उत्तराखंड में सभी पार्टियों ने महिलाओं को टिकट देने में की कंजूसी

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, उत्तराखंड से, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तराखंड की राजनीति में महिलाएं हाशिए पर हैं. पिछले चुनाव (2017) में यहाँ की 37 विधानसभाओं में महिला मतदाता पुरुषों के मुक़ाबले अधिक थीं.
इसके बावजूद वर्तमान विधानसभा चुनाव (2022) में तीनों प्रमुख पार्टियों कांग्रेस, बीजेपी और आप ने कुल मिलाकर 10 फ़ीसद महिलाओं को भी टिकट नहीं दिए हैं.
इसकी वजह क्या बताई जा रही है? राजनीतिक दलों का कहना है कि विधानसभा चुनाव में जिताऊ प्रत्याशी की ज़रूरत होती है तो राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि धनबल-बाहुबल की प्रधानता वाली इस राजनीति का स्वरूप ऐसा है कि ज़्यादातर महिलाएं ख़ुद को इसमें अनफ़िट पाती हैं.
प्रतिनिधित्व और भागीदारी
उत्तराखंड में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने में राज्य की दो प्रमुख पार्टियों ने हमेशा ही कंजूसी दिखाई है. इसका परिणाम यह हुआ है कि कभी भी पाँच से ज़्यादा महिलाएं चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंच पाईं.
हालांकि चौथी विधानसभा के दौरान बीजेपी विधायक प्रकाश पंत और मगन लाल शाह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नियां क्रमशः चंद्रा पंत पिथौरागढ़ से और मुन्नी देवी थराली से उपचुनाव जीतकर विधायक बनीं.
इस बार कांग्रेस ने 5 महिलाओं को टिकट दिया है, तो बीजेपी ने 8 को. तीसरी शक्ति के रूप में चुनाव मैदान में मौजूद आम आदमी पार्टी ने 7 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है. अगर इनमें से एक तिहाई यानी 7 महिलाएं भी चुनाव जीत जाती हैं तो यह उत्तराखंड के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेगा.
प्रतिनिधित्व के विपरीत महिलाओं की मतदान में भागीदारी पुरुषों से बेहतर नज़र आती है.
ग़ैर सरकारी संगठन एसडीसी ने 2017 के मतदान के आंकड़ों का विश्लेषण किया है. संस्था के अध्यक्ष अनूप नौटियाल बताते हैं कि प्रदेश के 9 पर्वतीय ज़िलों की 34 में से 33 सीटों पर महिलाओं ने पुरुषों के मुक़ाबले औसतन 5,000 से ज़्यादा वोट डाले थे. इस संख्या का महत्व इससे समझिए कि इन सीटों पर औसत वोट ही 50,000 हैं.
इनके अलावा ऋषिकेश, डोईवाला, कालाढूंगी और खटीमा में भी महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा था.

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पति, पिता, ससुर के नाम पर मिले टिकट
विधानसभा चुनाव 2022 के रण में बीजेपी ने आठ और कांग्रेस ने पांच महिलाओं और आम आदमी पार्टी ने सात महिलाओं को टिकट दिया है यानी कि 210 में से सिर्फ़ 20.
कांग्रेस और भाजपा ने जिन महिलाओं को टिकट दिया है उनमें से आधी अपने पति, पिता और ससुर की राजनीतिक उत्तराधिकारी बनकर मैदान में हैं.
बीजेपी ने दून कैंट में पूर्व विधायक हरबंस कपूर की पत्नी सविता कपूर को तो खानपुर से विवादों में रहने वाले विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन की पत्नी कुंवरानी देवयानी को टिकट दिया है.

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इसी तरह पिथौरागढ़ से अपने पति प्रकाश पंत की मृत्यु के बाद उपचुनाव जीतीं चंद्रा पंत को टिकट दिया तो कोटद्वार से पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंण्डूड़ी की बेटी ऋतु खंण्डूड़ी को टिकट दिया है. ऋतु खंण्डूड़ी वर्तमान में यमकेश्वर की विधायक हैं लेकिन वहां से उनका टिकट काट दिया गया है.
इसी तर्ज पर कांग्रेस ने लैंसडाउन से पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत की पुत्रवधु अनुकृति गुंसाई रावत को टिकट दिया गया है. हरक सिंह रावत को अनुकृति को बीजेपी में टिकट दिलवाने के लिए अड़े हुए थे और बीजेपी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था. अपने राजनीतिक करियर को दांव पर लगाकर हरक सिंह अपनी पुत्रवधु को कांग्रेस से टिकट दिलवाने में कामयाब रहे.

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एक परिवार से एक टिकट के सिद्धांत को दूसरी बार (यशपाल आर्य और बेटे संजीव आर्य के बाद) दरकिनार करते हुए कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत को हरिद्वार ग्रामीण से उम्मीदवार बनाया है.
इनके अलावा बीजेपी ने मौजूदा मंत्री रेखा आर्य सोमेश्वर को सोमेश्वर से, महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं सरिता आर्य को दलबदल कर पार्टी में आने पर नैनीताल से, शैलारानी रावत को केदारनाथ से और रेणु बिष्ट को यमकेश्वर से चुनाव मैदान में उतारा है.
कांग्रेस ने मीना शर्मा को भगवानपुर, गोदावरी थापली को मसूरी और मीना शर्मा को रुद्रपुर से उम्मीदवार बनाया है.

