चीन: पहले रोक लगाई अब तीन बच्चे पैदा करने की क्यों मिली इजाज़त

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आबादी को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाले चीन ने अपनी जनसंख्या नियंत्रण नीति में बड़ा बदलाव किया है.
चीन की जनसंख्या लगभग एक अरब 41 करोड़ है और यहां आबादी पर काबू रखने के लिए बेहद आक्रामक तरीक़े से प्रयास होता रहा है.
चीन में लंबे समय तक एक बच्चे की नीति को सख्ती से लागू किया गया था. कई सालों बाद नीति बदल गई और लोगों को दो बच्चे पैदा करने की छूट दी गई.
लेकिन, जन्म पर नियंत्रण की इस नीति में अब एक बड़ा बदलाव आया है.
चीन में लोगों को तीन संतानों की अनुमति दे दी गई है. जनगणना में आए आंकड़ों में जन्मदर में हो रही गिरावट को देखते हुए चीन ने तीन बच्चों की नीति अपनाने की घोषणा की है.
चीन की जनसंख्या पिछले कई दशकों के मुक़ाबले सबसे धीमी गति से बढ़ रही है. पिछले दस सालों में यहां आबादी बढ़ने की औसत सालाना दर 0.53 फीसदी रही है. यानी चीन में बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ रही है और बच्चे पैदा होने की दर धीमी है. हालांकि, चीन अब भी दुनिया का सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश है.
चीन ने साल 2016 में दशकों से चली आ रही एक बच्चे की नीति को ख़त्म कर दिया था.
लेकिन, इसके बाद लागू हुई दो बच्चों की नीति से भी जन्मदर बढ़ाने में कुछ खास फायदा नहीं मिला.

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मौजूदा फ़ैसले को कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष अधिकारियों की बैठक में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मंज़ूरी दे दी है.
लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी मानवाधिकार संस्था का कहना है कि पुरानी नीतियों की तरह ये नीति भी यौन और प्रजनन अधिकार का उल्लंघन करती है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल की चीन प्रमुख जोशुआ रोज़ेंसवाइग कहती हैं, “सरकार को इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि लोग कितने बच्चे पैदा करते हैं. अपनी जन्म नीति में बदलाव करने की बजाए चीन को लोगों की इच्छा का सम्मान करना चाहिए और लोगों के परिवार नियोजन के फ़ैसलों पर से नियंत्रण ख़त्म करना चाहिए.”
लेकिन, चीन में जन्म संबंधी नीति में बदलाव की संभावना लंबे समय से जताई जा रही थी.
यहां तक कि जनगणना के आंकड़े आने के बाद जन्म पर पूरी तरह नियंत्रण हटाने के भी कयास लगाए जाने लगे थे.
चीन में बच्चों की संख्या सीमित करने की नीति जनसंख्या नियंत्रण के अहम उपायों में से रही है. देश में इसे बेहद सख्ती के साथ लागू किया गया.
1979 की एक बच्चे की नीति के तहत उसका उल्लंघन करने वालों को नौकरी तक गंवानी पड़ी, सज़ा का सामना करना पड़ा और जबरन गर्भपात तक हुए.

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करीब 36-37 सालों तक इसी नीति को बनाए रखने के बाद आखिर चीन को 2016 में दो बच्चों की अनुमति देनी पड़ी. अब पांच सालों में ही ये छूट बढ़कर तीन बच्चों तक आ गई है.
चीन के सामने चुनौतियां
इसके पीछे बड़ी वजह हैं चीन की घटती जन्म दर, बूढ़ी होती आबादी और कामकाजी लोगों की कमी.
चीन की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यव्यस्था के लिए ये स्थितियां चुनौती बन सकती हैं. विशेषज्ञ इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पर भी ज़ोर देते रहे हैं.
इस महीने जारी हुई जनगणना के मुताबिक चीन में पिछले साल करीब एक करोड़ 20 लाख बच्चे पैदा हुए थे जबकि साल 2016 में ये संख्या एक करोड़ 80 लाख थी. 2021 में आया ये आंकड़ा 1960 के बाद से सबसे कम है. ये जनगणना 2020 में की गई थी.
इससे जनसंख्या तो कम हुई है लेकिन आबादी का ढांचा बदल गया है.
साल 2019 में चाइना अकेडमी ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के एक अध्ययन में देश की कम होती श्रम शक्ति और बूढ़ी आबादी को लेकर चिंता जताई गई थी.
रिपोर्ट का कहना था कि इन दोनों बदलावों के बेहद प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं. इस शताब्दी के मध्य तक चीन की जनसंख्या घटकर एक अरब 36 करोड़ हो जाएगी लेकिन श्रम शक्ति गिरकर 20 करोड़ पर पहुंच जाएगी.

