बच्चे से ओरल सेक्स मामले में कोर्ट के फ़ैसले पर क्यों उठ रहे हैं सवाल

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़के के साथ ओरल सेक्स को जघन्य अपराध ना मानते हुए और इस मामले में अभियुक्त की सज़ा 10 साल से घटा कर सात साल कर दी है.
जस्टिस अनिल कुमार ओझा की सिंगल बेंच ने इस मामले में दायर की गई अपील पर सुनवाई के बाद ये आदेश दिया है.
इससे पहले निचली अदालत ने अभियुक्त को आईपीसी के सेक्शन 377, 506 और पॉक्सो एक्ट के सेक्शन छह के तहत दोषी माना था.
इस मामले में सत्र न्यायालय/विशेष कोर्ट ने अभियुक्त को पॉक्सो एक्ट के सेक्शन छह के तहत सज़ा सुनाई थी जिसमें अभियुक्त को दस साल की जेल और 5,000 रुपए जुर्माने की सज़ा सुनाई गई थी जिसके ख़िलाफ़ अभियुक्त ने हाई कोर्ट में अपील की थी.
इस मामले पर आए फ़ैसले को क़ानून के जानकार असंवेदनशील और सज़ा को कम करने पर चिंता ज़ाहिर कर रहे हैं.

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क्या है मामला?
ये मामला साल 2016 का है. इस मामले में अभियोग पक्ष का कहना था कि शिकायतकर्ता ने अभियुक्त के ख़िलाफ़ एफ़आईआर झांसी ज़िले में दर्ज कराई थी.
इसमें शिकायतकर्ता का कहना था कि सोनू कुशवाहा उनके घर आए और उनके दस साल के बेटे को मंदिर ले गए. वहां सोनू कुशवाहा ने शिकायतकर्ता के बेटे को 20 रुपए दिए और उसे ओरल सेक्स के लिए कहा. जब बेटा (पीड़ित) 20 रुपए लेकर घर लौटा तो शिकायतकर्ता के एक रिश्तेदार ने इसको लेकर पूछताछ की. इस पर पीड़ित ने पूरी घटना को बयान किया और कहा कि सोनू कुशवाहा ने उसे ये बात किसी को ना बताने की धमकी भी दी थी.
इस मामले में सोनू कुशवाहा के ख़िलाफ़ आईपीसी के धारा 377, 506 और पॉक्सो एक्ट के सेक्शन तीन/चार के तहत मामला दर्ज किया गया. इस मामले में निचली अदालत ने सोनू कुशवाहा को दोषी माना था जिसके बाद ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा.
कोर्ट के सामने सवाल ये था कि ये मामला पॉक्सो एक्ट के तीन से दस सेक्शन में से किसमें आता है?

