि अगर योगी जी अयोध्या से लड़ेंगे या मथुरा से लड़ेंगे तो मैं वहां से लड़ूंगा लेकिन वो रिवर्स गेयर लेकर गोरखपुर आ गए. आखिर जब योगी जी ने पांच साल काम किया है को अपने लिए सुरक्षित सीट क्यों चुन रहे हैं?''

योगी का लिटमस टेस्ट

गोरखपुर ज़िले में नौ विधानसभा सीटें हैं- कैम्पियरगंज, पिपराइच , गोरखपुर शहरी, गोरखपुर ग्रामीण, सहजनवा, खजनी, चौरीचौरा, बाँसगाँव, चिल्लूपार.

एक अनुमान के मुताबिक़ कैम्पियरगंज विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण के आधार पर 40% निषाद मतदाता है, यादव और कुर्मी मतदाता भी यहां महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. पिपराइच विधानसभा में निषाद जाति के 90 हजार निषाद मतदाता हैं और ओबीसी जाति के मतदाता भी निर्णायक है.

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गोरखपुर ग्रामीण विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण के आधार पर निषाद और दलित वोटों पर सबका ज़्यादा ध्यान रहता है. खजनी सीट पर दलित वोट निर्णायक हैं. बांसगांव विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण के आधार पर ब्राह्मण बाहुल्य सीट मानी जाती है.

इसके साथ ही चिल्लूपार सीट पर जाति के वर्चस्व के इतर हरिशंकर तिवारी के नाम पर वोट किए जाते रहे हैं.

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यानी अगर गोरखपुर शहर की सीट को छोड़ दें तो गोरखपुर की अन्य सीटों पर सवर्ण जातियां निर्णायक भूमिका में नहीं है.

2017 के विधानसभा चुनाव में इन नौ में से आठ सीटों पर बीजेपी चुनाव जीती थी.

गोरखपुर की राजनीति को क़रीब से समझने वाले मानते हैं कि योगी का लिटमस टेस्ट सिर्फ़ गोरखपुर शहर की सीट नहीं बल्कि ज़िले की बाकी आठ सीटों पर होगा.

मनोज सिंह इस चुनाव में योगी के सामने बड़ी चैलेंज का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "योगी के लिए गोरखपुर शहर सीट जीतना कोई मुश्किल नहीं है लेकिन ये जीत सिर्फ़ उनकी जीत से नहीं तय होगी, देखना होगा कि उनकी जीत का अंतर कितना बड़ा है, और इससे भी ज़्यादा अहम ये है कि लगभग छह सीटों पर उन्हें कड़ी चुनौती मिल रही है, अगर योगी गोरखपुर की बाकी सीटों को नहीं जीतते हैं तो अपनी सीट पर जीतने के बाद भी वह हारे हुए ही माने जाएंगे. गोरखपुर उनका ज़िला है, लगभग हर 15 दिनों पर वह मुख्यमंत्री रहते हुए भी आ जाया करते हैं ऐसे में अगर वो अपने ज़िले में बड़ी जीत नहीं दिला पाए तो ये उनकी साख के लिए ठीक नहीं होगा. इसलिए ये चुनाव उनका लिटमस टेस्ट है."

यूपी के इस वीआईपी ज़िले में क्या योगी अपना लिटमस टेस्ट पास कर पाएंगे, इसका फ़ैसला जनता तीन मार्च को करेगी और इसका पता 10 मार्च को चलेगा.

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