इंटरनेट पर अपने बच्चों को यौन उत्पीड़न से ऐसे बचाएं
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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भारत में ऑनलाइन बाल यौन शोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, सीबीआई ने 14 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 76 ठिकानों पर मंगलवार को ऑनलाइन बाल यौन उत्पीड़न और शोषण के मामले में छापेमारी की है.
इससे पहले जुलाई 2020 में असम राज्य की पुलिस को एक 'संदेहास्पद' फ़ेसबुक पेज को लेकर एक शिकायत मिली. ये जानकारी उन्हें एक ग़ैर-सरकारी संस्था के माध्यम से मिली थी.
इस संस्था के ट्विटर पन्ने पर इस फ़ेसबुक पेज के बारे में एलर्ट किया गया था कि इस पन्ने पर बच्चों के वीडियो और पोस्ट हैं, और ये पेज शायद बच्चों के यौन उत्पीड़न के वीडियो या सीसैम (चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज़ मेटीरियल) को बढ़ावा दे रहा है.
मामला असम सीआईडी के पास पहुंचा.
इसी सिलसिले में गुवाहाटी से करीब 100 किलोमीटर एक गांव में रहने वाले 28 साल के एक व्यक्ति को सितंबर में गिरफ़्तार किया गया और बाद में ज़मानत पर छोड़ दिया गया.
इस व्यक्ति पर उस फ़ेसबुक पेज की शुरुआत का आरोप है.
पुलिस का आरोप है कि अभियुक्त के मोबाइल में भी बच्चों के यौन उत्पीड़न के वीडियो या सीसैम मौजूद थे.
ये व्यक्ति इन आरोपों से इनकार करता है.

भारत के कड़े कानूनों के अंतर्गत सीसैम का प्रकाशन, प्रसार और उसे अपने पास रखना ग़ैर-कानूनी है.
परिवार से घिरे इस व्यक्ति ने अपने घर में बीबीसी को बताया, "मैंने कभी भी बच्चों के यौन शोषण के वीडियो नहीं डाउनलोड किए. मैंने उन्हें कभी शेयर नहीं किया, न ही वो मुझे मिले."
पुलिस का आरोप है कि इस व्यक्ति ने इस फ़ेसबुक पेज से कथित तौर पर पैसा कमाने की भी कोशिश की और ऐप्स का इस्तेमाल करके सीसैम को फैलाने की भी.
पुलिस के मुताबिक फ़ेसबुक पेज पर एक टेलीग्राम ऐप का लिंक था जहां अगर आप क्लिक करें तो आप एक टेलीग्राम चैनल में पहुंचते हैं.
आरोप है कि यहां और दूसरे ऐप्स पर सीसैम वीडियो का लेन-देन होता था.
पुलिस के मुताबिक इस टेलीग्राम चैनल पर पैसा कमाए जाने की योजना थी लेकिन पुलिस के मुताबिक ऐसा होने से पहले ही इस व्यक्ति को हिरासत में ले लिया गया, हालांकि ये साफ़ नहीं कि पैसा इस व्यक्ति के पास कैसे पहुंचता.
इस केस की जांच कर कर रही असम सीआईडी में एडिशनल एसपी गीतांजली डोले बताती हैं, "वीडियोज़ (कंटेंट) को देखने के बाद कई रात मैं सो नहीं पाई."
ये फ़ेसबुक पेज अब ऑफ़लाइन है और मामला अदालत में है.
सीसैम में बढ़ोत्तरी

एक रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना पैंडेमिक से पहले साल 2018 में हर दिन 109 बच्चों का यौन उत्पीड़न हुआ.
कार्यकर्ताओं और पुलिस अधिकारियों के अनुसार भारत में कोरोना पैंडेमिक के दौरान सीसैम की ऑनलाइन मांग और प्रसार में बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है.
भारत के सायबर सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली केरल राज्य पुलिस सायबरडोम के प्रमुख मनोज अब्राहम के मुताबिक पैंडेमिक के दौरान ये बढ़ोत्तरी 200 से 300 प्रतिशत ज़्यादा है.
हमने केरल का रुख इसलिए किया था क्योंकि जानकारों के मुताबिक केरल सायबरडोम सीसैम का पता लगाने में तकनीक के इस्तेमाल में दूसरे राज्यों की सायबर पुलिस से कहीं आगे है.
मनोज अब्राहम को फिक्र है कि ऑनलाइन पर भारत में बने सीसैम वीडियो का प्रसार बढ़ा.
मनोज अब्राहम कहते हैं, "पैंडेमिक के दौरान हमने ढेर सारे स्थानीय (सीसैम) कंटेट देखे जिसमें आप मलयालम मनोरमा का कैंलेडर या फिर ऐसी चीज़ें देख सकते हैं जो केरल का या फिर भारत का आभास देती हैं."
यानि ये कि बच्चों के यौन उत्पीड़न के वीडियो या सीसैम वीडियो को या तो केरल में या फिर भारत के किसी और हिस्से में शूट किया गया था.
फिक्र ये भी है कि कई वीडियो घरों के भीतर बनाए जाते हैं.

