सोशल मीडिया पर मुसलमानों और महिलाओं के ख़िलाफ़ कैसे फैल रही नफ़रत - बीबीसी पड़ताल

- Author, दिव्या आर्य, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले साल 13 मई को कुछ ट्विटर अकाउंट्स का ध्यान एक यूट्यूब चैनल 'लिबरल डोजे' के लाइवस्ट्रीम पर गया जहां ईद मना रही पाकिस्तानी लड़कियों की तस्वीरों और वीडियो पर भद्दे कमेंट्स किए जा रहे थे.
इस लाइवस्ट्रीम की हेडलाइन थी, "पाकिस्तानी गर्ल्स रिव्यू: आज अपनी ठरक भरी आंखों से लड़कियां ताड़ेंगे".
रिपोर्टों के मुताबिक़ इस चैनल के वीडियोज़ में मुसलमानों के खिलाफ़ हेट स्पीच की भरमार थी. इस चैनल को यूट्यूब से हटा दिया गया है.
13 मई 2021 की इस लाइवस्ट्रीम में इन लड़कियों के बारे में अश्लील बातें कही गईं, उन्हें गालियां दी गईं.
खुद को अंबरीन बताने वाली एक पाकिस्तानी महिला ने लाइवस्ट्रीम पर ट्वीट करते हुए कहा, "हर पाकिस्तानी लड़की अपनी तस्वीर हटा रही है... …लड़कियां असुरक्षित महसूस कर रही हैं, वो डरी हुई हैं...."
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इस लाइवस्ट्रीम में क़रीब 40 पाकिस्तानी लड़कियों की तस्वीरें उनकी बिना अनुमति के पोस्ट की गई थी और इसमें 500 से ज़्यादा लोग जुड़े जो लड़कियों को 10 में से नंबर देकर रेट कर रहे थे.
इन सबके पीछे थे दिल्ली के पास रहने वाले 23 वर्षीय रितेश झा और खुद को केशु बुलाने वाले एक शख्स.
घटना के आठ महीने बाद बीबीसी से बात करते हुए रितेश झा कहते हैं, "मेरे अंदर नफरत भर गई थी. मैंने सोशल मीडिया पर, इंस्टाग्राम, रेड्डिट, टेलीग्राम पर मुस्लिम हैंडल्स की ऐसी गंदी पोस्ट्स देखीं थीं जिनमें हिंदू लड़कियों की मॉर्फ की हुई तस्वीरें थीं. मुझे लगा कि मैं बदला लूं, पर मैं गलत था और मैंने बाद में माफी का एक वीडियो भी पोस्ट किया."
रितेश झा और 'सुल्ली डील्स' और 'बुल्ली बाई' ऐप बनाने वाले लोग शायद एक-दूसरे से कभी आमने-सामने मिले भी न हों, लेकिन एक खास विचारधारा से प्रभावित होकर ये युवा इंटरनेट की दूसरी ही तस्वीर सामने ला रहे हैं. इसमें मुसलमानों के ख़िलाफ़ फैल रही नफरत कई आयाम ले रही है - मुसलमान औरतों की तस्वीरों की ऑनलाइन नीलामी के लिए बनाई गई 'सुल्ली डील्स' और 'बुल्ली बाई' ऐप्स, पाकिस्तानी लड़कियों की तस्वीरों की यूट्यूब पर लाइवस्ट्रीमिंग से लेकर क्लबहाउस ऐप पर मुसलमान लड़कियों के शरीर पर अभद्र टिप्पणियों तक.
हमने पाया कि इस नफरत का शिकार मुसलमान औरतें ही नहीं हैं. हिंदू औरतों के चेहरों की तस्वीरों को नंगे शरीर पर मॉर्फ कर उनका हैरासमेंट भी होता है, बलात्कार की धमकियां दी जाती हैं. दलितों को नीचा दिखाया जाता है, उनके ख़िलाफ़ छूआछूत को सही ठहराया जाता है.
कट्टर दक्षिणपंथ की ऑनलाइन दुनिया की हमारी तहकीकात में हमने उन लोगों से बात की जो इस दुनिया का हिस्सा हैं, जिनसे ये दुनिया बढ़ी,
शुरुआती प्रभाव
साल 2013-14 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पहली बार भारत में दक्षिणपंथ की एक मज़बूत लहर थी. रितेश के मुताबिक़ उनके हाथ में उसी दौरान पहली बार मोबाइल फ़ोन आया था. उस वक्त वो 9वीं कक्षा में थे.
