योगी सरकार के नए जनसंख्या प्रस्ताव को मुसलमानों से जोड़ना कितना सही?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बात 15 अगस्त 2019 की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल क़िले से भाषण दे रहे थे. वहाँ जनसंख्या विस्फोट पर बोलते हुए उन्होंने छोटे परिवार को सीधे देश भक्ति से जोड़ा.
उन्होंने कहा था, "हमारे यहाँ बेतहाशा जनसंख्या विस्फोट हो रहा है. ये हमारे लिए, हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए अनेक नए संकट पैदा करता है. हमारे देश में आज भी स्वयं प्रेरणा से एक छोटा वर्ग परिवार को सीमित करके अपना भी भला करता है और देश का भी भला करने में बहुत बड़ा योगदान देता है. ये सब सम्मान के अधिकारी हैं, आदर के अधिकारी हैं. छोटा परिवार रख कर भी वो देश भक्ति को ही प्रकट करते हैं."
प्रधानमंत्री मोदी के इसी भाषण से प्रेरित और उत्साहित होकर उत्तर प्रदेश सरकार जनसंख्या नीति 2021-2030 लेकर आई.
इसमें साफ़ कहा गया है कि उत्तर प्रदेश को ज़रूरत पड़ी, तो इस पर क़ानून भी लाया जा सकता है.
उस क़ानून का मसौदा (उत्तर प्रदेश पॉपुलेशन कंट्रोल, स्टेबलाइज़ेशन एंड वेलफ़ेयर बिल) राज्य के विधि आयोग ने तैयार भी कर लिया है.
अभी उस पर सुझाव माँगे गए हैं. सब कुछ ठीक रहा, तो अगस्त के पहले हफ़्ते में मसौदा योगी सरकार को सौंप दिया जाएगा.
अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं क़ानून लाकर जनसंख्या को नियंत्रित नहीं किया जा सकता.
बिहार में बीजेपी और जेडीयू सत्ता में साझीदार है. इस वजह से उनके विरोध की चर्चा हर तरफ़ हैं.
ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की तरह ही बढ़ती जनसंख्या बिहार के लिए उतनी ही चिंता का विषय है.
कुछ राजनीतिक दल जैसे समाजवादी पार्टी और असदुद्दीन औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण क़ानून को मुसलमानों से जोड़ कर देख रहे हैं और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ऐसे प्रस्तावित बिल की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं.
यही वजह है कि योगी सरकार की जनसंख्या नीति से ज़्यादा चर्चा प्रस्तावित क़ानून के मसौदे की हो रही है.
इसलिए ज़रूरत है कि नई जनसंख्या नीति और प्रस्तावित क़ानून दोनों को अलग से पहले समझा जाए.

उत्तर प्रदेश की जनसंख्या से जुड़े कुछ ज़रूरी तथ्य
2011 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत की आबादी का छठा हिस्सा (लगभग 16 प्रतिशत) उत्तर प्रदेश में रहता है.
फ़िलहाल उत्तर प्रदेश की आबादी तकरीबन 20 करोड़ है, जो साल 2050 तक 28 करोड़ होने की संभावना है.
भारत में सबसे ज़्यादा किशोर-किशोरियाँ (10-19 उम्र) उत्तर प्रदेश में रहते हैं.
भारत की सबसे बड़ी युवा आबादी भी (15-24 उम्र) उत्तर प्रदेश में रहती है.
जानकार इन दोनों को उत्तर प्रदेश के हित में बताते हैं.
लेकिन सरकार को इसी आयु वर्ग की चिंता सबसे ज़्यादा सता रही है.
ऐसा इसलिए क्योंकि 15-19 साल के बीच 4 फ़ीसदी लड़कियाँ माँ बन जाती हैं. राज्य में 30 फ़ीसदी लड़कों की शादी 21 साल से कम उम्र में हो जाती है.
इसलिए उत्तर प्रदेश की नई जनसंख्या नीति पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि इस नीति का मक़सद राज्य की जनसंख्या को स्थिर करना, प्रजनन दर में कमी लाना है.

क्या उत्तर प्रदेश में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति है?
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के संयुक्त निदेशक आलोक वाजपेयी कहते हैं कि किसी देश या राज्य में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति तब आती है, जब लगातार तेज़ी से जनसंख्या बढ़ रही हो और प्रजनन दर भी 4 से ऊपर हो.
उत्तर प्रदेश की बात करें, तो 1991 से 2011 के बीच जनसंख्या बढ़ने की रफ़्तार में लगभग पाँच फ़ीसदी की कमी आई है. ( देखें ग्राफ़ 1)
मतलब ये कि उत्तर प्रदेश की आबादी लगातार बढ़ तो रही है, लेकिन बढ़ने की स्पीड में कमी आई है.
