किसान आंदोलन: मोदी सरकार का विपक्ष पर निशाना

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस नेता अनिल चौधरी सोमवार को दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर अपने समर्थकों के साथ सड़क पर थे.
चौधरी कांग्रेस के कई दूसरे नेताओं की तरह संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से बुलाए गए 'भारत बंद' के प्रति समर्थन जताने आए थे.
किसान मोर्चा ने तीन कृषि क़ानूनों के विरोध में जारी आंदोलन के एक साल पूरा होने पर भारत बंद का एलान किया था.
चौधरी जब सड़क पर धरना देने के लिए बैठे तो ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर मौजूद किसानों ने उनसे गुजारिश की कि वो 'दिल्ली लौट जाएं.'
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एक किसान नेता ने कहा, "ठीक है आप समर्थन कर रहे हैं. हमारे मंच पर आकर मीडिया का आप जो लाभ लेना चाह रहे हैं... प्लीज़ आपसे रिक्वेस्ट है, आप खड़े हो जाइए. आपका पूरा सम्मान है."

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विपक्ष का समर्थन
दूसरे आंदोलनों में ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं कि कोई संगठन या नेता समर्थन देने आया हो और आंदोलनकारियों ने उसे वापस लौटा दिया हो.
लेकिन, बीते एक साल से जारी किसान आंदोलन के दौरान ऐसे उदाहरण पहले भी कई बार दिखे हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो किसान आंदोलन के नेताओं की कोशिश रही है कि राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ता उनके मंच से दूर रहें.
हालांकि, किसान नेताओं के बयानों और उनके आंदोलन को लगातार राजनीति से जोड़कर देखा जाता रहा है. आंदोलन के तहत भारत बंद के एलान के बाद से ही देश के कई विपक्षी दलों ने इसके समर्थन की बात कही.
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कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की कि वो किसानों से बात करें.