उनका पढ़ने में खास मन नहीं लगता था. रितेश याद करते हैं, "सोशल मीडिया पर मीम्स आते थे, नेताओं के भाषण सुनता था, 'हिंदू खतरे में हैं', 'वो एक मारें, तुम दस मारना' जैसे नारे सुनता था, दिन-रात हिंदू-मुस्लिम में लगा रहता था, इंटरनेट पर पाकिस्तानियों से बहस करने लगा था."
"आपको पता ही नहीं चलता आप कब रैडिकल हो गए, आपके अंदर गुस्सा भर जाता है, आपको लगता है आपके धर्म की वजह से आपको कम दिया गया है, आपके साथ भेदभाव हो रहा है, यहां तक कि आप ऑनलाइन-ऑफ़लाइन हिंसा के बारे में सोचने लगते हैं."
रितेश ने खुद को प्रशिक्षित किया और यूट्यूब पर 15-20 चैनल तैयार किए. कुछ ही वक्त में इनके सब्सक्राइबर्स लाखों में पहुंच गए और रितेश की कमाई भी होने लगी.
इसमें वो हलाला प्रथा, बुर्क़ा पहनना, मुसलमानों के बहुत सारे बच्चे पैदा करने जैसे मुद्दों पर बोलते. अपनी इस 'डार्क ह्यूमर' को उन्होंने 'डोजे पंथ' का नाम दिया.
रिपोर्टिंग की वजह से ये सभी चैनल्स यूट्यूब से हटा दिए गए हैं.

रितेश ने अब नए चैनल शुरू किए हैं. उनके तेवर भी पहले जैसे ही हैं. उनके वीडियोज़ मुसलमानों के ख़िलाफ़ टिप्पणियों से भरे हैं. कुछ लोगों ने इन नए चैनल्स को भी रिपोर्ट करना शुरू कर दिया है.
इन वीडियोज़ की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर में भारतीय संविधान में बोलने की आज़ादी का हवाला दिया जाता है और ये भी कि वीडियो यूट्यूब की कम्युनिटी गाइडलाइंस का पालन करता है.
रितेश अपनी सफ़ाई में कहते हैं, "ये सब 'डार्क ह्यूमर' है." ठीक वैसे ही जैसे उनके मुताबिक़ उनके द्वारा की गई लड़कियों की तस्वीरों की लाएवस्ट्रीमिंग "मात्र टिकटॉक या इंस्टा-रील्स या ब्यूटी कॉन्टेस्ट जैसी थी."
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कौन हैं ये नौजवान जो ऐसे वीडियो बना रहे हैं?
पुलिस द्वारा 'सुल्ली डील्स' और 'बुल्ली बाई' ऐप बनाने के आरोप में गिरफ्तार श्वेता सिंह 18 साल की हैं, विशाल झा, मयंक रावत, नीरज बिश्नोई 21, ओंकारेश्वर ठाकुर 26 और नीरज सिंह 28 साल के है.
क्लबहाउस मामले में गिरफ्तार हुए यश पराशर की उम्र 22, जैश्नव कक्कर की 21 और आकाश की उम्र महज़ 19 साल है.
मुंबई पुलिस में पहले साइबर सेल की शुरुआत करने वाले विशेष आईजी ब्रजेश सिंह के मुताबिक़ इंटरनेट की गुमनामी ऐसा अहसास दिलाती है कि आपको पकड़ा नहीं जा सकेगा जिस वजह से आपकी इंसानियत कम हो जाती है और हिंसा और ख़तरनाक रूप ले लेती है.
वो कहते हैं, "ऐसी बहुत-सी ऐंटी-फोरेंसिक तकनीक हैं जिनसे इन लोगों को पकड़ा जा सकता है, लेकिन इन लोगों को इनसे बचने के तरीके पता हैं तो ये पहले से वीपीएन, टॉर, वर्चुअल मशीन और एनक्रिप्शन का इस्तेमाल कर लेते हैं."
ओंकारेश्वर ठाकुर की गिरफ्तारी के वक्त दिल्ली पुलिस के डीसीपी के.पी.एस. मल्होत्रा ने बताया कि वो ट्विटर पर मुस्लमान महिलाओं को ट्रोल करने वाले एक 'ट्रैड' ग्रुप के सदस्य भी थे.
भारतीय कट्टर दक्षिणपंथ: 'ट्रैड्स'
भारत में माना जाता है कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में इज़ाफा हुआ है.
आम लोगों को कुछ ही दिन पहले पता चला कि दक्षिणपंथी सोच से जुड़े दो बड़े समूह हैं - एक 'ट्रैड्स' और दूसरा 'रायता'.
