उत्तर प्रदेश: योगी आदित्यनाथ ने क्या विधानसभा चुनाव के पहले बना ली है बढ़त?

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार को प्रदेश की नई जनसंख्या नीति को लेकर चर्चा में रहे.
योगी आदित्यनाथ ने रविवार को हुए एक कार्यक्रम में लगातार बढ़ती जनसंख्या की वजह से बनी समस्याओं को गिनाया और कहा, "बढ़ती हुई जनसंख्या समाज में व्याप्त असमानता समेत प्रमुख समस्याओं का मूल है."
सिर्फ़ एक दिन पहले प्रदेश के विधि आयोग ने नई जनसंख्या नीति का मसौदा अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया था. दो से ज़्यादा बच्चे वालों पर मसौदे में सुझाए गए तमाम प्रतिबंधों को लेकर बहस भी शुरू हो गई.
इसके पहले उत्तर प्रदेश के ब्लॉक प्रमुख चुनाव में सत्ताधारी बीजेपी की जीत की चर्चा थी. चुनाव नतीजों के एलान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने बधाई दी. पीएम मोदी ने जीत का श्रेय योगी आदित्यनाथ सरकार की 'नीति और योजनाओं को दिया.'
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इस चुनाव के दौरान प्रदेश के कई ज़िलों से हिंसा की ख़बरें और महिलाओं के साथ हुई बदसलूकी की घटनाएं सामने आईं थीं.

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विपक्ष पर सवाल
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल भी उठाए लेकिन ऐसे ही मुद्दों को विपक्ष में रहते हुए बीजेपी जितने ज़ोर-शोर से उठाती रही थी, उसके ख़िलाफ़ मौजूदा विपक्ष की ओर से उस तरह का विरोध देखने को नहीं मिला.
सवाल ज़िला पंचायत अध्यक्ष पद पर चुनाव के दौरान भी उठे जहां 75 में से 67 पर बीजेपी ने जीत हासिल की. समाजवादी पार्टी ने तब भारतीय जनता पार्टी पर 'सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग' का आरोप लगाया लेकिन विपक्ष की शिकायतें भारतीय जनता पार्टी की जीत के दावों और योगी आदित्यनाथ को देश भर के बीजेपी नेताओं की ओर से मिलती बधाइयों के शोर के पीछे छुप गईं.
ये स्थिति तब है जबकि सिर्फ़ दो महीने पहले कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज पर कई सवाल उठ रहे थे. सरकार के मंत्री और बीजेपी के कई नेता ही शिकायत कर रहे थे.
गंगा और दूसरी नदियों में बहती लाशें और नदी किनारे लाशों को दफ़न करने का मुद्दा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया हुआ था. इसी दौरान हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में बीजेपी के पिछड़ने की चर्चा ज़ोरों पर थी.
भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व योगी आदित्यनाथ से नाख़ुश बताया जा रहा था और केंद्रीय नेताओं के लगातार लखनऊ दौरे के बीच सरकार में बदलाव की अटकलें हावीं थीं. उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों की राय है कि फ़िलहाल योगी आदित्यनाथ उस मुश्किल दौर से आगे बढ़ गए लगते हैं.