उसी तरह से उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक में प्रजनन दर में कमी आई है.
2005-06 में नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में प्रजनन दर 3.8 थी.
जो 2015-16 में घट कर 2.7 रह गई है. जबकि भारत का राष्ट्रीय औसत 2.2 है. (देखें ग्राफ़ 2)
एक अनुमान के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में 2025 तक प्रजनन दर 2.1 पहुँच जाएगा, जो रिप्लेसमेंट रेसियो के क़रीब है.
प्रजनन दर का मतलब है एक औरत औसतन कितने बच्चे पैदा करती है.
रिप्लेसमेंट रेसियो 2.1 का मतलब है, दो बच्चे पैदा करने से पीढ़ी दर पीढ़ी वंश चलता रहेगा. (प्वाइंट वन इसलिए क्योंकि कभी-कभी कुछ बच्चों की मौत छोटी उम्र में हो जाती है.)
यानी दोनों लिहाज से ( जनसंख्या वृद्धि दर और प्रजनन दर ) उत्तर प्रदेश में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति नहीं है.

तो फिर उत्तर प्रदेश में नई नीति की ज़रूरत क्यों?
आलोक वाजपेयी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार को जनसंख्या नीति की ज़रूरत तो है, लेकिन दो बच्चों वाले प्रस्तावित क़ानून की नहीं.
उत्तर प्रदेश सरकार ने नई जनसंख्या नीति के तहत 2030 तक प्रजनन दर 2.0 से कम करने का लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को पाने के लिए सरकार को लोगों को परिवार नियोजन के तरीक़े के बारे में और प्रचार प्रसार करना होगा.
मसलन बिना जाने अगर कम उम्र में ही लोग परिवार सीमित करने के लिए नसबंदी जैसे तरीक़े अपनाने लगेंगे, तो वो ग़लत होगा. उस समय उन्हें बच्चों में अंतर के तरीक़े अपनाने की ज़रूरत है.
लोगों में इस बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए नीति की ज़रूरत है. अभी योगी सरकार ने काग़ज़ों पर नीति तैयार की है.
इसे अमल में लाने के लिए अलग से एक्शन प्लान और बजट की ज़रूरत पड़ेगी.
अगर अलग से बजट आबंटित करके इस नीति को एक्शन प्लान के साथ लागू किया गया, तो क़ानून की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.
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जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की ज़रूरत कब?
योगी सरकार ने जनसंख्या नीति लागू करते हुए कहा कि अगर नीति लाने से जनसंख्या स्थिर नहीं होती है, प्रजनन दर में कमी नहीं आती है, तो सरकार क़ानून लाएगी.
इस क़ानून का एक मसौदा राज्य विधि आयोग ने तैयार भी कर लिया है. जिसमें दो बच्चों के परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ देने की बात कही गई है, जैसे दो अतिरिक्त इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) और माँ या पिता बनने पर पूरे वेतन और भत्तों के साथ 12 महीने की छुट्टी.
दो से अधिक बच्चे पैदा करने वाले लोग स्थानीय, निकाय और पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएँगे. वो सरकारी नौकरियों के लिए योग्य नहीं होंगे.
एक बच्चे वाले परिवार को भी प्रोत्साहित करने की बात कही गई है.
19 जून तक राज्य विधि आयोग ने इसके लिए सुझाव माँगे हैं. पिछले दो दिन में उन्हें 4000 से ज़्यादा सुझाव मिले हैं. इनमें से एक विश्व हिंदू परिषद का भी है.
विश्व हिंदू परिषद ने दो बच्चों के परिवार वाली बात को सही ठहराया है, लेकिन एक बच्चे वाले परिवार को प्रोत्साहित करने पर उन्हें आपत्ति है.
विधि आयोग को इस पर एतराज़ जताते हुए उन्होंने तीन पन्ने का पत्र भेजा है.

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बीबीसी से बातचीत में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा, "एक बच्चे को प्रोत्साहित करने का अर्थ है कि प्रजनन दर 1 के आसपास रहेगी. औसतन प्रजनन दर 2.1 रहती है, तो ही जनसंख्या स्थिर रहती है. एक बच्चा होने पर जनसंख्या सिकुड़ने लगती है जैसा चीन में हाल ही में हुआ. और 30 साल के बाद में उन्हें अपनी नीति बदलनी पड़ी है."
विश्व हिंदू परिषद का दूसरा तर्क है- एक बच्चे वाले परिवारों को प्रोत्साहित करने पर एक बच्चे पर 6 लोगों की ज़िम्मेदारी होगी, माता-पिता, दादा दादी और नाना नानी. इसके अलावा अकेला बच्चा समाज में परिवार को लेकर चलना नहीं सिखता. अंहकारी और अभिमानी हो जाता है.
