बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद पीएम मोदी के साथ-साथ सीएम योगी की चर्चा क्यों?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दो साल बाद बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली में रविवार को हुई.
कोविड महामारी की वजह से ये बैठक 'हाइब्रिड मोड' में आयोजित की गई. यानी कुछ नेता दिल्ली में एक जगह एकत्रित हुए, तो कुछ नेता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए बैठक में शामिल हुए.
एजेंडा अगले साल की शुरुआत में पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर केंद्रित था.
लेकिन जिस तरह से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बैठक के दौरान दिल्ली में मौजूद थे और कार्यकारिणी में राजनीतिक प्रस्ताव रखा, उससे नई चर्चा को तूल मिल रही है.
पहली चर्चा है योगी आदित्यनाथ के बीजेपी के भीतर बढ़ते क़द की और दूसरी चर्चा है बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच उन्हें 'स्पेशल ट्रीटमेंट' मिलने की. वैसे दोनों एक दूसरे से बहुत हद तक जुड़े भी हैं.
इस पर कई लेख लिखे जा रहे हैं और विश्लेषण भी हो रहे हैं.
दबे स्वर में बीजेपी के भीतर भी इन दोनों मुद्दों पर चर्चा हो रही है. इसके पीछे कई वजहें भी हैं.
हाल ही में राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन हुआ है, जिसके बाद ये पहली बैठक थी. लेकिन बीजेपी संसदीय बोर्ड का गठन अभी होना बाक़ी है, जिसमें भी योगी आदित्यनाथ को जगह मिल सकती है, इसकी भी चर्चा है.
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योगी पर चर्चा क्यों?
जिन राज्यों में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, उनमें से केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही इस बैठक में दिल्ली में मौजूद थे.
बाक़ी सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को वर्चुअल मोड में बैठक में शामिल होने के निर्देश थे. वो सभी अपनी अपनी राजधानी में पार्टी दफ़्तर से प्रदेश अध्यक्ष के साथ इसमें शामिल हुए.
अब तक पार्टी की कार्यकारिणी में केंद्रीय नेतृत्व के वरिष्ठ नेताओं को ही राजनीतिक प्रस्ताव पढ़ने का मौक़ा दिया जाता रहा है. मसलन 2018 और 2019 में पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्र सरकार के मंत्री राजनाथ सिंह को ये मौक़ा मिला था. किसी प्रेदश के मुख्यमंत्री को इससे अलग ही रखा जाता था.
राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राजनीतिक प्रस्ताव कौन पढ़ेगा और प्रस्ताव में क्या लिखा होगा - इसका फ़ैसला पार्टी के पदाधिकारी मिल कर करते हैं.
इस वजह से कार्यकारिणी के तुरंत बाद हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से इस बारे में सवाल भी पूछा गया.
निर्मला सीतारमण ने पार्टी के फ़ैसले को सही ठहराते हुए कहा, " सवाल ये नहीं कि उन्हें क्यों चुना गया, सवाल ये है कि उन्हें क्यों नहीं प्रस्ताव पेश करने के लिए चुनना चाहिए था. जनसंख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है. योगी आदित्यनाथ वहाँ के मुख्यमंत्री है. कोविड महामारी के दौरान उनके कामकाज को सबने देखा. फिर चाहे प्रवासी मज़दूरों के लिए उठाए गए क़दम हो या रोज़गार के अवसर की बात हो. पार्टी के वो वरिष्ठ सासंद रह चुके हैं. राजनीतिक प्रस्ताव पेश करने के लिए उन्हें क्यों नहीं बुलाना चाहिए?"
ज़ाहिर है इस प्रस्ताव के बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी का फ़ोकस कुछ हद तक उत्तर प्रदेश और योगी आदित्यनाथ पर शिफ़्ट हो गया.
