किसान आंदोलन का एक सालः कृषि क़ानूनों की वापसी के बाद अब आगे क्या?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक साल तक चले किसानों के आंदोलन के बाद सरकार ने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस ले लिया है और इसे 'किसानों की जीत' के रूप में भी देखा जा रहा है. हालांकि कृषि उपज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य को क़ानूनी रूप से लागू करने के सवाल पर अब भी किसान संगठनों और सरकार के बीच रस्साकशी जारी है.
जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों क़ानूनों को वापस लेने के घोषणा की थी उस दिन उन्होंने ये भी कहा था कि सरकार ये संभावनाएं भी तलाश करेगी कि कृषि क्षेत्र में किस तरह से सुधार लाए जा सकते हैं.
लेकिन सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या तीनों क़ानूनों की वापसी के बाद अब किसानों की समस्याएं पूरी तरह से ख़त्म हो जाएंगी?
वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ कहते हैं कि अब किसी समिति से ज़्यादा कृषि आयोग गठित करने की ज़रूरत है.
उनका कहना है कि भारत के संविधान के निर्माताओं ने बहुत सोच समझकर कृषि को राज्य का विषय ही रहने दिया था क्योंकि भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह की फसलें पैदा की जाती हैं और वहां की भौगोलिक और प्राकृतिक पृष्ठभूमि भी अलग ही हैं.
ज़ाहिर है कि समस्याएं भी अलग अलग तरह की हैं.

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जिन मुद्दों पर कृषि अर्थशास्त्रियों ने चिंता जताई वो है किसानों की घटती आमदनी, क्योंकि 2016 में हुए सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि पूरे देश में 17 राज्य ऐसे हैं जहां किसानों की सालाना आमदनी महज बीस हज़ार रुपये हैं.
इसी साल सितंबर के महीने में किए गए 'सिचुएशनल असेसमेंट सर्वे' के अनुसार किसान खेती से औसतन 10 हज़ार रुपए मासिक ही कमा पाते हैं. जबकि देश में लगभग 30 करोड़ टन खाद्यान्न, 32 करोड़ टन फल और सब्ज़ी और 20 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता है.
कृषि क्षेत्र के अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि तीनों क़ानूनों का वापस होना किसानों के लिए बड़ी राहत है क्योंकि जिन प्रगतिशील देशों में बाज़ार सुधार हुए हैं वहां पर कृषि का बड़ा संकट पैदा हो गया है.
उनका कहना था कि तीनों कृषि क़ानून उसी माडल पर बनाए गए थे जो माडल अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और इंग्लैंड में लागू है. भारत में भी सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान भी घट रहा है जो अब 14 प्रतिशत के आस पास है.

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वे कहते हैं, "अमेरिका में बाज़ार सुधार पिछले 150 सालों से चल रहे हैं. इन सुधारों का असर कुछ ऐसा हुआ कि वहाँ किसानों की आबादी सिर्फ 1.5 प्रतिशत ही रह गई है. यही वजह है कि अमेरिका के ग्रामीण अंचलों में शहरी इलाकों की तुलना में आत्महत्याओं का प्रतिशत भी बहुत ज़्यादा है."
शर्मा कहते हैं कि भारत में कृषि क्षेत्र को बचाने का एक ही रास्ता हो सकता है- वो है कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य का ठोस क़ानून. सातवें वेतन आयोग का हवाला देते हुए वे कहते हैं कि इससे जिनको लाभ पहुंचा उनकी आबादी मात्र 4 से 5 प्रतिशत ही है.
"जब नया वेतन आयोग लागू किया गया तो कहा गया कि इससे देश के अर्थव्यवस्था में जान डल जाएगी. लेकिन अंदाज़ा लगाइए कि अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू हो गया तो इसका लाभ देश के 50 प्रतिशत के आसपास की आबादी को मिलगा. ऐसी स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था में और कितनी ज़्यादा जान आ जायेगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है."
इसलिए उनका कहना है कि सरकार को चाहिए कि वो हर प्रकार के कृषि उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करे जो किसानों की आमदनी बढ़ाने का एकमात्र रास्ता हो सकता है. वे ये भी मानते हैं कि ऐसा नहीं होने पर बड़ी संख्या में किसान खेती से दूर होते चल जाएंगे जैसा अमेरिका और यूरोप में फिलहाल हो रहा है.
न्यूनतम समर्थन मूल्य कई राज्यों में लागू है, कई राज्यों में इसकी व्यवस्था नहीं है और ये सब उत्पादों पर भी नहीं हैं. कृषि से जुड़े विशषज्ञों का कहना है कि इसको लेकर क़ानून होना ज़रूरी इसलिए है ताकि ये पूरे देश में अनिवार्य किया जा सके.
भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में सचिव रह चुके सिराज हुसैन भी इसी साल सितंबर के महीने में आई 'सिचुएशनल असेसमेंट सर्वे' की रिपोर्ट के हवाले से कहते हैं कि जबकि भारत में किसानों की औसत आय हर महीने 10,218 रुपये बतायी गई है, इसी रिपोर्ट से पता चलता है कि पूर्वी भारत के राज्य जैसे झारखण्ड, ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल में किसानों की मासिक आमदनी और भी ज़्यादा कम है.
सरकार के आंकड़ों के अनुसार जहां झारखण्ड का किसान हर माह 4,895 रुपये ही कमा पाता है, ओडिशा का किसान 5112, पश्चिम बंगाल का किसान 6762 और बिहार का किसान 7542 रुपये प्रति माह ही कमा पाता है.
हुसैन के अनुसार अनाज मंडियों के कमज़ोर होने की वजह से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों के सामने भी बड़ा संकट खड़ा हो रहा है क्योंकि सरकार किसानों से उनके उत्पाद सीधे तौर पर ख़रीदने से ख़ुद को अलग कर रही है.
हुसैन के अनुसार कृषि क्षेत्र में सुधार बहुत ज़रूरी हैं लेकिन इनको विशेषज्ञों की समिति या टीम को ही तैयार करना चाहिए जो कृषि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और मौसम में हो रहे परिवर्तन के असर पर शोध करने के बाद यह तय करें.
हालांकि जिस दिन प्रधानमंत्री ने इन क़ानूनों को वापस लेने के घोषणा की थी तो अपने संबोधन में उन्होंने ये भी कहा था कि एक ऐसी समिति बनाई जाएगी जिसमे कृषि अर्थशास्त्री और किसानों के प्रतिनिधि भी शामिल किए जाएंगे.

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सिराज हुसैन भी इसकी वकालत करते हुए कहते कहा कि अब आने वाले दिनों में जो भी सुधार प्रस्तावित किए जाएं उनमें राज्यों की राय लेना भी अनिवार्य हो क्योंकि राज्य ही अपने यहां की स्थिति के अनुकूल सुझाव देने में सक्षम हैं.
किसानों के सामने आज भी वही मुद्दे अहम हैं जो कई सालों से चले आ रहे हैं जैसे पानी की उपलब्धता, बिजली, खाद और बीज की समस्या. इसलिए वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ कहते हैं कि कृषि को लेकर अगर अलग से आयोग का गठन किया जाता है तो इन मुद्दों को हल करने में मदद मिल सकती है.
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