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योगी की बढ़त
विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले वो न सिर्फ़ उत्तर प्रदेश बीजेपी के सर्वमान्य चेहरा बन गए हैं बल्कि वही प्रदेश में मुद्दों और चर्चाओं की दिशा भी तय कर रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं, "इस समय उत्तर प्रदेश में बीजेपी को एडवांडेटज ये है कि विपक्ष मैदान में है ही नहीं. पिछले डेढ़ साल में विपक्ष का कोई नेता ज़मीन पर नहीं उतरा है. ट्विटर से बाहर कोई नहीं आया है."
ज़िला पंचायत अध्यक्ष चुनाव का ज़िक्र करते हुए प्रदीप सिंह कहते हैं, "जिला पंचायत अध्यक्ष का जो चुनाव है उसमें सत्तापक्ष जीतता है. ये कोई छिपी हुई बात नहीं है. यह अप्रत्यक्ष इलेक्शन है, मैनेज किया जाता है लेकिन इसी चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने अपने दर्जनभर ज़िला अध्यक्षों को हटा दिया. वजह ये थी कि वो जिन जीते हुए सदस्यों को अपना बता रहे थे, उन्हें साथ नहीं रख पाए."
इसके ठीक पहले जब जिला पंचायत सदस्यों का चुनाव हुआ था तो समाजवादी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की चर्चा थी. चुनाव नतीजों को लेकर उत्तर प्रदेश बीजेपी बैकफुट पर थी और योगी आदित्यनाथ सरकार पर भी सवाल उठ रहे थे. हालांकि उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं कि इस जीत के लिए समाजवादी पार्टी ने कोई ख़ास प्रयास नहीं किया था.
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ज़िला पंचायतों में जीत
शरत प्रधान कहते हैं, "मेरे ख्याल से अखिलेश यादव ने कोई प्रयास नहीं किया था. वो ख़ुद भी घर में रहते थे. मायावती भी बाहर नहीं निकलती थीं लेकिन उस समय जो नतीजे आए वो एक संकेत था कि गाँव में नाराज़गी है बीजेपी को लेकर. कुछ नाराजगी कृषि क़ानूनों को लेकर रही होगी जिसे लेकर दिल्ली बॉर्डर पर अब भी विरोध प्रदर्शन चल रहा है.''
''कुछ उसकी वजह होगी. दूसरा कारण शर्तिया तौर पर कोरोना रहा होगा, जब लोगों ने नाराज़गी में वोट दिया होगा. उसके बाद तमाम दूसरे राजनीतिक दलों की तरह अखिलेश यादव ने भी दावा किया कि हम तो बहुत दिनों से घर में बैठे काम कर रहे थे. ऑन लाइन कर रहे थे. मीटिंग कर रहे थे. वो सब दावे हैं, उन्हें बताना है कि नतीजा हमारी मेहनत से मिला है."
शरत प्रधान ये भी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव में मुख्य मुक़ाबला बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच ही माना जा रहा है लेकिन अभी 'अखिलेश यादव ने सही मायने में टक्कर देने के तेवर नहीं दिखाए हैं.'
प्रदीप सिंह भी इसी बात को आगे बढ़ाते हैं. वो कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की सभी विपक्षी पार्टियों के मुक़ाबले योगी आदित्यनाथ काफी सक्रिय दिखते हैं.
वो कहते हैं, "दूसरी लहर में खुद इन्फेक्टेड होने के बाद जब योगी आदित्यनाथ 14 दिन के क्वैरंटाइन से निकले तो उन्होंने 40-45 ज़िलों का दौरा कर लिया. बाकी सभी पार्टियों के नेताओं को मिला दें तो पांच ज़िलों में भी नहीं गए. तो इसका भी तो असर होगा. केवल ये उम्मीद करना कि हम सरकार की कमियों को गिना देंगे और जनता फिर हमको वोट दे देगी ऐसा तो होता नहीं है."
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उत्तर प्रदेश में बीते कुछ दिनों से जिन मुद्दों पर बहस हो रही है राजनीतिक विश्लेषक उसे भी बीजेपी के फ़ायदे में देख रहे हैं.
प्रदीप सिंह कहते हैं, "2014 से बीजेपी की जो रणनीति है, वो उसी पर चलेगी. ये रणनीति है नेशनलिज़्म. हिंदुत्व उसमें शामिल है और डेवलपमेंट भी. ये रणनीति बीजेपी सब जगह इस्तेमाल कर रही है. कहीं कामयाब हो रही है और कहीं नहीं हो रही है. लेकिन उत्तर प्रदेश में भी इन्हीं दो मुद्दों पर बीजेपी चलेगी."
प्रदीप सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की लड़ाई बड़ी होगी. आगे नज़र 2024 पर भी है. बीजेपी की भी और दूसरी पार्टियों की भी.
वो कहते हैं, "बीजेपी के लिए ये आसान लड़ाई नहीं होने जा रही है लेकिन विपक्ष की कमजोरी इसे आसान बना रही है."
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