कैराना: पलायन के बाद घर वापसी पर योगी सरकार का दावा कितना सही

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- Author, अनंत झणाणे/ मोहम्मद दिलशाद
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बीते आठ नवंबर को कैराना दौरे के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यहां से पलायन करने वाले कुछ परिवारों से मुलाक़ात की.
साल 2016 में कैराना से बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने 346 परिवारों की सूची जारी कर दावा किया था कि आपराधिक आतंक के वजह से लोग यहां से पलायन कर रहे हैं.
योगी आदित्यनाथ ने कहा, ''मुझे याद है, कैराना की इस पीड़ा को बाबू हुकुम सिंह जी ने जोर-शोर से उठाया था. आज बाबू हुकुम सिंह जी हमारे बीच नहीं हैं.''
मुख्यमंत्री के ताज़ा बयान ने 'हिंदू दबाव में हैं' का मुद्दा फिर से उठा दिया है, वो भी ऐसे वक़्त में जब प्रदेश में चुनाव कुछ ही माह दूर हैं और सत्ताधारी पार्टी किसान आंदोलन को लेकर दबाव में बताई जा रही है.
लौटने वाले मित्तल परिवार का बयान
विजय मित्तल कैराना के बेगमपुरा के निवासी हैं. उनका आरोप है कि कैराना के मुकीम गैंग ने उनसे रंगदारी मांगी थी, जिसके बाद वो 2016 में सूरत पलायन कर गए. व्यापारी संघ के लोगों के मुताबिक़ विजय मित्तल का परिवार बहुत संपन्न था.
मुख्यमंत्री से मुलाक़ात के बारे में विजय मित्तल ने कहा कि, "मुख्यमंत्री आए, बड़ा आदर सम्मान हुआ प्रशंसा करके गए. हम लोगों का साहस बढ़ा के गए कि आप बेफिक्र होकर, बेख़ौफ़ होकर अपना काम धंधा आगे बढ़ाइए. हर तरीक़े से प्रशासन आपके साथ है, सरकार आपके साथ है. कोई भी परेशानी वाली बात नहीं है."

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''रंगदारी के बारे में सबको मालूम है. जान है तो जहान है. मैं चार साल सूरत में रहा. मुझे लौटे हुए तक़रीबन ढाई साल हो गए हैं. जब हमें लगा की हम सुरक्षित हैं, प्रशासन एक्टिव है, कोई दिक्क़त वाली बात नहीं है तो हम लौट गए. चार-पांच परिवार थे, जिनके साथ यह गंभीर वारदातें हुईं, अब जाकर सुकून है. उनमें से दो तीन परिवार वापस आये हैं. एक परिवार शायद अभी भी बाहर है. कितने लोग लौटे हैं उनकी ज़्यादा जानकारी मुझे नहीं है, लेकिन काफी संख्या में लोग अपने घरों में वापस आये हैं. हम अब बिलकुल सुरक्षित हैं.'
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'हत्या हुई, फिर भी कैराना नहीं छोड़ा'
16 अगस्त 2014 को वरुण सिंघल के भाई विनोद सिंघल की दिन दहाड़े गोली मार के हत्या कर दी गयी थी. वरुण उस वारदात को याद करते हुए कहते हैं, ''हमारी कैराना के बाज़ार में किराने की दुकान है, यहीं पर बदमाशों ने हमारे भाई को गोलियों से भून दिया था.''
भाई की हत्या के बाद वरुण सिंघल को एक बंदूकधारी सुरक्षाकर्मी मुहैया कराया गया जो हमेशा उनके साथ रहता है. वरुण सिंघल के परिवार ने दूसरों की तरह पलायन क्यों नहीं किया? इस सवाल पर वरुण कहते हैं, ''हमने तो सब कुछ खो दिया. पलायन तो आदमी डर के करता है ना. हमारे पास बचा ही कुछ नहीं था.''

