अकाली दल के सौ साल: पंजाब में गुरुद्वारों की आज़ादी से लेकर परिवारवाद के उलाहनों तक

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- Author, पवन सिंह अतुल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
शिरोमणि अकाली दल आज अपने अस्तित्व के सौ वर्ष मना रहा है. ये ऐतिहासिक वर्षगांठ ऐसे समय आई है जब पार्टी, पंजाब की राजनीति में ख़ुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए जूझ रही है. बीते एक साल से चले किसान आंदोलन के दौरान, पार्टी के मूल समर्थकों का विश्वास डिगा है.
राज्य में चुनाव सिर पर है. आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस - दोनों रोज़ ख़बरों में रहते हैं. अक्सर आप के नेता कांग्रेस सरकार पर हमला करते हैं और कांग्रेस अपना बचाव करते दिखती है. बीच-बीच में कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, अपनी ही पार्टी की सरकार पर शब्दबाण चलाते हैं.
लेकिन इस सारी जंग में, सौ साल से पंजाब की राजनीति की धुरी रही पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, खोई-खोई सी लग रही है. अकाली दल नेशनल डेमोक्रेटिक एलांयस (एनडीए) का हिस्सा था और साल 2014 से 2020 तक केंद्र की सरकार में शामिल रहा. पार्टी के सांसद, केंद्रीय मंत्रिमंडल में अहम मंत्रालयों में रहे.
पिछले साल केंद्र ने कृषि क्षेत्र में सुधारों के लिए जब तीन विवादास्पद खेती क़ानून पास किए, तो पंजाब के किसान सड़कों पर आ गए. उस सियासी भूचाल ने अकाली दल को, एनडीए से नाता तोड़ने पर मजबूर कर दिया.
लेकिन जब तक अकाली दल, केंद्र सरकार से अलग होता, किसान उसे सरकार का हिस्सा मान कठघरे में खड़ा कर रहे थे.

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किसानों का दबाव और एनडीए को अलविदा
खेती क़ानून के पास होने के बाद भी बादल परिवार तीन महीने तक इनपर कोई साफ-साफ़ स्टैंड लेने में असफल रहा. इतना ही नहीं परिवार के सदस्यों ने समय -समय इन कानूनों को सही भी ठहराया. लेकिन जब हज़ारों किसान अकाली दल प्रमुख प्रकाश सिंह बादल के गांव में धरने पर बैठे तब पार्टी को समझ आया कि बात हाथ से निकल रही है.
पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह ने बीबीसी बताया, "जिस दिन बिल पास होने के लिए आये थे, उसी दिन अकाली दल को एनडीए छोड़कर सरकार से बाहर आ जाना चाहिए था.लेकिन पार्टी समय रहते स्थिति को भांप नहीं पाई. इस देरी में उनका नुकसान हुआ है. इसमें कोई दो राय नहीं है."
जानकार सहमत हैं कि केंद्र सरकार में भूमिका के कारण आगामी विधानसभा चुनाव में अकाली दल का कोर वोटबैंक यानी गांव-देहात की सिख आबादी, उससे कुछ हद तक छिटक सकता है.
लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. केंद्र सरकार ने तीनों क़ानून वापिस ले लिए हैं और अब किसान दिल्ली से घर की ओर रुख़ कर चुके हैं. जीत हासिल करने के बाद क्या किसानों का अकाली दल से ग़ुस्सा कम होगा? मैंने यही सवाल पूछा जगतार सिंह ने.
उन्होंने कहा, "अकाली दल ने पहले ग़लती की थी लेकिन बाद में डैमेज कंट्रोल की कोशिश की है. अकाली दल ने किसान आंदोलन की लॉजिस्टिकल लेवल पर काफ़ी मदद की है. इसमें दिल्ली के मोर्चे पर लंगर लगाने से लेकर, आंदोलन के दौरान गिरफ़्तार किसानों के केस लड़ने तक शामिल है. किसान परपंरागत रूप अकाली समर्थक हैं. और अगर वे अपनी अलग पार्टी नहीं बनाते हैं तो उनका रुझान अकाली दल की तरफ़ रह सकता है.मेरे ख़याल से किसान अकाली दल के साथ ही रहेंगे."