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जिताऊ उम्मीदवार चाहिए
बीजेपी की प्रदेश प्रवक्ता शादाब शम्स यह स्वीकार करते हैं कि महिलाओं को चुनावों में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिलती और इस बार भी नहीं मिली है. हालांकि वह कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं को सबसे ज़्यादा टिकट दिए हैं और दावा करते हैं कि यह संख्या अगली बार बढ़ेगी ही.
वह यह भी कहते हैं कि बीजेपी ने संगठन में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसद आरक्षण लागू कर दिया है और संगठन के विभिन्न पदों की ज़िम्मेदारी महिलाएं संभाल रही हैं इसके अलावा स्थानीय निकायों में भी बीजेपी की महिला नेत्रियों की संख्या अन्य दलों से अधिक है.

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कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी कहती हैं कि कांग्रेस के लिए प्राथमिकता बीजेपी के तानाशाही भरे शासन का अंत करने के लिए जीत हासिल करना है. इसलिए जिताऊ उम्मीदवारों को ही मैदान में उतारा गया है.
वह कहती हैं कि पार्टी में कुल 18 महिलाओं ने टिकट के लिए आवेदन किया था, जिनमें से 5 को टिकट मिला. हालांकि पहले यह संख्या 6 थी, हरीश रावत की सीट बदलने की वजह से लालकुआं से संध्या डालाकोटी का टिकट काट दिया गया था.
दसौनी कहती हैं कि आवेदन के अनुपात में देखें तो यह संख्या बाकियों से बेहतर है.
प्रदेश में पहली बार चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी ने 7 महिलाओं को टिकट दिया है. पार्टी प्रवक्ता उमा सिसौदिया कहती हैं कि महिलाओं को प्रतिनिधित्व न मिलने की वजह उनका राजनीति में भागीदारी न करना है.
उमा सिसौदिया कहती हैं कि महिलाओं पर घरों के काम का बोझ इतना ज़्यादा है कि वह राजनीति को पुरुषों की तरह समय नहीं दे पातीं. जैसे-जैसे महिलाओं की भागीदारी राजनीति में बढ़ेगी, उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा.

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धनबल-बाहुबल की राजनीति में महिलाओं की जगह
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक पर्यवेक्षक योगेश भट्ट कहते हैं कि उत्तराखंड की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने की वजह यहां की राजनीति का स्वरूप भी है, जो धनबल और बाहुबल से नियंत्रित होता है.
भट्ट कहते हैं कि उत्तराखंड की राजनीति एक सिंडिकेट की तरह काम करती है जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता, खनिज-शराब माफ़िया, अफ़सर और मीडियाकर्मी भी शामिल हैं. सवा करोड़ की आबादी में भले ही इनकी संख्या 5-7 हज़ार हो लेकिन यही मिलकर प्रदेश की राजनीति को तय करते हैं.
महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात करें तो देखेंगे कि वही सक्रिय हैं जिनका कोई पारिवारिक कनेक्शन राजनीति में है या उनके ऊपर किसी नेता का हाथ है. आम व्यक्ति का आम महिला को टिकट तब मिलेगा जब यह सिंडिकेट टूटेगा और अभी तक तो ऐसा होता हुआ दिखता नहीं है.
उत्तराखंड के चुनावों में शराब के प्रभाव के सवाल पर भट्ट कहते हैं कि चुनाव ही क्यों, प्रदेश की पूरी राजनीति पर ही शराब और खनन माफ़िया का प्रभाव है. कोई भी सरकार आए उसकी प्राथमिकता में (राजस्व अर्जन की) खनन और आबकारी विभाग ही होते हैं. जब सरकारें इनसे आगे नहीं बढ़ पा रही है तो राजनीति कैसे इनसे अलग होगी?

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कैसे होगा बदलाव?
योगेश भट्ट महिलाओं की राजनीति में भागीदारी कम होने की वजह इसे भी मानते हैं कि चुनावी राजनीति में शराब का असर है. वह कहते हैं कि जब चुनाव जीतने के लिए शराब चलेगी तो महिलाएं खुद ही पीछे हो जाएंगी. राजनीति साफ़-सुथरी होगी तो महिलाएं भी आगे आएंगी.
गरिमा मेहरा दसौनी को लगता है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने से ही राजनीति साफ़-सुथरी होगी. वह कहती हैं कि कार्यकर्ता, मतदाता भी महिला प्रत्याशी से शराब बांटने की उम्मीद कम करते हैं. इसलिए जैसे-जैसे महिलाओं का संसद, विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, यह बुराई कम होती जाएगी. राजनीति साफ़-सुथरी होगी तो और महिलाएं आगे आएंगीं.
अनूप नौटियाल कहते हैं कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और राजनीतिक सुधार साथ-साथ किए जाने की ज़रूरत है. इसके लिए सभी को मिलकर काम करना होगा.
शादाब शम्स कहते हैं कि बीजेपी ने इस दिशा में कदम आगे बढ़ा दिया है. वह कहते हैं कि जल्द ही मोदी सरकार महिला आरक्षण विधेयक लेकर आने वाली है, जिससे महिलाओं को 50 फ़ीसदी आरक्षण मिलेगा. वह दावा करते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी 5 में से दो लोकसभा सीटों पर महिलाओं को टिकट देगी. अभी पार्टी के पांच सांसदों में से एक महिला सांसद माला राजलक्ष्मी शाह टिहरी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.
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