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मुख्यमंत्री ने जिन परिवारों से मुलाक़ात की उसमें वरुण सिंघल का परिवार भी शामिल था.
वरुण कहते हैं, ''उन्होंने आश्वासन दिया कि हमें सुरक्षा दी जाएगी और आर्थिक सहायता भी मिलेगी. घटना के समय भी बहुत नेता आये थे, सपा के लोग भी आये थे, उन्होंने नौकरी का आश्वासन दिया था लेकिन सात सालों में कुछ नहीं मिला. ''
पलायन न करने के उनके अपने कारण थे. वरुण कहते हैं, ''पलायन के बारे में हमने भी सोचा, दो तीन साल बाहर रहने की कोशिश भी की, पर मैं अकेला हूं, बाहर रह कर परिवार नहीं चला सकता था. हमने प्लानिंग की थी लेकिन हालत कुछ ऐसे बने कि हम वो नहीं कर पाए. मैं उस समय बहुत छोटा था. फिर हमने सोचा कि कुछ होगा तो यहीं मरेंगे, जो होगा देखा जायेगा.''

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चुनावों में कैराना की याद
2016 में जब हुकुम सिंह की सूची से पूरे मामले पर चर्चा शुरू हुई तो मीडिया की पड़ताल में ऐसे कई मामले सामने आए जिसमें लोग काम की तलाश में आस-पास के बड़े शहरों में चले गए थे. लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मज़बूत किसान आंदोलन देखते हुए योगी सरकार ने फिर से मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के ज़ख्मों को कुरेदना शुरू कर दिया है. कैराना के मुद्दे को मुख्यमंत्री ने फिर से कुरेदा और विजय मित्तल, सिंघल परिवार के अलावा दो और परिवारों से मिले.
इस मुलाकात के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, ''मैंने ज़िला प्रशासन से उनकी रिपोर्ट मांगी है. बहुत सारे दोषियों पर कार्रवाई हुई है, सरकार लोगों को कुछ मुआवज़ा भी देगी जिससे वो लोग फिर से अपने व्यवसाय और आर्थिक गतिविधयों को आगे बढ़ा सकें. यह दायित्व बनता है कि मैं हर पीड़ित व्यक्ति से मिलूं, और पीड़ित अगर हिन्दू है तो उससे मिलना गुनाह नहीं है. इसलिए मैं उन पीड़ितों से मिलने आया हूँ, जिन्हें पिछली सरकार के समय प्रताड़ित करके पेशेवर अपराधियों ने यहाँ से पलायन करने पर मजबूर कर दिया था.'
2013 के मुज़फ्फरनगर के दंगों ने कैराना जैसे आस पास के इलाकों के सामाजिक ताने बाने को नुकसान पहुँचाने का काम किया था. कैराना में दंगा पीड़ितों के लिए शरणार्थी शिविर लगाए गए थे. मुख्यमंत्री ने कैराना में 250 करोड़ की कीमत वाले पीएसी बटालियन परिसर की आधारशिला भी रखी.
इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि यहां 1278 जवान रहेंगे और दंगा भड़काने की कोशिश करने वालों की कई पीढ़ियां भूल जाएंगी कि दंगा कैसे होता है.
अपनी सूची जारी करते हुए बीजेपी नेता हुकुम सिंह ने ये भी कहा था कि पलायन करने वालों में मुसलमान परिवार भी शामिल हैं और वो उनके नाम भी जारी करेंगे. लगभग पांच साल हो गए हैं लेकिन मुसलमान परिवारों के पलायन की सूची अबतक सामने नहीं आई है.

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वहीं पलायन के मुद्दे पर 11 नवंबर को मुजफ़्फ़रनगर पहुंचे समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए कहा, "मुख्यमंत्री कहते हैं पलायन हो गया और सच्चाई तो यह है अगर उत्तराखंड से मुख्यमंत्री जी का पलायन न होता तो 5 साल हमारे ख़राब नहीं होते."
पलायन करने वाले परिवारों का आधिकारिक आंकड़ा?
कैराना के व्यापारी मंडल के अध्यक्ष विपुल कुमार जैन कहते हैं कि पलायन के बड़े राजनीतिक दावों के पांच साल बाद भी अब तक इसको लेकर कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.
उनके मुताबिक़ आंकड़े मौजूद नहीं होने की वजह प्रशासनिक लापरवाही नहीं है, बल्कि आम लोगों में पलायन को छिपाने की मानसिकता के कारण ऐसा हो रहा है.
विपुल कुमार जैन कहते हैं, "पलायन करने का एक स्टिग्मा होता है इसिलए, जो बाहर गए और फिर वापस आ गए. वो इसे लेकर कुछ कहने को तैयार नहीं होते हैं. ऐसे लोगों में शर्म का भाव होता है लेकिन 40 से 50 लोग वापस आए हैं."

