पंजाब विधानसभा चुनाव: अकाली दल-बसपा गठजोड़ क्या पंजाब में रंग जमाएगा?

प्रकाश सिंह बादल, मायवती, अकाली दल, बसपा

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    • Author, नवदीप कौर ग्रेवाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पंजाब में आगामी विधानसभा से पहले राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव आया है. 2022 के चुनावी समर में उतरने के लिए शिरोमणी अकाली दल ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया है.

यह एलान शिरोमणी अकाली दल के चंडीगढ़ स्थित दफ़्तर में किया गया और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को पंजाब में 20 सीटें दी गईं.

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अब सवाल ये उठता है कि बीजेपी से अलग होने के बाद शिरोमणि अकाली दल और बसपा का गठबंधन पंजाब की राजनीति के लिए क्या मायने रखता है?

बीबीसी पंजाबी सेवा ने राजनीतिक मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर मोहम्मद खालिद और वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह से बात कर इसका विश्लेषण किया है.

सुखबीर सिंह बादल, अकाली दल, बसपा

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इमेज कैप्शन, चंडीगढ़ स्थित शिरोमणि अकाली दल के दफ़्तर में दोनों पार्टियों ने औपचारिक रूप से गठबंधन किया

पंजाब में बसपा का कितना जनाधार?

वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं, "शिरोमणि अकाली दल ने बसपा के लिए 20 सीटें छोड़ी हैं. 1992 में बसपा ने नौ विधानसभा सीटों पर अपने दम पर जीत हासिल की थी. उस चुनाव का शिरोमणी अकाली दल ने विरोध किया था. लेकिन उसके बाद धीरे धीरे पंजाब की राजनीति से बसपा का सफ़ाया हो गया."

वे कहते हैं, "फिलहाल बसपा पंजाब में कोई सीट नहीं जीत रही. गठबंधन को दोआबा की कुछ सीटों से कुछ वोट मिलने का फायदा हो सकता है क्योंकि वहां बसपा का कुछ जनाधार है. बसपा-अकाली गठबंधन से ये संभावना थोड़ी बढ़ गई है."

इस सवाल पर राजनीति जानकार प्रोफ़ेसर मोहम्मद ख़ालिद कहते हैं, "जब बसपा की शुरुआत पंजाब से हुई तो एक समय राज्य में इसका जनाधार था. कांशीराम के नेतृत्व के बाद पंजाब में पार्टी उसे बरकरार नहीं रख पाई और यहां की राजनीति में उसका अस्तित्व ही ख़त्म हो गया. फिलहाल इस गठबंधन की ज़रूरत की बात करें तो वो ये है कि पंजाब में 33 फ़ीसदी आबादी दलित है जो भारत में सबसे ज़्यादा है."

वे कहते हैं, "बीजेपी के साथ गठबंधन टूटने के बाद, उनका ठोस वोट बैंक भी शिरोमणि अकाली दल से अलग हो गया. शिरोमणि अकाली दल के नेतृत्व ने अपने स्तर पर कांग्रेस या आम आदमी पार्टी के साथ टकराव से पहले यह गठबंधन बनाना पसंद किया क्योंकि उन्हें लगा कि इस जुड़ाव के कारण दलित वोट उनके पास आ सकते हैं. शिरोमणि अकाली दल के लिए यह गठबंधन एक मजबूरी से पैदा हुआ है."

अकाली दल, बसपा

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क्या अकाली दल के पास गठबंधन के बेहतर विकल्प मौजूद हैं?

प्रोफ़ेसर ख़ालिद कहते हैं कि, "एक समय पंजाब में बसपा किंगमेकर थी और दोआबा में उसका दबदबा था, लेकिन अब नहीं है. और शिरोमणि अकाली दल के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं दिखता."