'ट्रैड्स' 'ट्रेडिशनलिस्ट' का छोटा स्वरूप है और मोटे तौर पर समझें तो ये लोग पुरानी परंपराओं के हिसाब से जीवन जीने पर विश्वास करते हैं और उसे बदलना नहीं चाहते. जो सती प्रथा, बाल-विवाह, घूंघट को सही मानते हैं और ब्राह्मणों को जाति व्यवस्था में सबसे ऊपर रखते हैं.
ये ज़रूरी नहीं कि वो नरेंद्र मोदी के समर्थक ही हों. उनका मानना है कि महिलाओं को घर में रहना चाहिए और उन्हें काम नहीं करना चाहिए.
'बुल्ली बाई' और 'सुल्ली डील्स' की पीड़िता सानिया सैय्यद ट्रैड्स के बारे में कहती हैं, "ये एक, दो लोग नहीं हैं. ये बहुत सारे लोग हैं जिनकी उम्र लगभग 20-23 के बीच है. इन्हें लगता है कि (केंद्र में) एक निर्मम नेता होना चाहिए. वो लिंचिंग की प्रशंसा करते हैं, जाति व्यवस्था में विश्वास करते हैं. वो कहते हैं, न मुसलमान होने चाहिए, न ईसाई."
ट्विटर पर एचआर के नाम का हैंडल इस्तेमाल करने वाले शख्स का कहना है कि वो भी एक 'ट्रैड' थे. ऐसा तब जब एचआर खुद दलित जाति से हैं.

उन्होंने अपनी पहचान छिपाने का आग्रह किया है. नाम बाहर आने पर उन्हें 'डॉक्सिंग' का, यानी उनकी निजी जानकारी को सार्वजनिक कर दिए जाने का डर है.
साल 2020 की शुरुआत में उन्हें इंस्टाग्राम के एक 'ट्रैड' ग्रुप में शामिल किया गया था. उनसे कहा गया कि वो सोशल मीडिया पर मुसलमानों से अच्छे तरीके से बहस कर पाते हैं. उन्हें बताया गया कि इस ग्रुप का मकसद था हिंदू धर्म के बारे में सही जानकारी फैलाना.
एचआर उस ग्रुप से जुड़ गए. उन दिनों के बारे में वो बताते हैं, "मैं हिंदू धर्म की पुरानी परंपराओं, जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत को सही मानता था, अपने उस इतिहास पर गौरव महसूस करता था, तो मैं उस ग्रुप से जुड़ गया."
एचआर को 14-15 साल के हिंदू युवाओं को इस ग्रुप से जोड़ने को कहा गया.
वक्त के साथ उन्हें दिखा कि ग्रुप में ऊपरी तौर पर जहां ग्रंथों की बात की जाती है, वहीं अंदर उसके सदस्य नफ़रत और हिंसात्मक बर्ताव को बढ़ावा देते हैं, जैसे दलितों को हिंदू नहीं मानना, हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए मुसलमान औरतों के बलात्कार की बातें करना, बच्चों की हत्या तक को सही ठहराना, जाति के लिए 'ऑनर किलिंग' यानी इज़्ज़त के नाम पर हत्या और अंतरजातीय विवाह करने वालों के ख़िलाफ़ धमकियां देना.
एचआर के मुताबिक़ प्रताड़ना का स्तर इतना था कि कुछ लड़कियों ने अपनी जान तक लेने की कोशिश की.
लेकिन ट्रैड विचारधारा को मानने वालों में लड़के ही नहीं, लड़कियां भी हैं जो खुद घूंघट प्रथा का समर्थन करती हैं और करवाचौथ रखने वाले मर्दों को ट्रोल कर 'नामर्द' बताती हैं.
एचआर ने ग्रुप में रहते हुए अपनी जाति कभी ज़ाहिर नहीं की, पर उनके लिए ये बेहद दर्दनाक हो चला था.
वो कहते हैं, "मैं उनको समझाता था पर वो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं होते थे. कभी-कभी लगता था कि इनके पास दिल ही नहीं है. वो कहते भी थे कि ऐसे मर्द बनो जिसे किसी की बात का कोई फर्क ना पड़े, जो अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सके, पर मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाहता था."
एचआर के मुताबिक़ वो लोग लिंचिंग की तस्वीरें शेयर करते और डींगे मारते कि कैसे उन्होंने अपने मोहल्ले में किसी मुसलमान लड़के को पीट दिया.
आख़िरकार एचआर ने वो ग्रुप और ट्रैड समुदाय छोड़ दिया और अब अपने जैसे और लोगों के साथ मिलकर ट्रैड्स को रोकने का काम कर रहे हैं.