मनोज अब्राहम कहते हैं, "आप (वीडियो में) घर के अंदर देख सकते हैं. इसलिए सबसे खतरनाक बात ये है कि घर के भीतर किसी लड़के या लड़की के नज़दीक रहने वाला व्यक्ति ये वीडियो बना रहा है."
दरअसल कोविड की वजह से बच्चों को मिलने वाली पुलिस की मदद पर असर पड़ा है.
बच्चों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ता मिगएल दास क्विहा कहते हैं, "(कोविड के दौरान) पुलिस कानून-व्यवस्था से निपटने में बहुत व्यस्त थी. बहुत सारे पुलिसकर्मी खुद कोविड से प्रभावित थे."
दुनिया भर के हालात
अप्रेल 2020 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने आगाह किया था कि "आने-जाने पर पाबंदी और ऑनलाइन इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि से पीडोफ़ाइल्स की ऑनलाइन सेक्शुअल ग्रूमिंग बढ़ सकती है, चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज़ की लाइव स्ट्रीमिंग बढ़ सकती है और चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज़ मेटिरियल का उत्पादन और वितरण बढ़ सकता है."
ग्रूम करना मतलब दोस्ती करना, फिर भावनात्मक रिश्ते बनाना और फिर कैमरे के सामने यौन कृत्य करने के लिए लुभाना.
साल 2020 में अमरीका स्थित नेशनल सेंटर फ़ॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉयटेड चिल्ड्रन के सायबर टिपलाइन को करीब दो करोड़ 17 तस्वीरें, वीडियो और दूसरी फ़ाइल्स को लेकर रिपोर्टें मिलीं, और उनमें सीसैम और जुड़ा कंटेंट था.
रिपोर्ट के मुताबिक रिपोर्टों में साल 2019 की तुलना में ये बढ़ोत्तरी 28 प्रतिशत थी.
भारत इस सूची में सबसे ऊपर था. इस बढ़ोत्तरी के कारणों को ढूंढना मुश्किल नहीं हैं.
लंबे समय तक घरों में बंद रहने से बच्चों की ऑनलाइन मौजूदगी बढ़ी है.
कार्यकर्ताओं और अधिकारियों के मुताबिक पीडोफ़ाइल्स की भी ऑनलाइन मौजूदगी बढ़ी है.
खतरनाक स्थिति

अगस्त के शुरुआती दिनों में मुंबई में कार्यकर्ता सिद्धार्थ पिल्लई के पास 16 साल का एक परेशान लड़का आया.
मोबाइल चैट से उसे पता चला था कि उसकी 10 साल की बहन को पहले एक गेमिंग ऐप पर और उसके बाद एक सोशल मीडिया ऐप पर ग्रूम किया गया था.
ग़ैर-सरकारी संस्था आरंभ के सिद्धार्थ पिल्लई बताते हैं, "(ऐसे मामलों की) शुरुआत हाय, हेलो से होती है. फिर बातचीत तारीफ़ तक पहुंच जाती है, जैसे मैं आपके बारे में हमेशा सोचता हूं. फिर धीर-धीरे बातचीत अलग स्वरूप ले लेती है."
वो कहते हैं, "ये क्लासिक ग्रूमिंग स्ट्रैटजी है जहां ग्रूम करने वाला व्यक्ति बच्चे को डिसेंसिटाइज़ या उसकी संवेदनशीलता को खत्म करने की कोशिश करता है."
दिसंबर 2019 और जून 2020 के बीच संस्था इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड ने एक रिसर्च में पाया:
भारत में सीसैम कंटेंट का इस्तेमाल करने वालों में 90 प्रतिशत पुरुष हैं, एक प्रतिशत महिलाएं हैं और दूसरे अन्य लोगों की पहचान नहीं हो पाई.
ज़्यादा लोगों की रुचि 'स्कूल सेक्स वीडियो' और 'टीन सैक्स' जैसे सीसैम कंटेंट में थी.
ज़्यादातर लोगों ने अपनी लोकेशन की छिपाने के लिए, सरकारी कानूनों से बचने के लिए और सुरक्षा के मद्देनज़र वीपीएन का इस्तेमाल किया था.
आईसीपीएफ़ और उसके तकनीकी पार्टनरों ने सीसैम की मांग को समझने के लिए 100 शहरों का निरीक्षण किया था.
सीसैम के वितरण का पता लगाना