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लेकिन वे 40-50 लोगों की वापसी को लेकर अपने दावे के पक्ष में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं पेश कर सके, और ना ही इन लोगों के बारे में पूरी जानकारी ही बता पाए.
हालांकि वे इस पलायन की एक बड़ी वजह रोज़गार मानते हैं. उन्होंने बताया, "कैराना हरियाणा से सटा हुआ है और अक्सर लोग, विशेषकर नौजवान रोज़गार की तलाश में बाहर जाते रहते हैं. सुबह कांधला बस स्टैंड पर बाहर जानेवालों की क़तार दिख जाएगी. कहीं न कहीं यहां स्थानीय स्तर पर रोज़गार उपलब्ध न होने की बात को दर्शाता है."
लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि अगर बहुत सारे लोग वापस लौट चुके हैं तो मुख्यमंत्री सिर्फ चार परिवार से क्यों मिले?
योगी आदित्यनाथ ने जब कैराना में वापस आ चुके परिवारों से मुलाक़ात की तो उनके साथ थाना भवन विधानसभा सीट से विधायक सुरेश राणा भी मौजूद थे. राणा योगी आदित्यनाथ सरकार में गन्ना मंत्री भी हैं और उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क़द्दावर नेता माना जाता है.

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बीबीसी ने सुरेश राणा से पूछा कि हुकुम सिंह की लिस्ट में 346 लोगों की बात थी और अभी भी 40-50 लोगों की वापसी की बात हो रही लेकिन मुख्यमंत्री चार ही परिवारों से क्यों मिले?
इसके जवाब में राणा ने कहा, ''बात 346 या 500 की नहीं है. बात है विचार की. विचार यह कि यह सबको मालूम है, पक्ष विपक्ष सबको पता है कि किस तरह से लोगों ने यहाँ पलायन किया था, और क्यों किया था. समाजवादी पार्टी का गुंडाराज था, पूरी तरह से एक तांडव का माहौल था, उससे परेशान होकर लोगों ने पलायन किया था. यदि पलायन करके वापस कोई व्यक्ति आता है और मुख्यमंत्री उनसे मिलते हैं, तो मैं समझता हूँ कि यह उन सभी लोगों की भावनाओं का सम्मान है जो वापस आये. विषय संख्या का नहीं है, विषय एहसास का है. लोगों ने एहसास किया है की यहाँ सुकून है. यहाँ शान्ति स्थापित हुई है. यहाँ क़ानून का राज्य स्थापित हुआ है.'
समाजवादी पार्टी के शासनकाल में कैराना में गुंडागर्दी चरम पर होने के आरोप पर समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता सुनील साजन कहते हैं, "गुंडागर्दी अगर हुई होगी तो कानून ने अपना काम किया होगा, जिसने भी गुंडई की होगी, क़ानून तो सबके लिए एक सामान काम किया होगा. भाजपा बहुत बेहतर प्रोपेगैंडा कर लेती है. उसी प्रोपेगैंडा से वो दोबारा चुनाव लड़ना चाहते हैं. भाजपा के शासन काल में पुलिस कस्टडी में हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश नंबर एक हो गया है, कोई किसी को भी ठोक दे रहा है, उस प्रदेश में भाजपा क़ानून व्यवस्था की बात कर रही है."

