किसान आंदोलन: सिंघु बॉर्डर पर हुई संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में क्या-क्या हुआ

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कृषि क़ानूनों के रद्द होने के बाद भी किसान आंदोलन जारी है. प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि जब तक सरकार हमारी बाकी मांगें नहीं मान लेती, आंदोलन जारी रहेगा.

इसी संदर्भ में और आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने के मक़सद से आज संयुक्त किसान मोर्चा ने सिंघु बॉर्डर पर बैठक की.

इस बैठक में आंदोलन की आगे की रणनीति पर चर्चा हुई.

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क्या कुछ तय हुआ शनिवार की बैठक में

सिंघु बॉर्डर पर हुई इस बैठक में संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने एक कमेटी का एलान किया है.

किसान नेता राकेश टिकैत ने बताया कि संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से एक कमेटी बना दी गयी है. उन्होंने बताया कि इस कमेटी में संयुक्त किसान मोर्चा के पांच लोग होंगे.

उन्होंने कहा, "इस समिति में बलबीर सिंह राजाबाल, शिव कुमार काका, अशोक भावले, युद्धवीर सिंह और गुरुनाम सिंह चढ़ूनी शामिल होंगे."

टिकैत ने ये भी बताया कि इस समिति को तमाम अधिकार दिए गए हैं और यही समिति सरकार के पास जाने वाले लोगों के नाम तय करेगी.

संयुक्त किसान मोर्चा की अगली बैठक सात मार्च को होगी.

इस बैठक में किसान नेता जोगिंदर सिंह उगरहां ने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा सरकार से मांग करता है कि सरकार उन्हें लिखित में आश्वासन दे.

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इस दौरान किसान नेताओं ने तीन कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने को देशभर के किसानों और मजदूरों की जीत बताया और उनके सहयोग के लिए धन्यवाद कहा.

बैठक के बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसान नेताओं ने कहा कि हमारी मांग सिर्फ़ तीन कृषि क़ानूनों को रद्द कराने तक ही सीमित नहीं थी. हमारी मांग एमएसपी पर क़ानून बनाने की भी थी. इसके अलावा बिजली बिल 2020 को रद्द किया जाना दूसरी मांग थी. साथ ही पराली जलाने पर होने वाली कार्रवाई को रोकने की भी हमारी मांग थी. किसान नेताओं ने आंदोलन के दौरान जिन जिन किसानों पर मामले दर्ज हुए उन्हें वापस लेने की मांग भी दोहराई.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसान नेताओं ने बताया कि इस बैठक में लखीमपुर खीरी घटना में न्याय की मांग करते हुए गृह राज्य मंत्री की गिरफ़्तारी की मांग पर भी चर्चा हुई. किसान नेताओं ने माना कि कुछ मांगों के संदर्भ में सरकार का रवैया पहले से बेहतर हुआ है.

इससे पूर्व बैठक शुरू होने से पहले किसान नेता दर्शन पाल सिंह ने पत्रकारों से कहा कि 702 किसानों की मृत्यु का आंकड़ा हमने सरकार को भेज दिया है.

हालांकि इस मौक़े पर किसान नेता शिव कुमार काका ने कहा कि किसानों के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमे जब तक वापस नहीं होते हैं, तब तक हम वापस नहीं जाएंगे. केंद्र सरकार राज्य सरकारों को आदेश दे कि वो मामले वापस लें.

शिव कुमार काका ने केंद्रीय कृषि मंत्री के उस बयान की निंदा भी की जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार के पास किसानों की मौत का आंकड़ा नहीं है.

किसान नेताओं ने कहा कि हमारी जो बाकी मांगें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं, जब तक वे पूरी नहीं होती आंदोलन जारी रहेगा.

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सरकार पर किसानों में फूट डालकर आंदोलन ख़त्म कराने का आरोप

विवादित कृषि क़ानूनों को वापस लेने के बाद भी किसानों ने आंदोलन वापस लेने से इनकार कर दिया है.

किसान मांग कर रहे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए क़ानून लाया जाए. इसके साथ ही जिन किसानों की आंदोलन के दौरान मौत हुई है, उनके परिजनों को मुआवज़ा दिया जाए. यही नहीं, जो केस आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज किए गए हैं, उन्हें भी सरकार वापस ले.

बीते दिनों भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा था, "सरकार ने हमारी पूरी मांगें नहीं मानी हैं, और जब तक सभी मांगे पूरी नहीं होंगी, ये आंदोलन जारी रहेगा."

इस सप्ताह की शुरुआत में किसान संगठनों ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार 'पीछे के दरवाज़े से' कुछ किसान नेताओं से संपर्क कर रही है और उन्हें आंदोलन ख़त्म करने के लिए "प्रलोभन" भी दे रही है.

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किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि संयुक्त किसान मोर्चा से सीधे तौर पर संपर्क करने की बजाय, सरकार किसानों के बीच 'फूट डालने' की कोशिश में लगी हुई है. जिन संगठनों से सरकार संपर्क कर रही है, उनमें से कुछ पंजाब के हैं, जहाँ विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं.

सरकार की ओर से की जा रही इन कथित कोशिशों पर राकेश टिकैत का कहना था कि मोर्चे के घटक कई किसान संगठन ज़रूर हैं. लेकिन रणनीति का फ़ैसला कोई एक संगठन या कुछ चुनिंदा संगठन नहीं कर सकते. इसके लिए आम सहमति की ज़रूरत होती है.

हालांकि सरकार ने इस तरह की किसी भी पहल की कोई औपचारिक जानकारी नहीं दी है.

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