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक चीन निम्न और मध्यम आय वाले अन्य देशों के मुक़ाबले तेज़ी से बूढ़ा हो रहा है. 60 साल से ऊपर के लोगों का अनुपात 2010 में 12.4 प्रतिशत था जो 2040 में बढ़कर 28 प्रतिशत हो जाएगा.
वहीं, सामाजिक और आर्थिक बदलाव चीन में उम्रदराज़ लोगों की देखभाल की व्यवस्था बदल रहे हैं. भविष्य में हर नौजवान दंपत्ति पर चार या उससे ज़्यादा ऐसे बुर्ज़ुगों की ज़िम्मेदारी होगी जिन्हें देखभाल की ज़रूरत है.
चीन में इस समस्या पर लंबे समय से चर्चा हो रही है और इसलिए कई इलाक़ों में दो बच्चों की सीमा से पहले ही छूट दी गई थी.
इससे जहां उद्योगों के लिए कामगार और ज़्यादा उत्पादक आबादी की संख्या घट रही है वहीं, युवाओं पर ज़िम्मेदारियों का बोझ भी बढ़ रहा है. जिसका असर लोगों के जीवन से स्तर लेकर पूरी अर्थव्यवस्था की वृद्धि पर पड़ सकता है.
हालांकि, इसके बावजूद भी तीन बच्चों की नीति से मिलने वाली सफलता पर आशंका जताई जा रही है.

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छोटा पारिवारिक ढांचा
इसकी एक वजह हैं पहले से मिले अनुभव और पारिवारिक ढांचे में आए बदलाव.
बताया जाता है कि 2016 में दो बच्चे पैदा करने की छूट दिए जाने के बाद भी देश की गिरती जन्म दर को बदलने में सफलता नहीं मिली. हालांकि, इस घोषणा के लगातार दो सालों तक जन्म दर में बढ़ोतरी ज़रूर देखने को मिली थी.
द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट यू सू कहती हैं, “दो बच्चों की नीति का जन्म दर पर सकारात्मक असर देखने को मिलने के बावजूद भी ये बहुत कम समय के लिए रहा.”
सरकार से छूट मिलने के बावजूद भी चीन में सामाजिक ढांचा एक बच्चे की नीति के अनुसार ही ढल गया है. लोग छोटे परिवार चाहते हैं और लैंगिक असंतुलन बना हुआ है.
एक बच्चे की नीति से चीन में लैंगिक असंतुलन बहुत बढ़ गया है. लड़कों को प्राथमिकता देने के चलते बड़ी संख्या में लड़कियां छोड़ दी गईं या अनाथालय भेज दी गईं. लिंग आधारित गर्भपता या कन्या भ्रूण हत्या के मामले भी बढ़ गए.
इसका एक प्रभाव ये भी हुआ कि लोगों को शादी करने में समस्या आने लगी.
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर के सोश्योलॉजी डिपार्टमेंट की डॉक्टर मू ज़ेंग का कहना है, “इसका असर शादियों के बाज़ार पर पड़ने लगा. खासतौर पर कमज़ोर सामाजिक-आर्थिक संसाधनों वालों पुरुषों के लिए मुश्किल होने लगी है.”