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प्रोफ़ेसर मोहम्मद ख़ालिद पंजाब के मलेरकोटला से आते हैं और वे चंडीगढ़ में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. उनकी राय में अकाली दल को शुरूआत में ही, सरकार में रहते हुए इस बिल का विरोध करना चाहिए था. लेकिन विरोध के बजाय पार्टी इसे डिफ़ेंड करती नज़र आई जिससे उसके समर्थक निराश हुए.
प्रोफ़ेसर ख़ालिद ने बीबीसी हिंदी को बताया, "अकाली दल एनडीए और सरकार से तभी बाहर आया जब पानी उसके सिर से ऊपर निकल गया. पार्टी जिसे अंग्रेज़ी में 'प्वांइट ऑफ़ नो रिटर्न' कहते हैं, वहां पहुंच गई थी.अकाली दल को ऐसा लगा कि उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक रही है. उनका वोटबैंक यानी ग्रामीण पंजाब उनके हाथ से निकलना शुरू हो गया था."
अकाली दल संभवत बीते सौ वर्षों में अपने सबसे कठिन दौर से गुज़र रहा है. एक पार्टी जिसकी शुरुआत गुरुद्वारों पर महंतों के नियंत्रण से शुरू हुई थी वो आज परिवारवाद की तोहमतों से दो-चार है. आइए नज़र डालते हैं पार्टी के सौ वर्षों के इतिहास और उसे जुड़े कुछ अहम पड़ावों पर.

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गुरुद्वारों पर नियंत्रण की लड़ाई
महात्मा गांधी के दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटने और सत्याग्रह को सियासत का एक हथियार बनाने से, भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक नया आयाम मिला. असहयोग आंदोलन में गांधी ने सत्याग्रह के राजनीतिक इस्तेमाल को और संवारा. धीरे-धीरे अंग्रेज़ों के विरुद्ध जंग से हटकर, सत्याग्रह का इस्तेमाल भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों से लड़ने के लिए किए जाना लगा.
सत्य और अहिंसा को एक हथियार यानी सत्याग्रह का प्रयोग, मंदिरों में दलितों के प्रवेश और गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों के चंगुल से छुड़ाने के लिए भी किया गया. साल 1920 से 1925 तक पंजाब में एक ऐसा सियासी भूचाल आया जिसमें 30 हज़ार से अधिक लोग जेल गए और 400 से अधिक लोगों की मौत हुई.
इतिहासकार बिपिन चंद्रा अपनी विख्यात पुस्तक 'इंडियाज़ स्ट्रगल फ़ॉर इंडिपेंडेंस में लिखते हैं, "आंदोलन गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतो के चंगुल से छुड़ाने के उद्देश्य से शुरू हुआ. पंजाब में सिख गुरुद्वारों का प्रबंधन महंतों के हाथ में था. वे मुग़लों के क़हर से बचे रहे क्योंकि वो केश नहीं रखते थे. केश न रखने की वजह से कई लोग सोचते थे कि वे हिंदू हैं लेकिन ये सच नहीं. वक्त के साथ महंत भ्रष्ट होते गए और उन्होंने गुरुद्वारों के चढ़ावे को निजी संपत्ति मान लिया. साल 1849 में पंजाब के ब्रिटिश इंडिया में अधिग्रहण के बाद से ही हुक्मरानों ने मंहतों का पूरा साथ दिया. लेकिन सिख सुधारक और राष्ट्रवादी, गुरुद्वारों को औपनिवेशिक ताक़तों और महंतों के कब्ज़े से छुड़ाकर, भ्रष्टाचार को ख़त्म करना चाहते थे."
लेकिन 1920 तक आते-आते हालात बेकाबू हो गए. महंतों के ख़िलाफ़ ग़ुस्से की दो तात्कालिक वजहें थीं. पहला, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से एक हुकुमनामा जारी हुआ जिसमें ग़दर मूवमेंट के देशभक्तों को 'विद्रोही' क़रार दे दिया गया. दूसरा, साल 1919 में जलियांवाला बाग में नरसंहार करने वाले जनरल डायर को सरोपा भेंट किया और उन्हें सिख घोषित कर दिया. महंतों की इन दो कारगुजारियों ने आग में घी का काम किया.