जानकारों के मुताबिक बच्चों के यौन उत्पीड़न के बहुत सारे वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, वीपीएन, फ़ाइल शेयरिंग ऐप्लिकेशन आदि पर शेयर होते हैं.
अधिकारियों का कहना है कि बहुत सारा सीसैम कंटेंट डार्क वेब के बंद चैटरूम्स में भी शेयर होता है जहां खरीद-फ़रोख्त के लिए बिटकॉयन का इस्तेमाल किया जाता है.
डार्क वेब इंटरनेट का वो कोना है जहां कई सारे ग़ैर क़ानूनी धंधे चलते हैं.
जो इंटरनेट हम इस्तेमाल करते हैं, वो वेब की दुनिया का बहुत छोटा सा हिस्सा है, जिसे सरफ़ेस वेब कहते हैं. इसके नीचे छिपा हुआ इंटरनेट डीप वेब कहलाता है. डीप वेब में वो हर पेज आता है जिसे आम सर्च इंजन ढूंढ नहीं सकते मसलन यूज़र डेटाबेस, स्टेजिंग स्तर की वेबसाइट, पेमेंट गेटवे वगैरह.
डार्क वेब इसी डीप वेब का वो कोना है जहां हज़ारों वेबसाइट्स गुमनाम रहकर कई तरह के काले बाज़ार चलाती हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
बेचने वाले को पता नहीं होता कि खरीदने वाला कौन है, इसी तरह खरीदने वाले को नहीं पता होता कि बेचनेवाला कौन है.
अधिकारियों का कहना है कि ये कंटेंट शेयर करने वाले एक तरह की सोच रखने वाले लोग होते हैं जो मेसेजिंग ऐप्स पर सीसैम कंटेंट शेयर करते हैं, और ये किसी संगठित गैंग का काम नहीं.
मनोज अब्राहम कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि कोई गैंग आएगा, बच्ची को फुसलाएगा, किडनैप करेगा और उनके साथ ऐसे कृत्य करेगा."
केरल पुलिस के विशेष विंग काउंटर चाइल्ड सेक्शुअल एक्सप्लॉयटेशन सेंटर में सॉफ्टवेयर आइकाकॉप्स अधिकारियों को कथित दोषियों के आईपीऐड्र्सेज़ ढूढने में मदद कर रहा है.
आइकाकॉप्स मतलब इंटरनेट क्राइम्स अगेंस्ट चिल्ड्रन एंड चाइल्ड ऑनलाइन प्रोटेक्टिव सर्विसेज़.

एक अधिकारी के मुताबिक पिछले दो सालों से जबसे इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल शुरु हुआ, तब से अभी तक करीब 1500 तलाशी अभियानों को अंजाम दिया जा चुका है और साढ़े तीन सौ लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.
इस अधिकारी ने बताया, "एक पिता के तौर पर ये बहुत दर्दनाक है. हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चों के साथ ऐसा कुछ हो. जब हम सीसैम कंटेंट देखते हैं, हमें हमारे बच्चे याद आते हैं."
"इससे बड़ा हमारा उद्देश्य होता है कि हम पीड़ित बच्चे की पहचान करें, क्योंकि अपने छापों के दौरान हमें पता चला कि स्थानीय बच्चों का शोषण हो रहा है."
देश में ही विकास किए गए सॉफ़्टवेयर ग्रैपनेल को भी इसी काम में लगाया गया है.
इस सॉफ्टवेयर का विकास एक हैकाथन के नतीजे में हुआ था.
ये सॉफ्टवेयर डार्क वेब में किसी सर्च की तरह है जहां कीवर्ड्स टाइप करने पर ऐसे लिंक्स मिलते हैं जहां सीसैम कंटेंट होता है.
पुलिस फिर लोगों की पहचान करती है और उन पर कार्रवाई करती है.
आगे का रास्ता

सेक्शुअल अब्यूज़ मेटिरियल या सीसैम, पीडोफ़ीलिया भारत में संवेदनशील विषय हैं.
पुणे के सरकारी केईएम रिसर्च इंस्टिट्यूट एनजीओ में डॉक्टरों की एक टीम पीडोफीलिया को लेकर जागरुकता फैलाने और इसे एक मानसिक स्वास्थ्य की तरह देखे जाने को लेकर पांच सालों से ज़्यादा वक्त से काम कर रही है.
उन्होंने इस बारे में मूवी थिएटर्स, पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर कैंपेन भी चलाए हैं.
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इस प्रोजेक्ट में शामिल और मनोरोग चिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉक्टर वासुदेव पारालिकर कहते हैं, "लॉकडाउन में किसी भी इंसान के चारों ओर अकेलापन, अनिश्चितता होता है जिससे निपटने के लिए वो सेक्शुऐलिटी का सहारा लेता है, खासकर उस वक्त जब उसके चारों ओर कोई भी स्वास्थवर्धक विकल्प मौजूद नहीं हों."
वो कहते हैं, "(ऐसी परिस्थिति में) एक पीडोफ़ाइल में भी बच्चों के प्रति यौन इच्छाएं बढ़ सकती हैं, हालांकि हमें लोगों ने ये नहीं बताया है कि (कोविडकाल में) वो ज़्यादा सीसैम कंटेंट देख रहे हैं."
लॉकडाउन धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं लेकिन बच्चों का ऑनलाइन दुनिया के प्रति झुकाव नहीं.
मनोज अब्राहम ज़ोर देकर कहते हैं कि मां-बाप निगाह रखें कि उनके बच्चे ऑनलाइन क्या कर रहे हैं, और बच्चों को सिखाया जाए कि इंटरनेट पर क्या सुरक्षित है और क्या नहीं.
साथ ही मां-बाप बच्चों को समय दें और निगाह रखें कि उनके आसपास कौन है.
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