वे कहते हैं, "अकालियों ने हाल ही में बीजेपी से गठबंधन तोड़ा है लिहाजा वे फिलहाल उनसे गठबंधन नहीं कर सकते. ऐसा करने से शिरोमणि अकाली दल के ग्रामीण मतदाता टूट जाएंगे. वहीं कांग्रेस के साथ गठबंधन भी नहीं कर सकते क्योंकि दोनों पूरी तरह से अलग पार्टियां हैं."

उधर आम आदमी पार्टी पंजाब में स्वतंत्र रूप से अपना राजनीतिक आधार तलाशने में लगी है. इसलिए वो अकाली दल के साथ गठबंधन करना उचित नहीं समझेगी तो अकाली दल भी उनसे गठबंधन नहीं करना चाहेगा. ऐसे में उनके पास बसपा से गठबंधन करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था.

"बीते कई सालों से बसपा का दलित मतदाताओं के बीच एक महत्वपूर्ण आधार नहीं रहा है और इस समय यहां ये लगभग मृत शक्ति है. लेकिन अकाली दल को लगता है कि इस गठबंधन से उनके वोट शेयर में एक या दो फ़ीसद की वृद्धि हो सकती है और पंजाब की राजनीति में उनकी वापसी हो सकती है."

मोहम्मद ख़ालिद, जगतार सिंह
इमेज कैप्शन, राजनीतिक मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर मोहम्मद ख़ालिद और वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह

पंजाब की राजनीति में दलित वोट बैंक की भूमिका कितनी बड़ी?

वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं, पंजाब में दलितों की संख्या देश में सबसे अधिक है लेकिन यह कभी एकतरफा वोट बैंक नहीं रहा. पंजाब से ही निकली बसपा यूपी में सफल रही लेकिन यहां नहीं. दलितों का वोट बैंक यहां बंटा हुआ है. कौन सा वर्ग किस पार्टी की तरफ झुकता है, राजनीतिक समीकरण उसी पर निर्भर होगा."

प्रोफ़ेसर ख़ालिद कहते हैं, "पंजाब में दलितों का वोट बैंक सभी राजनीतिक दलों के पास है और इस बार भी किसी एक पार्टी के पक्ष में जाने की इसकी संभावना नहीं है. सभी राजनीतिक दलों में एक दलित नेतृत्व होता है और वे अपने स्तर पर इस वोट बैंक को आकर्षित करते हैं."

वे कहते हैं कि, "शिरोमणी अकाली दल को लगा कि वे बसपा से गठबंधन करके कुछ दलित मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकते हैं तो उन्होंने ऐसा किया."

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1996 में शिरोमणी अकाली दल ने बसपा के साथ गठबंधन में पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से 11 पर जीत हासिल की थी. क्या वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों की तब से तुलना की जा सकती है?

जगतार सिंह कहते हैं, "शिरोमणी अकाली दल और बसपा जब 1996 में साथ लोकसभा चुनाव लड़े थे तब परिस्थितियां बहुत अलग थीं. पंजाब उग्रवाद से बाहर आ रहा था, यहां कांग्रेस विरोधी जनभावनाएं थीं. इसिलिए 1997 में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस केवल 14 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. लेकिन अब स्थिति अलग है और चुनावी मुद्दे भी."

वे कहते हैं कि, "बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि चुनाव में कौन से मुद्दे हावी हैं. गुटबाजी और सत्ता विरोधी लगह के कारण कांग्रेस अभी भी कमजोर पक्ष में है. वह किस तरह और हद तक इस स्थिति को नियंत्रित करती है ये देखना बाकी है. बीजेपी की स्थिति भी मजबूत नहीं है. ऐसे में ये देखना होगा कि लोग कौन सी पार्टी को अपना मत देते हैं."

भीम राव आम्बेडकर

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क्या इस गठबंधन के बिना अकाली दल चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर सकेगा?