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एसजीपीसी और अकाली दल का गठन
नंवबर 1920 में क़रीब 10 हज़ार सुधारकों ने मिलकर 175 लोगों की एक कमेटी बनाई जिसे नाम दिया गया शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानी एसजीपीसी. इसके बाद संघर्ष का नेतृत्व करने और उस सुनियोजित ढंग से चलाने के लिए अगले महीने यानी 14 दिसंबर 1920 को अकाली दल का गठन हुआ. बाद में नाम में शिरोमणि जोड़ दिया गया.
जगतार सिंह कहते हैं, "गुरुद्वारों पर नियंत्रण के लिए छिड़े संघर्ष में वॉलन्टियर्स की ज़रूरत थी. इन्हें इकट्ठा करने के लिए जो गुट बनाया गया, उसे अकाली दल कहा गया. मक़सद था कि ज़रूरत पड़ने पर दो-चार सौ लोगों को इकट्ठा कर, गुरुद्वारों को महंतों से छुड़ाने का संघर्ष आगे बढ़ाया जाए.आहिस्ता-आहिस्ता ये एक पूर्ण राजनीतिक दल के रूप में विकसित हो गया."
असहयोग आंदोलन के दौरान कई नेता एसजीपीसी और अकाली दल दोनों से जुड़े थे और उन्होंने संपूर्ण अहिंसा के ज़रिए संघर्ष का रास्ता चुना. अकालियों का पहला ही मोर्चा ख़ूनी संघर्ष का गवाह बना. 20 फ़रवरी 1921 को ननकाना साहिब में महंत नारायण दास और उनके भाड़े के हथियारबंद साथियों ने शांतिपूर्ण अकाली सत्याग्रहियों पर गोलियां बरसा दीं.
बिपिन चंद्रा लिखते हैं, "सौ से अधिक अकाली गोलीबारी में मारे गए. लेकिन करतार सिंह झाब्बर की अगुवाई में, स्थानीय प्रशासन के चेतावनी के बावजूद, अकाली ननकाना साहिब गुरुद्वारे में दाख़िल हुए और उसे अपने नियंत्रण में ले लिया."
बाद में झाब्बर ने ननकाना की घटनाओं के बारे में कहा था, "इस घटना ने सिखों को नींद से जगा दिया है और स्वराज की ओर मार्च तेज़ हो गया है."
महात्मा गांधी से लेकर मौलाना शौकत अली और लाला लाजपत राय तक ने ननकाना साहिब पहुँचकर आंदोलन का साथ दिया. इसके बाद अकालियों ने धार्मिक मामलों में किसी भी तरह के सरकारी हस्ताक्षेप बंद करने की नीति अपना ली. एसजीपीसी और अकाली दल ने असहयोग आंदोलन के पक्ष में प्रस्ताव पास किए. दल स्वतंत्रता संग्राम में बराबर का भागी रहा. लेकिन स्वतंत्रता और विभाजन की घोषणा ने एक बार फिर पार्टी का इम्तिहान लिया."

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आज़ादी, विभाजन और अकाली
साल 1947 में ब्रिटिश हुकूमत के अंत ने पंजाब को नफ़रत और हिंसा की भट्ठी में झोंक दिया. लाखों जानें गईं, भारत दो-फाड़ हुआ और अकाली दल अपने अस्तित्व और अपने समर्थकों के हित के लिए लड़ने लगा. 1940 के दशक में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच जीवन और मरण की जंग ने पंजाब के 60 लाख सिखों को अलग-थलग कर दिया था. अब तक अकाली दल में भी विभाजन हो चुका था. अब ये दो दल थे - सेंट्रल अकाली दल और ऑफ़िशियल अकाली दल.
ऑफ़िशियल अकाली दल के नेता थे मास्टर तारा सिंह, जिनका जन्म एक हिंदू घर में हुआ था. दरअसल अकाली दल अपने वर्तमान स्वरुप तक आते-आते कई-कई बार टूट चुका है.
अपनी किताब 'लिबर्टी ओर डेथ' में पैट्रिक फ़्रैंच मास्टर तारा सिंह के बारे में लिखते हैं, "72 साल के मास्टर तारा सिंह अपने ज़ोरदार भाषणों के लिए विख्यात थे लेकिन दुर्भाग्यवश उनके दमदार भाषण, उनकी सियासी दांवपेच खेलने की क़ाबिलियत से मेल नहीं खाते थे."
इससे पहले भी अकालियों ने लंदन में हुई राउंड टेबल कांफ़्रेंस में हिस्सा लिया था और मास्टर तारा सिंह ने उनका पक्ष रखते रहे थे.