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कैसी है आरएलडी की कैराना पर सियासी पकड़
साल 2018 में बीजेपी के कैराना से सांसद हुकुम सिंह के देहांत के बाद आरएलडी और समाजवादी पार्टी की संयुक्त उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को उपचुनाव में हराकर चार लाख 80 हज़ार मतों से चुनाव जीता था. लेकिन 2019 में वो बीजेपी के प्रत्याशी प्रदीप चौधरी से चुनाव हार गईं थीं. इसके बावजूद आरएलडी की कैराना की राजनीति पर अच्छी खासी पकड़ है और माना जा रहा है कि इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ उसका गठबंधन होने से उन्हें फ़ायदा भी मिलेगा.
पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता इस्लाम चौधरी कहते हैं कि कैराना की इतिहास में कभी दंगा नहीं हुआ. वहां हिन्दू-मुसलमान एक साथ रहते आए हैं. आज तक इनको किसी ने यह नहीं कहा कि हमारा पलायन हुआ. यह ख़ुद ब ख़ुद आए हैं क्योंकि यह ध्रुवीकरण करना चाहते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोक दल की ताकत से यह घबराते हैं.
इस्लाम चौधरी कहते हैं कि ''हुकुम सिंह ने जब पलायन का मुद्दा उठाया था तो उनके बयान में भी किसी धर्म का उल्लेख नहीं था, या फिर किसका हाथ था इसका भी ज़िक्र नहीं था. कभी कभी कुछ सरकारों में गुंडातत्व होते हैं, उनको सज़ा मिली. हम भी चाहते हैं कि गुंडागर्दी नहीं होनी चाहिए, चाहे किसी भी सरकार हो.''
वो सवाल करते हैं कि अगर पलायन इतने बड़े पैमाने पर हुआ और दबाव में हुआ तो मुक़दमा क्यों नहीं हुआ, पलायन कराने वालों को सज़ा क्यों नहीं मिली? इनके पास कोई मुद्दा नहीं है और ये चाहते हैं कि चुनाव तक हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण हो जाए.

ऐसे कितने मामले हैं जिसमें मुआवज़ा और मदद दी जाएगी?
बीबीसी ने शामली की डीएम जसजीत कौर से जानने की कोशिश की कि क्या प्रसाशन के पास पलायन और गुंडागर्दी में मारे गए लोगों के आंकड़े हैं? इस पर उन्होंने कहा कि, "मुख्यमंत्री जी ने कहा है कि ऐसे लोग चिन्हित किये जाएँ जो पिछले कुछ सालों में यहां से कई कारणों से चले गए हैं. और अगर उनके घरों में कोई समस्या है जिसके लिए उन्हें सहायता दी जा सकती है, ऐसे लोगों की लिस्ट बनाने के लिए कहा है. हम थाने के स्तर पर सूची बनाने का काम करेंगे और फिर उसे सत्यापित करके की कोशिश करेंगे. अभी मुझे सिर्फ़ सूची बनाने को कहा गया है और आगे सीएम ऑफिस से जो निर्देश आएगा, उस हिसाब से उन परिवारों को हर संभव सहायता मुहैया करायी जाएगी."
लेकिन मामला 2016 का है और पलायन का दावा काफी पुराना तो अभी तक कोई सूची क्यों तैयार नहीं हो पायी? इस सवाल के जवाब में डीएम जसजीत कौर ने कहा कि, "दो परिवार हैं जिनके परिवार के सदस्यों की बाज़ार में हत्या कर दी गयी थी. उनमें से कुछ सदस्य हैं जो पलायन करके चले गए थे. उनमें से कुछ मुज़फ़्फ़रनगर जा कर बस गए थे. ये लोग चिन्हित हैं. क्योंकि यह पुराना मामला है, मेरे पास ऐसी कोई सूची नहीं है. इसीलिए हमे एक बार नए सिरे से इसे बनाने का काम करना पड़ेगा और जो वास्तविक मामले हैं उन्हें चिन्हित करना पड़ेगा."
कैराना से लोगों के पलायन को लेकर कोई आंकड़ें भले ही न हों लेकिन फ़िलहाल कैराना पलायन के नाम का एक बार फिर चुनाव में इस्तेमाल होना शुरू हो गया है और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वालों की मानें तो आने वाले दिनों में यह और तेज़ होगा.
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