उत्तर प्रदेश चुनाव: साल 2017 के बाद यूपी में 'कोई दंगा नहीं हुआ', सीएम योगी का ये दावा कितना सच है?

उत्तर प्रदेश, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

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इमेज कैप्शन, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान
    • Author, श्रुति मेनन और शादाब नज़मी
    • पदनाम, बीबीसी रियलिटी चेक टीम

पिछले हफ़्ते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि बीते पाँच सालों में राज्य में कोई दंगा नहीं हुआ. उनके इस दावे का सच क्या है?

हमने उनके इस दावे और राज्य में चुनाव से पहले क़ानून-व्यवस्था को लेकर अन्य दावों की पड़ताल की.

दावा: बीते पाँच सालों में कोई दंगा नहीं हुआ

फ़ैक्ट चेकः यह दावा ग़लत है.

हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रेस को जारी अपने बयान में सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए ये बात कही थी.

भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेता पहले भी इसी तरह के दावे कर चुके हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) से प्राप्त आधिकारिक डेटा में कुल दंगों के साथ ही सांप्रदायिक दंगों के बारे में भी बताया गया है.

इन आंकड़ों के मुताबिक़ 2018 से राज्य में कोई भी सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई है लेकिन जब 2017 में बीजेपी के राज्य की सत्ता पर क़ाबिज़ होने के बाद 195 सांप्रदायिक घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं.

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आंकड़ों की तस्वीर अलग

लेकिन उत्तर प्रदेश में कुल दंगों की संख्या के आंकड़े कुछ और ही तस्वीर पेश करते हैं.

कुल मिलाकर 2017 के बाद से दंगों के मामलों में आंकड़ों में गिरावट ज़रूर हुई है लेकिन 2019-20 के बीच इसमें 7.2% की वृद्धि देखी गई.

महाराष्ट्र और बिहार समेत यूपी उन शीर्ष पाँच राज्यों में शामिल हो गया जहां सबसे अधिक दंगों हुए हैं.

बीजेपी के राज्य की सत्ता में आने से पहले, 2016 में, राज्य में कुल 8,016 दंगे रिपोर्ट किए गए थे.

उसके बाद से 2017 में यह संख्या 8,900; साल 2018 में 8,908, साल 2019 में 5,714 और साल 2020 में 6,126 थी.

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दावा: योगी सरकार के कार्यकाल में अपराध की दर में क़रीब 60 फ़ीसद की कमी आई है.

फ़ैक्ट चेकः यह दावा ग़लत है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ये बातें पश्चिम यूपी के सहारनपुर में अपने एक भाषण के दौरान कहीं.

एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक़ अपराध को दो श्रेणियों में रखा गया है. एक वो जो भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में आते हैं और दूसरे वो जो स्पेशल लॉ या स्थानीय क़ानून (एसएलएल) के तहत आते हैं.

देश की संसद उन विशेष क़ानूनों को बनाती है जो ख़ास विषयों जैसे नारकोटिक्स या जुआ से जुड़े होते हैं जबकि स्थानीय क़ानून किसी क्षेत्र या राज्य विशेष के लिए बनाए जाते हैं.

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक़ आईपीसी के तहत यूपी राज्य में 2017 के बाद दर्ज हुए कुल अपराध बढ़ रहे हैं.

सही-सही तुलना करने के लिए हमने 2013 और 2020 के बीच मौजूद डेटा को देखा. अखिलेश यादव सरकार के अंतिम चार साल (2013-2017) और वर्तमान योगी सरकार के शुरुआती चार साल के आंकड़ों की तुलना की.

यूपी में अपराध

2013 और 2016 के बीच आईपीसी के तहत कुल 9,91,011 (नौ लाख 91 हज़ार ग्यारह) मामले दर्ज किए गए.

अगले चार सालों में, इसी कैटेगरी के तहत अपराधों की संख्या में वृद्धि हो गई और ये बढ़कर 1,360,680 जा पहुँची, यानी इसमें 37 फ़ीसद की वृद्धि दर्ज की गई.

इसी दरम्यान, अखिलेश की सपा सरकार के दौरान राज्य में रिपोर्ट किए गए कुल अपराध की संख्या 35,14,373 थी, जबकि बीजेपी के शासनकाल में ये घटकर 22,71,742 हो गई. यानी बीजेपी के शासन में ये 30 फ़ीसद कम हुआ.

यह देश की सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यह सबसे अधिक अपराध दर वाले राज्यों में भी बना हुआ है. 2020 में कुल दर्ज आपराधिक मामलों की संख्या में यह तीसरे स्थान पर था.

दावाः मैंने पाँच साल के योगी और आपके (अखिलेश) कार्यकाल की तुलना की. योगी सरकार में डकैती 70% कम हुई... हत्याएं 30%, दहेज के कारण हुई हत्याओं में भी 22.5% कमी आई.

फ़ैक्ट चेकः आंशिक रूप से सही.

ये बातें गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी रैली में कही.

ये सच है कि डकैती के मामले बीजेपी के शासन के दौरान कम हुए हैं लेकिन एनसीआरबी का आधिकारिक अनुमान 51% की गिरावट का है, न कि 70%.

अगर हम सपा के पूरे कार्यकाल (2012-16) से तुलना करें तो बीजेपी के चार सालों (2017-20) में 57% की कमी रिकॉर्ड की गई है.

हत्याओं के मामले में भी उस अवधि में गिरावट हुई है. 2013-16 की तुलना में 2017-2020 के बीच हत्याएं 20% कम हुई हैं.

यूपी में अपराध

लेकिन दहेज हत्या में कमी की जगह 0.4% की आंशिक वृद्धि देखी गई है.

दावा: एक वक़्त था जब न केवल यहां दंगे होते थे बल्कि हमारी बेटियों को भी पढ़ाई के लिए बाहर (दूसरे राज्यों में) भेजना पड़ता था क्योंकि यहां कोई सुरक्षा नहीं थी. लेकिन आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसी भी बेटी को सुरक्षा वजहों से बाहर जाकर पढ़ने की ज़रूरत नहीं है. आज उनसे बदतमीज़ी की कोई हिम्मत नहीं करता है.

फ़ैक्ट चेकः महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं.

गृह मंत्री अमित शाह ने एक चुनावी रैली में ये बात कही.

2013 और 2016 के बीच, महिलाओं के साथ दर्ज अपराधों की संख्या 1,56,634 थी.

लेकिन 2017-2020 के दरम्यान यह बढ़कर 2,24,694 हो गया, यानी योगी सरकार के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध में 43% की वृद्धि हुई है.

महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध

2019 से 2020 के बीच महिलाओं के साथ अपराध में 17% की गिरावट तो देखी गई है, लेकिन महिलाओं के साथ ऐसे अपराधों की कुल संख्या में यह राज्य अव्वल है. इसके बाद पश्चिम बंगाल, राजस्थान, महाराष्ट्र और असम का नंबर आता है.

हाल ही में राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की एक रिपोर्ट में सामने आया कि 2021 में उन्हें कुल 31,000 शिकायतें मिलीं, उनमें आधे से अधिक यूपी से थे.

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