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सालों से बीजेपी को कवर कर रही, अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की पत्रकार निस्तुला हेब्बार कहती हैं, "भले ही बीजेपी की दलील हो कि उत्तर प्रदेश बड़ा प्रदेश है, राजनीतिक रूप से वहाँ की जीत हार के अपने अलग मायने होते हैं, दिल्ली के पास है. लेकिन बीजेपी हमेशा ऐसा करती है. 'फर्स्ट अमंग इक्वल" यानी बराबरी वालों में एक नेता निकाल ही लेती है. ऐसा करके उन्हें दूसरों से अलग ज़रूर खड़ा किया है."
वो आगे कहती हैं, "एक बात जो योगी आदित्यनाथ को दूसरों से अलग करती है वो है उनका अपना सपोर्ट बेस. हिंदू युवा वाहिनी की वजह से योगी आदित्यनाथ का पार्टी से इतर भी अपना ख़ुद का 'सपोर्ट बेस' है, जो मुख्यमंत्री बनने से पहले से है. कुछ हद तक नरेंद्र मोदी की ही तरह, जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते अपने लिए एक अलग सपोर्ट बेस बनाया था."
कई दूसरे राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि योगी आदित्यनाथ से राजनीतिक प्रस्ताव पढ़वा कर एक संदेश देने की कोशिश की गई है. केंद्रीय नेतृत्व ने एक बार फिर से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर अपना भरोसा जताया है.
हाल ही में अमित शाह ने भी लखनऊ दौरे पर कहा था कि मोदी को पीएम बनाने के लिए योगी को सीएम बनाना ज़रूरी है.
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फोकस में कोविड महामारी या योगी
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडनीस का मानना है कि कार्यकारिणी की बैठक में फ़ौकस उत्तर प्रदेश या योगी पर उतना नहीं रहा, जितना सरकार के 'कोविड मैनेजमेंट' पर रहा.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रस्ताव के रखे जाने को वो बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानती.
उनके हिसाब से पीएम के संबोधन का सार भी कोविड पर ही था.
पीएम मोदी ने कार्यकारिणी में दिए अपने भाषण में कहा, "बीजेपी कार्यकर्ताओं को आम आदमी के लिए आस्था का पुल बनना होगा. बीजेपी परिवार आधारित पार्टी नहीं है. पार्टी जिन मूल्यों को लेकर चली है, उसमें सेवा, संकल्प और समर्पण जुड़ा है"
अदिति कहती हैं, "पीएम मोदी के भाषण के ये अंश ही साफ़ बताते हैं कि बीजेपी कार्यकर्ताओं से वो जनता के बीच जा कर और ज़्यादा काम करने के लिए कह रहे हैं. जिस तरह कोरोना के दौरान, खास तौर पर दूसरी लहर में लोगों को परेशानी उठानी पड़ी अब बीजेपी को लगने लगा है कि कोविड मैनेजमेंट के 'पॉजिटिव' पर जनता के बीच जाने की ज़रूरत है. उपचुनाव के नतीजों पर सवाल से भी वहाँ नेता बचते नज़र आए."
गौर करने वाली बात है कि उत्तर प्रदेश सहित देश के दूसरे राज्यों में कोविड महामारी के दौरान बिगड़े प्रबंधन पर ख़ुद बीजेपी सासंदो और विधायकों ने सवाल खड़े किए थे, जिनमें से संतोष गंगवार और यूपी सरकार के क़ानून मंत्री ब्रजेश पाठक भी शामिल थे.

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बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के प्रस्ताव की शुरुआत 100 करोड़ टीकाकरण से हुई, फिर उसमें आयुष्मान भारत योजना के तहत 67000 करोड़ के निवेश का ज़िक्र आया और 80 करोड़ लोगों तक प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना, 'पीएम केयर्स फ़ॉर चिल्ड्रेन' को भी प्रमुखता से जगह मिली. ये सभी बातें कोरोना के दौरान केंद्र सरकार की ओर से उठाए गए क़दम थे.
बावजूद इसके 29 विधानसभा सीटों और 3 लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में बीजेपी को वो सफलता नहीं मिली, जिसकी पार्टी की उम्मीद थी.