"आम आदमी पार्टी के काम काज से लगता है कि वे अपना बिखरा कुनबा समेट नहीं पाए हैं. वहीं शिरोमणी अकाली दल किसानों के मुद्दे पर कमज़ोर पड़ गया है. बादल परिवार ने खुले तौर पर कृषि क़ानूनों का समर्थन किया था."

प्रोफ़ेसर ख़ालिद के मुताबिक, "दोनों समयों की तुलना नहीं की जा सकती. तब प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में बसपा पंजाब में अपना राजनीतिक आधार बनाने में जुटी थी. लेकिन उसके बाद से बसपा ने पंजाब में अपनी राजनीतिक ज़मीन खो दी है. आज आम आदमी पार्टी जैसी ताक़त का भी उन्हें सामना करना पड़ेगा जिन्होंने पंजाब में ख़ुद को स्थापित किया है और 90 के दशक में ये नहीं थे. हालांकि अकाली दल और बसपा कोशिश कर रहे हैं."

जगतार सिंह कहते हैं, "पंजाब में 1985 में अकाली दल ने बगैर गठबंधन के अपने दम पर सरकार का गठन किया था. हालांकि तब राजनीतिक समीकरण अलग थे. आज यह नहीं कहा जा सकता कि अकाली अपने स्तर पर चुनाव लड़ सकते हैं या नहीं. लेकिन पंजाब में चर्चा है कि वे अपने दम पर राज्य का चुनाव जीत सकते हैं."

"अकाली दल नौ दशकों तक पंथी पार्टी रहा, लेकिन 1996 में जब इसने पंजाबी और पंजाबियत का नारा दिया और हिंदू वोट बैंक को भी जोड़ने का प्रयास किया तो इसके वोट बैंक शिफ़्ट हो गए. पंथी राजनीति तो चलती रही लेकिन इससे पार्टी को नुकसान हुआ."

अकाली दल, बसपा

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"अवसरवाद का गठजोड़"

उन्होंने कहा, "जब उनका अपना वोट बैंक टूट गया तो शिरोमणि अकाली दल को गठबंधन करना पड़ा. आज भी अगर अकाली दल एक नई शुरुआत करे और सिख क्षेत्रों को एकजुट करे तो संभवतः उन्हें गठबंधन की ज़रूरत ही न पड़े. लेकिन लगता नहीं है कि पार्टी का मौजूदा नेतृत्व ऐसा नज़रिया नहीं रखता."

जगतार सिंह कहते हैं, "अब बार-बार उपमुख्यमंत्री के दलित या हिंदू होने की बात की जा रही है. वैसे तो यह महज एक तख्त है. लेकिन जब इनकी सरकार थी तब ख़ुद सुखबीर सिंह बादल उपमुख्यमंत्री थे. उनकी पार्टी कोई दलित उपमुख्यमंत्री ला सकती थी. लेकिन तब उनका इससे कोई लेना देना नहीं था."

"ये राजनीतिक अवसरवाद का गठजोड़ है, जिसमें नेताओं का किसी वर्ग से कोई लेना देना नहीं है. इस मामले में पंजाब की सभी पार्टियों का स्वभाव एक जैसा ही रहा है."

पंजाब की राजनीति पर गठबंधन का क्या प्रभाव रहा है?

जगतार सिंह कहते हैं, "शिरोमणि अकाली दल और बसपा के बीच गठबंधन की घोषणा के दौरान बीजेपी का कोई ज़िक्र नहीं किया गया और सुखबीर सिंह बादल ने पत्रकारों के सवाल लेने से भी इनकार कर दिया. उन्होंने इस गठबंधन को केवल अगले चुनाव के लिए बताया."

"बीजेपी के साथ गठबंधन अलग था. अब सुखबीर सिंह बादल ने उसी सांप्रदायिक सौहार्द के एजेंडे की बात दोहराई जो बीजेपी के साथ गठबंधन के दरम्यान प्रकाश सिंह बादल कहा करते थे. मुझे लगता है कि ये गठबंधन सिर्फ़ इस चुनाव के लिए ही है."

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