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मुस्लिग लीग की मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग का ज्ञानी करतार सिंह जैसे अकाली नेता विरोध करते रहे. जब ये तय हो गया कि अब भारत का विभाजन होकर रहेगा, तब भी अकालियों ने पाकिस्तान को 'किसी भी सूरत में' स्वीकार न करने की बात कही.
मास्टर तारा सिंह ने दिल्ली में पाकिस्तान आंदोलन के लीडर मोहम्मद अली जिन्ना से मुलाक़ात की और उनके पाकिस्तान के भीतर सिखों को स्वायतता देने के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया. फरबरी 1947 के बाद से पंजाब हिंसा के गर्त डूबता गया.
जगतार सिंह कहते हैं कि रावलपिंडी में मार्च 1947 में हुए दंगों ने सारे हालात बदल दिए. उसके बाद अकाली दल के पास अधिक विकल्प नहीं बचे थे.
पंजाबी सूबे की मांग
लेकिन सिख-किसान समर्थकों के भरोसे आज़ाद भारत अकाली दल की चुनावी राजनीति, सत्ता में आने के लिए नाकाफ़ी थी. शायद यह एक वजह थी कि अकाली दल ने 1955 से ही पंजाबी सूबे की मांग प्रबल हुई. हालांकि पंजाबी सूबे की मांग के अन्य कारण भी रहे होंगे.
सारे भारत में आज़ादी के बाद से ही भाषा पर आधारित राज्यों की मांगें उठी थीं. लेकिन शुरु में पंजाबी बोलने वाले इलाकों को अलग राज्य बनाने की मांग ठुकरा दी गई थी.
11 साल के बाद एक नंवबर 1966 में अकाली अपने मकसद में कामयाब हो गए. एक साल के भीतर नए पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए और अकाली दल के गुरनाम सिंह राज्य के पहले अकाली मुख्यमंत्री बने.

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भिंडरांवाले और खालिस्तान
इसके बाद अकालियों की परीक्षा जरनैल सिंह भिंडरांवाले के दौर में हुई.
1980 के दशक में पंजाब में अलगाववाद और चरमपंथ का दबदबा रहा. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हालात तेज़ी से बदले. राजीव गांधी सत्ता में आए और अकाली दल के नेता हरचरण सिंह लोगोंवाल के साथ जुलाई 1985 को एक समझौता भी हुआ. लेकिन केंद्र के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने के भीतर ही लोगोंवाल को अलगाववादियों ने गोली मार दी.
इस बीच पार्टी और इसके नेता खालिस्तान पर अपनी राय रखते रहे. जगतार सिंह कहते हैं, "1992 में संयुक्त राष्ट्र को खालिस्तान पर एक मेमोरेंडम दिया गया था. उस मेमोरेंडम पर गुरचरण सिंह टोहड़ा और प्रकाश सिंह बादल, दोनों ने हस्ताक्षर किए थे."
अकाली दल और पंजाब की कट्टरपंथी सियासत के बीच प्यार-नफ़रत का रिश्ता लगातार चलता रहा. पंजाब में चरमपंथ के ख़त्म होने के बाद अकाली राजनीति फिर बदल गई और उसने मुख्यधारा की सियासत शुरु कर दी.
पार्टी को राज्य हमेशा ही कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिलती रही. लेकिन नब्बे के दशक में आते-आते पार्टी पर प्रकाश सिंह बादल और उनके परिवार का दबदबा होने लगा. सिखों के धर्म और सियासत के मुद्दे उठाने वाली पार्टी धीरे-धीरे परिवारवाद की ओर बढ़ने लगी.