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कॉमर्ज बैंक की वरिष्ठ इकोनॉमिस्ट हाओ जो ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स से कहा, “अगर नई जन्म नीति प्रभावी होती है तो मौजूदा दो बच्चों की नीति को भी प्रभावी साबित होना चाहिए था. लेकिन, तीन बच्चे पैदा कौन करना चाहता है? युवा ज़्यादा से ज़्यादा दो बच्चे पैदा कर सकते हैं. बुनियादी मसला ये है कि यहां रहन-सहन का खर्च और लोगों पर दबाव बहुत ज़्यादा है.”
लोगों पर आर्थिक दबाव
बीबीसी के चीन संवाददाता स्टीफन मैकडॉनल कहते हैं कि ये चीन के लिए एक बड़ी ख़बर है. लेकिन एक बच्चे की नीति ख़त्म होने के बाद भी यहां लोगों ने अचानक ज़्यादा बच्चे पैदा करना शुरू नहीं किया.
बल्कि कई लोग ये भी पूछ रहे हैं कि जब दो बच्चों की नीति से ज़्यादा बच्चे नहीं हुए तो तीन बच्चों की नीति से कैसे होंगे?
लेकिन, एक विचार ये भी है कि जो लोग दो बच्चों के लिए तैयार हैं उनमें से कुछ तीन बच्चों पर भी विचार कर सकते हैं.
स्टीफन मैकडॉनल बताते हैं, “मैंने कई चीन दंपत्तियों से इस बारे में बात की लेकिन ऐसे बहुत कम परिवार हैं जो आज बड़ा परिवार चाहते हैं.”

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“चीन में लोगों की कई पीढ़ियां बिना भाई-बहन के ही रही हैं और उन्हें छोटे परिवारों की आदत पड़ गई है. वो घर में काम करने वाले हाथ बढ़ाने की बजाए एक ही बच्चे को सभी फायदे देना चाहते हैं.”
बीबीसी की चीन मीडिया विश्लेषक केरी एलेन कहते हैं कि चीन का ये नीतिगत बदलाव मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर छाया हुआ है.
लेकिन, सोशल मीडिया पर एक यूज़र ने लिखा, “इस वक़्त ज़िंदगी में कई बड़े दबाव हैं. युवा बच्चे पैदा करने के लिए तैयार नहीं हैं.”
लोग दफ़्तरों में मैटरनिटी/पैटरनिटी लीव पर जाने वाले लोगों की परेशानियों पर बात कर रहे हैं.
बाज़ार के सिकुड़ने के बाद कई चीनी लोग मानते हैं कि उन्हें ज़्यादा देर तक काम करना पड़ता है. ओवरटाइम बढ़ गया है.
ज़्यादातर महिलाएं जल्दी परिवार शुरू करने की बजाए आगे पढ़ना और नौकरी करना चाहती हैं.
जन्म पर नियंत्रण ख़त्म कर सकता है चीन?
चीन में आए जनगणना के आंकड़ों को देखते हुए विशेषज्ञों का ये भी मानना था कि चीन में जन्म पर नियंत्रण पूरी तरह हटाया जा सकता है.

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हालांकि, मौजूदा फ़ैसले से लगा कि चीन सावधानी बरतना चाहता है.
कुछ लोगों का ये भी कहना है कि इस कदम से कई अन्य समस्याएं भी पैदा हो जाएंगी जैसे शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच असमानता बढ़ सकती है.
बीजिंग और शंघाई जैसे बड़े शहरों में रहने वालीं महिलाएं देर से बच्चे पैदा कर सकती हैं लेकिन ग्रामीण लोग पुरानी परंपराओं के मुताबिक बड़ा परिवार चाह सकते हैं.
विशेषज्ञ इसकी चेतावनी देते हैं कि चीन की जनसंख्या कम होने का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ सकता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉनसिन-मेडिसन में डॉक्टर यी फ्यूक्सियन कहते हैं, “चीन की अर्थव्यवस्था ने बहुत तेज़ी से वृद्धि की है और कई उद्योग चीन पर निर्भर करते हैं. यहां जनसंख्या गिरने का असर बहुत व्यापक होगा.”
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