अदिति आगे कहती हैं, "यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में सरकार के कामकाज को जनता के बीच ले जाने के लिए. संगठन की भूमिका पर और ज़्यादा ज़ोर दिया है."
सोमवार को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कोविड महामारी के दौरान बीजेपी नेताओं के प्रबंधन पर एक बार फिर निशाना साधा.
उन्होंने कहा, "दवाई, अस्पताल में बिस्तर और ऑक्सीजन अगर समय पर मिल जाती, तो ग़रीबों को इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता. भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने लोगों को अनाथ छोड़ने का काम किया. सिर्फ़ जानें नहीं गईं बल्कि लोगों को सम्मान से अंतिम संस्कार का अधिकार तक नहीं मिला."

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कृषि क़ानून पर आश्वस्त बीजेपी
कुछ जानकारों की राय में कोविड महामारी के बाद अगर कोई दूसरा मुद्दा है, जो इस बार के उत्तर प्रदेश के चुनाव में छाया रहेगा, तो वो है नए कृषि क़ानून के विरोध में चल रहा किसान आंदोलन.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग 40 सीटों पर इस आंदोलन का असर पड़ सकता है.
लेकिन बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के प्रस्ताव में जिस हिसाब से 'कृषि विकास से किसान कल्याण' का ज़ोर शोर से डंका पीटा गया, उससे लग रहा है कि बीजेपी के हाथ इस इलाक़े में जीत का कोई नया फ़ॉर्मूला हाथ लग गया है.
इस बैठक में एमएसपी को डेढ़ गुना करना, महंगी डीएपी और यूरिया खाद पर सब्सिडी बढ़ाना, किसान सम्मान निधि के तहत डेढ़ लाख करोड़ से ज़्यादा राशि किसानों को देने के लिए बीजेपी ने मोदी सरकार की तारीफ़ की.
जानकारों का मानना है कि ये स्पष्ट संदेश है कि केंद्र सरकार कृषि क़ानून पर अपने पैर खींचने को तैयार नहीं है.

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निस्तुला का मानना है कि ये संदेश केवल योगी शासित उत्तर प्रदेश के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए था.
निस्तुला कहती हैं, "मुझे लगता है कि बीजेपी किसी तरह का गुना-भाग करके इस नतीजे पर पहुँच चुकी है किसान आंदोलन राजनीतिक तौर पर उन्हें उत्तर प्रदेश में ज़्यादा नुक़सान नहीं पहुँचाएगा. अगर बीजेपी को थोड़ा सा भी अहसास हो कि किसान आंदोलन से उन्हें उत्तर प्रदेश में राजनीतिक नुक़सान होगा, तो वो पैर पीछे खींच लेते. जैसे हिमाचल में उपचुनाव के नतीजे का एलान होते ही उन्हें समझ आ गया कि तेल के बढ़ते दाम से उनका खेल बिगड़ रहा है."
हालांकि अदिति फडणीस को लगता है कि बीजेपी को किसी भी ऐसे आकलन के पहले हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के नतीजों पर भी गौर करना चाहिए, जहाँ बीजेपी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं कहा जाएगा.
बीजेपी के कुछ नेता अब मानने लगे हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान का मुद्दा नए कृषि क़ानून कम और गन्ने की कीमतें ज़्यादा हैं.
योगी सरकार ने गन्ने के समर्थन मूल्य में 25 रुपए का इजाफा कर उनके दर्द पर मरहम लगाने की कोशिश की है.
फिर चुनाव से पहले उस इलाक़े में 'हिंदू-मुसलमान' का मुद्दा तो हैं ही, जिसका जिक्र मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में किया था.
उन्होंने बीबीसी से कहा था, "बीजेपी को लगता है कि उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले हिंदू-मुसलमान हो जाएगा और किसान आंदोलन मुद्दा नहीं रहेगा. लेकिन जब तक किसान आंदोलन है तब तक देश की राजनीति अस्थिर ही रहेगी."
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