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पार्टी का भविष्य और चुनौतियां
अकाली दल को 2017 के विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद से ही चुनौतियां का सामना करना पड़ा है. पार्टी का एक धड़ा अलग भी हो चुका है. पार्टी के भीतर पार्टी के अध्यक्ष और प्रकाश सिंह बादल के पुत्र सुखबीर सिंह बादल को हटाने की भी मांग उठी थी. अब एक बार फिर विधानसभा चुनाव आने वाले हैं.
किसान आंदोलन में मौक़ा गंवा चुकी पार्टी पर अब भी एक ही परिवार का नियंत्रण हैं. पार्टी के सौ साल के इतिहास में पहली बार कोई एक परिवार अकाली दल पर हावी है.
1995 में प्रकाश सिंह बादल पार्टी के प्रमुख बने थे और उसके अगले साल सुखबीर बादल ने लोकसभा चुनाव लड़ा. तब से लेकर अब तक, बादल परिवार की पार्टी पर पकड़ मज़बूत बनी हुई है.

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जगतार सिंह कहते हैं, "परिवारवाद ज़रुर है लेकिन यही हाल अन्य क्षेत्रीय पार्टियों का भी है. पर ये भी कहा जाता है कि अकाली दल में जो भी नीति तय होती है वो इस बात का ध्यान रखकर तय होती है कि परिवार का हित सधता रहे."
प्रोफ़ेसर मोहम्मद ख़ालिद कहते हैं कि परिवार पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगते रहे हैं.
उन्होंने कहा, "पंजाब के गांवों में कई लोग स्वीकार करते हैं कि ये एक परिवार की पार्टी है. लोगों को अब लगने लगा है कि ये अब पंथिक पार्टी न होकर एक पारिवार की पार्टी बनकर रह गई."

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काडर का सहारा
लेकिन अकाली दल एक काडर बेस्ड पार्टी है जिसके कार्यकर्ता तमाम गांवों में अब भी असर रखते हैं. यही पार्टी की मज़बूती मुख्य वजह है. लेकिन पार्टी के कंधे पर बरगाड़ी में गुरु ग्रंथ साहिब के बेअदबी के मामले का बोझ भी है.
पार्टी नई शुरुआत करने के लिए कई नुस्खे अपना रही है. अब तक राज्य की 90 सीटों के लिए पार्टी ने उम्मीदवारों के नाम तय कर दिए हैं. इनमें से 27 नए चेहरे हैं जो पहली बार चुनाव लड़ेंगे. साथ ही पार्टी हर स्तर किसानों के साथ दिखने की कोशिश कर रही है.
मोहम्मद ख़ालिद मानते हैं कि दिल्ली के मोर्चे पर साल से ऊपर संघर्ष करके आए किसान अकाली दल के पास लौटेंगे या नहीं ये कहना मुश्किल है.
उन्होंने कहा, "किसान इस बात को नहीं भूले नहीं है कि अकालियों ने कानूनों को कैबिनेट में बैठकर पारित होने दिया और विरोध नहीं किया. बाद में भले ही खुलकर किसानों का साथ दिया हो लेकिन इसका निगेटिव असर ज़रूर पड़ेगा."
कम से कम राष्ट्रीय स्तर फ़िलहाल राज्य की सियासत में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की नोकझोंक का शोर ही सुनाई दे रहा है.
लेकिन अकाली दल गांवो की पार्टी है. गांव का शोर शहरों तक, धीरे-धीरे पहुँचता है. पार्टी राज्य में इस बार बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव पूर्व गठजोड़ कर चुकी है और उसे दलित वोटरों से भी उम्मीद है.
कई जानकार मानते हैं कि इस बार पंजाब विधानसभा चुनाव में किसका पलड़ा भारी रहेगा, ये कहना जोख़िम वाला काम है. क्योंकि अगर संघर्ष चौ-तरफ़ा हुआ तो कोई भी आगे निकल सकता है.
इस वक्त तो चारों यानी आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, बीजेपी-अमरिंदर सिंह और अकाली दल-बीएसपी वोटरों को रिझाने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं.
अकाली दल ने अपने सौ साल के सफर हज़ार उतार-चढ़ाव देखे हैं, और अब पार्टी 2022 में हारे या जीते, पंजाब की राजनीति में उसकी अहमियत बरक़रार रहेगी. लेकिन अगर पार्टी हारी तो बादल परिवार पर कितना दबाव पड़ता है ये देखने वाली बात होगी.
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