ट्रैड्स से असहमत दक्षिणपंथ: रायता
ट्रैड्स ने अपनी बातों से असहमत दक्षिणपंथी लोगों को 'रायता' कहकर बुलाना शुरू कर दिया - यानी वो लोग, जो आम भाषा में कहा जाए तो, 'रायता फैलाते रहते हैं'.
मोना शर्मा हिंदू हैं, दक्षिणपंथी हैं, और 'रायता' की परिभाषा में आती हैं, लेकिन उन्हें ये शब्द अपमानजनक लगता है.
ट्रैड और रायता में फ़र्क बताते हुए मोना कहती हैं, "'रायता' संघी, बीजेपी, दक्षिणपंथी, हिंदुत्व के समर्थक होते हैं जो योगी, मोदी जैसे नेताओं को पसंद करते हैं, लेकिन ट्रैड्स के मुक़ाबले में 'रायता' अपने विचार क़ानून के दायरे में रहकर रखते हैं."
मोना शर्मा के मुताबिक़ उनके 'प्रोग्रेसिव' विचारों के कारण उन्हें ट्रैड्स ने निशाना बनाया, उन्हें 'रंडी' जैसे अपशब्द कहे गए और उनके पति की निजी जानकारी को सार्वजनिक किया गया.

मोना मानती हैं कि इस्लामिक चरमपंथ पर वो खुद उदारवादी और वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों से बहस और उनकी ट्रोलिंग करती हैं, लेकिन वो ट्रैड समुदाय को कहीं ज़्यादा ख़तरनाक बताती हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, "इनके विचार तालिबान जैसे ही तो हैं, कि औरतें घर में रहें, बच्चे पैदा करें, घूंघट करें, ज़्यादा पढ़ें नहीं, प्रेम विवाह ना करें. ये मज़बूत हुए तो क़ानून व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी, औरतों की ज़िंदगी वापस 16वीं सदी में पहुंच जाएगी."
मोना के मुताबिक़ साल 2020 में जिस वक्त कोविड संक्रमण रोकने के लिए पहला लॉकडाउन लगाया गया, क़रीब उसी वक्त ऐसे ट्रैड अकाउंट्स बहुत ऐक्टिव हो गए.
वो बताती हैं, "पहले तो ये बीजेपी समर्थक ही लगे. हमारी तरह इस्लाम, दंगों और आतंकवाद के ख़िलाफ़ बोलते थे, पर जब मेरी जैसी राइट विंग की हिंदू औरतें इनकी पुरानी विचारधारा पर सवाल उठाने लगीं तो ये हमें ही टारगेट करने लगे."
"इन्हें शराब पीने वाली, वेस्टर्न कपड़े पहनने वाली मॉडर्न पढ़ी-लिखी औरतें बर्दाश्त नहीं होतीं. हम उनके लिए पूरे हिंदू नहीं हैं क्योंकि हम दलित और मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा का प्रचार नहीं करते."
मोना के मुताबिक़ ट्रैड प्रधानमंत्री मोदी को भी पसंद नहीं करते, उन्हें हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए प्रभावी नहीं मानते और 'मौलाना मोदी' कह कर बुलाते हैं.
दक्षिणपंथी विचारधारा पर लेख लिखने वाले स्तंभकार अभिषेक बैनर्जी भी खुद को 'राएता' बताते हैं और दक्षिणपंथ के इन अलग-अलग धड़ों की तुलना वामपंथ के धड़ों से करते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "दक्षिणपंथ के ये विभाजन लंबे समय से हैं पर अब चर्चा में आ रहे हैं क्योंकि दक्षिणपंथ सत्ता में है. राजनीति में उनका प्रभुत्व है और आम लोगों में ये लोकप्रिय हो रहा है."
'ट्रैड्स' और 'रायता' के अलावा इस स्पेस में 'यूनियनिस्ट' और 'ब्लैक पिलर्स' जैसी विचारधाराएं भी हैं.

इस दुनिया से जुड़े रहे एक शख्स के मुताबिक़ खुद को 'यूनियनिस्ट' बतानेवाले, दलितों को अशुद्ध मानते हैं और उन्हें इस दुनिया से ख़त्म करने की बात करते हैं.
और 'ब्लैक पिलर्स' वो लोग हैं जो ये मान चुके हैं कि भारत में कभी हिंदू राष्ट्र नहीं बनेगा और समस्या की सारी जड़ सेक्युलर लोकतंत्र है.