इसलिए एक बच्चे वाले परिवार को प्रोत्साहित करने की बात को उन्होंने प्रस्तावित क़ानून से हटाने की सिफ़ारिश की है.
ग़ौरतलब है कि विधि आयोग ने जो जनसंख्या क़ानून का मसौदा तैयार किया है, अभी केवल वो प्रस्ताव है, जिस पर लोगों से सुझाव माँगे गए हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक ना तो इसे स्वीकार किया है और ना ही विधि आयोग को क़ानून बनाने की सलाह दी थी. विधि आयोग ने ख़ुद ही इस मामले में पहल करते हुए ये प्रस्ताव बनाया है, जिसे सरकार को अगस्त के बाद भेजा जाएगा.
दूसरे जानकारों के मुताबिक़ 'दो बच्चों वाला क़ानून' लाने के अपने अलग नुक़सान हैं, जैसे इससे 'सेक्स सिलेक्शन' बढ़ सकता है और सेक्स रेसियो भी गड़बड़ हो सकता है.
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क्या केवल मुसलमान ही दो से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं?
विपक्ष के कई नेता इस क़ानून को मुसलमानों के साथ जोड़ कर देख रहे हैं, जिनमें समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम की आवाज़ सबसे मुखर है. वैसे इसके पीछे दोनों की अपनी राजनीति भी है.
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में लगभग छह महीने का वक़्त बचा है.
राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार कहते हैं, "जिन राज्यों में क्षेत्रिय पार्टियां मैदान में होती हैं वहाँ बीजेपी की कोशिश रहती है कि हिंदू वोट एकमुश्त उन्हें मिले और विपक्षी पार्टियों में मुसलमान वोट बंटे."
जैसा पश्चिम बंगाल और बिहार में देखा गया. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को एकमुश्त मुसलमान वोट मिले, इस वजह से वो जीत पाईं. अगर वो वोट लेफ़्ट गठबंधन और तृणमूल में बँटता तो स्थिति दूसरी हो सकती थी. ठीक ऐसा ही बिहार में हुआ. एआईएमआईएम को सीटें ना मिलती तो बिहार की राजनीति कुछ और होती.
वो आगे कहते हैं, "जनसंख्या बिल पर अगर विपक्ष हिंदू-मुसलमान करता है, तो बीजेपी को हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ेगी."
"यूपी में मुस्लिम वोट पर आँख गड़ाए तीन पार्टियाँ रहती हैं. बसपा, सपा और कांग्रेस. पिछले चुनाव के नतीजे बताते हैं कि इनमें से जिस पार्टी को मुस्लिम वोट ज़्यादा मिले, वो पार्टी अच्छा प्रदर्शन करती है. कुल मिला कर देखें तो मुस्लिम वोट ज़्यादातर समाजवादी पार्टी के साथ दिखे. आने वाले चुनाव में अगर उन्हें अच्छा प्रदर्शन करना है, तो मुस्लिम वोट उनके साथ खड़ा दिखाई दें."
सवाल ये भी है कि क्या केवल मुसलमान ही दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं? उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ये बात कितनी सही या कितनी ग़लत है?
नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे 4 के आँकड़ें बताते हैं कि तीन से ज़्यादा बच्चे हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग पैदा करते हैं. हिंदुओं में जहाँ ऐसे लगभग 40 फ़ीसदी परिवार हैं, जिनके तीन से ज़्यादा बच्चे हैं, वहीं मुसलमानों में लगभग 50 फ़ीसदी परिवार ऐसे हैं, जिनके तीन से ज़्यादा बच्चे हैं. ( देखें ग्राफ़ 3)
यानी हिंदू और मुसलमानों में अंतर 10 फ़ीसदी का है.
एक सच ये भी है कि संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी (18.5 फ़ीसदी ) हिंदुओं (80.6 फ़ीसद) के मुक़ाबले कम है. दो से ज़्यादा बच्चों पर उत्तर प्रदेश का जनसंख्या नियंत्रण क़ानून लागू होगा, तो केवल मुसलमानों पर ही इसका असर नहीं पड़ेगा, हिंदू आबादी पर भी असर होगा.
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इसलिए नीतीश कुमार जनसंख्या नियंत्रण के लिए महिलाओं को शिक्षित करने का फ़ॉर्मूला सूझाते रहे हैं.
उनके मुताबिक़ जनसंख्या नियंत्रण के लिए क़ानून की नहीं, महिलाओं को ज़्यादा शिक्षित करने की ज़रूरत है. ताकि परिवार नियोजन के तरीक़ों के प्रति वो जागरूक हो सकें और अपना सकें. ज़रूरत ये भी है कि जो महिलाएँ परिवार नियोजन के तरीक़े अपनान चाहती हैं, उनको उसके लिए सुविधाएँ मुहैया कराई जाएँ.
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