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पॉक्सो का कौन-सा एक्ट?
ऐसा इसलिए क्योंकि अभियुक्त के वकील की तरफ़ से कहा गया था कि इस मामले में पॉक्सो एक्ट का सेक्शन छह नहीं लगाया गया है और उसे इस सेक्शन के तहत ग़लत तरीके से दोषी बताया गया है. साथ ही अभियुक्त का दोष पॉक्सो के सेक्शन 9(एम) के तहत आता है.
इस पर हाई कोर्ट का मानना था कि पॉक्सो एक्ट के तहत आने वाला ये मामला इस एक्ट के ना ही सेक्शन 5/6 और ना ही सेक्शन 9(एम) के अंतर्गत आता है क्योंकि इस मामले में 'लिंग को पीड़ित के मुंह में' डाला गया था.
कोर्ट का कहना था ये अपराध जघन्य यौन हमले या एग्रवेटेड सेक्शुअल असॉल्ट की श्रेणी में नहीं आता है. ये पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट की श्रेणी में आता है जिसमें पॉक्सो एक्ट के सेक्शन चार के तहत सज़ा का प्रावधान है.
इस मामले में जज ने कहा कि इस मामले में रिकॉर्ड और पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों पर ग़ौर करने के बाद कोर्ट का ये मत है कि अभियुक्त को पॉस्को एक्ट के सेक्शन चार के तहत सज़ा मिलनी चाहिए क्योंकि अभियुक्त का मामला पेनिट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट की श्रेणी में आता है. यह एग्रवेटेड सेक्शुअल असॉल्ट से कम गंभीर अपराध है.
फ़ैसले पर नराज़गी
इस फ़ैसले पर क़ानूनी मामलों से जुड़ा एक तबका चिंता व्यक्त कर रहा है.
सुप्रीम कोर्ट में वकील कामिनी जायसवाल इसे ग़लत और असंवेदनशील फैसला बताती हैं.
उनका कहना है, "ये मामला पूरी तरह से पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 9(एम) के तहत आता है क्योंकि यहाँ बच्चा 12 साल से छोटा है. वहीं ये कैसे कहा जा सकता है कि सेक्शुअल और पेनिट्रेटिव असॉल्ट अलग है. ये पूरी तरह से पेनिट्रेटिव असॉल्ट था और इसी सेक्शन में आता है."
साल 2012 में पारित किया गया पॉक्सो क़ानून नाबालिगों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के अपराधों की परिभाषा, न्यायिक प्रक्रिया और दंड तय करता है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो या एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार देशभर में पॉक्सो एक्ट के तहत 47,221 मामले रिपोर्ट हुए थे जिसमें सबसे ज्यादा 6898 मामले उत्तर प्रदेश राज्य में साल 2020 में दर्ज किए गए थे. इसके बाद महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश तीसरे नंबर पर था.
यहां ये सवाल भी उठ रहे हैं कि ऐसी किसी घटना से एक बच्चे की मानसिक अवस्था और ज़िंदगी पर पड़ने वाले असर के बारे में भी सोचा जाना चाहिए.

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निर्भया मामले में वकील रह चुकी सीमा कुशवाहा ने बीबीसी से कहा कि "अगर ऐसे फ़ैसले आते रहे तो कोर्ट से लोगों का भरोसा ही उठ जाएगा. जिस तरह से बच्चों के ख़िलाफ़ यौन अपराध के मामले सामने आ रहे हैं, ऐसे में ऐसा फ़ैसला एक गलत संदेश देगा."
उनका कहना है कि कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट का जो मतलब निकाला है वो बिल्कुल ग़लत है.
वो कहती है, "पॉक्सो एक्ट का सेक्शन तीन साफ़ तौर पर कहता है कि यदि कोई अपना लिंग, किसी सीमा तक किसी बालक के मुंह या गुदा में प्रवेश करता है या किसी अन्य व्यक्ति से करवाता है तो वो लैंगिक हमला माना जाता है. इस सेक्शन में और भी प्रावधान दिए गए हैं."
"साथ ही साल 2019 में हुए सेक्शन छह में हुए संशोधन के तहत ऐसे मामलों में सज़ा का प्रावधान दस साल से बढ़ाकर 20 साल कर दिया गया है और सेक्शन चार में इसे सात से बढ़ाकर दस साल कर दिया गया है. और इसमें कम से कम दस साल की सज़ा या आजीवन कारावास का भी प्रावधान है."

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वहीं सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रणय महेश्वरी ने बीबीसी से कहा कि पॉक्सो एक्ट की धाराओं के निहितार्थ पर सुप्रीम कोर्ट को दखल देना चाहिए. इस मामले में सज़ा को कम करना चिंताजनक है.
कामिनी जायसवाल हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बॉम्बे हाई कोर्ट के 'स्किन टू स्किन टच' मामले को ख़ारिज करने के फ़ैसले का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि हर मामले का सुप्रीम कोर्ट संज्ञान ले और फ़ैसला ले ये बहुत मुश्किल हैं.
साथ ही वे कहती हैं कि भारत में क़ानून में कमी नहीं है लेकिन उसे अमलीजामा ठीक से नहीं पहनाया जाएगा तो जनता पर न्याय प्रणाली का क्या प्रभाव पड़ेगा इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए.
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