जबसे मीडिया में ट्रैड और रायता पर लिखा जाने लगा और इसके पहले बुल्ली बाई और सुल्ली डील्स मोबाइल ऐप बनाने वालों पर पुलिस की धरपकड़ शुरू हुई, तबसे या इन धड़ों से जुड़े कई सुर बदल गए, या फिर वो अपना अकाउंट बंद करके अंडरग्राउंड हो गए हैं.
आगे का रास्ता
सुल्ली-बुल्ली मामलों में 6 गिरफ्तारियां हुईं लेकिन ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, रेड्डिट और टेलीग्राम जैसे ऐप्स पर नफरत फैलाने का सिलसिला जारी है.
बीबीसी से बातचीत में मुंबई पुलिस की डीसीपी सायबर क्राइम, रश्मि करांदिकर ने कहा कि पुलिस मामले की जांच कर रही है और जल्द ही कोई नतीज़ा सामने आएगा.
पुलिस के मुताबिक़ इसकी एक बड़ी वजह है विदेशी सोशल मीडिया कंपनियों से ज़रूरी सहयोग न मिल पाना.
मुंबई पुलिस में विशेष आईजी ब्रजेश सिंह बताते हैं, "जब हम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को जानकारी के लिए लिखते हैं तो जवाब आता है कि वो सिर्फ़ अमरीकी क़ानून का पालन करेंगे, और तभी जानकारी देंगे जब वो तय कर लेंगे कि अपराध हुआ है या नहीं."
सुल्ली डील्स और बुल्ली बाई मोबाइल ऐप्स के मामलों में हुई गिरफ्तारी के बारे में वो बताते हैं कि ऐप्स को ट्रैक करना आसान होता है.
ब्रजेश सिंह कहते हैं, "ऐप स्टोर से हम पता लगा सकते हैं कि किसने ऐप बनाया और फिर आगे कि तहकीकात भी आसानी से हो जाती है. लेकिन जब एक विचारधारा के लोग समूह में सोशल मीडिया पर काम करते हैं तब उनकी जानकारी उसी प्लेटफ़ॉर्म के पास होती है. प्लेटफॉर्म चाहे तो उनका डिवाइस, मॉडल नंबर, ऑपरेटिंग सिस्टम, लोकेशन, उनके बनाए और अकाउंट, अगर वो वीपीन या टॉर का इस्तेमाल कर रहे हैं, या बॉट जैसा बर्ताव कर रहे हैं, ये सब हमें बता सकते हैं लेकिन वो बताते नहीं हैं."
ब्रजेश सिंह के मुताबिक़ क़ानून व्यवस्था के पास इतनी सुविधाएं नहीं है कि वो लाखों अकाउंट्स को मॉनिटर करें और ट्रैक करें, इसलिए पुलिस तभी कार्रवाई कर पाती है जब उनके पास कोई शिकायत आए.
बीबीसी से बातचीत में कई हैंडल्स ने 'ट्रैड' की बढ़ती लोकप्रियता की एक बड़ी वजह सोशल मीडिया पर दूसरे लोकप्रिय दक्षिणपंथी हैंडल्स का इन "ट्रैड्स" पर नकेल ना कसना, उनकी नफरत भरी बातों की निंदा ना करना और खामोशी से स्वीकृति देना बताया.
लेकिन स्तंभकार अभिषेक बैनर्जी ये नहीं मानते. वो कहते हैं, "मैंने किसी बड़े हैंडल को हिंसा का समर्थन करते या ट्रैड्स को बढ़ावा देते नहीं देखा और कौन किससे प्रोत्साहित होता है ये तो सिर्फ नज़रिया है. ये दोषारोपण सही नहीं."
अभिषेक के मुताबिक़ हाशिए के इन ग्रुप्स को ख़त्म नहीं किया जा सकता, सिर्फ कंट्रोल या क़ानून के ज़रिए नियंत्रित किया जा सकता है.
यूट्यूबर रितेश झा खुद को पीड़ित बताते हैं जो पाकिस्तानी लड़कियों की तस्वीरों की लाइवस्ट्रीमिंग की तीखी आलोचना के बाद बिल्कुल अकेले रह गए है. रितेश कहते हैं कि लोगों ने उनसे दूरी बना ली है और मीडिया कंपनी में उनकी नौकरी चली गई है.
वो कहते हैं, "मुझे अब समझ में आ रहा है कि इन सबका कोई फायदा नहीं. इससे ना तो मासूम लोगों को फायदा हुआ ना मुझे. सिर्फ उन लोगों को फ़ायदा हुआ जो इस माहौल से एक छिपा हुआ एजेंडा चला रहे हैं. हम तो बस इस बबल में इस्तेमाल हो रहे हैं."
(इलस्ट्रेशन्स - पुनीत बरनाला)
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