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'किसानों के कंधे पर बंदूक'
उधर, केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने भी किसान आंदोलन और भारत बंद को लेकर विपक्ष को निशाने पर लिया.
केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के सीनियर नेता मुख्तार अब्बास नक़वी ने आरोप लगाया कि कुछ नेता किसानों के जरिए अपने राजनीतिक हित साधना चाहते हैं.
समाचार एजेंसी एएनआई ने नक़वी के हवाले से कहा, " असल में कुछ राजनीतिक दल किसानों के ट्रैक्टर पर बैठकर अपनी ऊसर ज़मीन की जुताई में लगे हुए हैं. उनको लगता है कि किसानों के ट्रैक्टर पर बैठकर ऊसर हो गई ज़मीन को वो उपजाऊ बना लेंगे."
उन्होंने आगे कहा, "इसे कहते हैं किसानों के कंधे पर बंदूक और क्रिमिनल कॉन्सप्रेसी का संदूक. किसानों के मुद्दे का जहां तक प्रश्न है, हमारी सरकार ने कभी भी टकराव का रास्ता नहीं अपनाया, टॉक का रास्ता अपनाया. बातचीत का रास्ता अपनाया."
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भी किसानों के साथ बातचीत की पेशकश की और आंदोलन को राजनीति से दूर रखने की सलाह दी.
तोमर ने कहा, "किसान आंदोलन का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए. किसान सभी के हैं. सरकार ने किसानों के संगठन के साथ बेहद संवेदनशील तरीके से बात की है और आगे भी ऐसा करने को तैयार है."
सरकार के दावों के उलट किसान संगठनों का कहना है कि 'किसान तैयार हैं लेकिन सरकार बातचीत की कोशिश नहीं कर रही है.'
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किसानों के संयुक्त मोर्चा ने सोमवार के बंद को कामयाब बताया और इसे सफल बनाने में लोगों के सहयोग के लिए आभार भी जताया.
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किसान नेताओं ने सोमवार को भी ये दिखाने की कोशिश की कि इस आंदोलन में राजनीतिक दलों की कोई हिस्सेदारी नहीं है.
लेकिन पंजाब से लेकर तमिलनाडु तक और महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता बंद को समर्थन देने के लिए सड़कों पर उतरे.
कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, वाम दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, आम आदमी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल समेत कई विपक्षी दलों के कार्यकर्ता बंद के दौरान सड़कों पर दिखे.
इन पार्टियों के बड़े नेता सोशल मीडिया पर सक्रिय नज़र आए और बंद को समर्थन दिया.
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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्विटर पर लिखा, "किसानों का अहिंसक सत्याग्रह आज भी अखंड है लेकिन शोषण-कार सरकार को ये नहीं पसंद है. इसलिए #आज_भारत_बंद_है."
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने बंद को समर्थन देने के एलान के साथ दावा किया कि किसान आंदोलन 'भाजपा के अंदर टूट का कारण' बनने लगा है.
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बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भी बंद को समर्थन दिया और बीजेपी पर किसानों को अनदेखा करने का आरोप लगाया.
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हालांकि, तमाम दलों के समर्थन देने के बाद भी किसान संगठनों ने न तो राजनीतिक दलों से मिले सहयोग का ज़िक्र किया और न ही आभार जताया.
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ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसान नेताओं ने विपक्षी दलों से दूरी दिखाई हो. ऐसे में सवाल ये है कि जब किसान अपने आंदोलन को राजनीति से दूर बताते रहे हैं तो तमाम राजनीतिक दलों के बीच उन्हें समर्थन देने की होड़ क्यों है?
बीबीसी पंजाबी के संपादक अतुल संगर के मुताबिक इसकी बड़ी वजह ये है कि इस आंदोलन के साथ खेती से जुड़ी एक बड़ी आबादी की भावनाएं जुड़ी हुई हैं और इसका राजनीतिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है.
अतुल संगर कहते हैं, " देखिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ये आंदोलन काफी ताक़तवर माना जा रहा है. कृषि से जुड़े बहुत सारे लोग इस आंदोलन के साथ जुड़ गए हैं. जब तक इसका कोई हल नहीं निकलता है, तब तक ये एक मुद्दा बना रहेगा सामाजिक तौर पर भी और सियासी तौर पर भी."
आंदोलन का जहां ज़्यादा असर देखा जा रहा है उन तीन में से दो राज्यों यानी पंजाब और उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने हैं.
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दोनों राज्यों में किसान वोटों की बड़ी अहमियत है. उत्तर प्रदेश के बीते चुनाव में बीजेपी की जीत में किसानों के समर्थन की बड़ी भूमिका मानी गई थी.
'किसान हैं नाराज़'
जानकारों की राय में खेती से जुड़े वोटरों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी की बढ़त दिलाने में अहम रोल निभाया था. तब भारतीय जनता पार्टी ने किसानों का कर्ज़ माफ़ करने का एलान किया था.
दूसरे राजनीतिक दल इस बार सरकार के साथ किसानों की कथित नाराज़गी को भुनाना चाहते हैं.
अतुल संगर कहते हैं, " अब उत्तर प्रदेश में चुनाव आने हैं. पंजाब में चुनाव आने हैं और यहां जो उपजाऊ ज़मीन किसानों और केंद्र सरकार के बीच टकराव से तैयार हुई है, राजनीतिक दल ख़ास तौर पर विपक्ष उसका लाभ उठाना चाहता है. इसलिए वो उनके साथ दिखना चाहते हैं."
वो आगे कहते हैं, "भले ही किसान इनका (राजनीतिक दलों का) सपोर्ट लें या न लें लेकिन विपक्षी दल उनके साथ दिखना चाहते हैं. इसीलिए एक दिन राहुल गांधी भी सिंघु बॉर्डर पर नज़र आए. वो मंच पर नहीं थे. जहां और लोग बैठते हैं, वो भी वहां बैठे हुए थे. इसी तरह और भी राजनीतिक नेता नज़र आए हैं."
किसान नेताओं में से कुछ की 'राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं' की बात होती है.
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और समर्थक टीवी डिबेट और सोशल मीडिया में इसे लेकर लगातार सवाल उठाते हैं.
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राजनीति से जुड़ाव रखते रहे या फिर राजनीतिक रुझान रखने वाले किसान नेताओं के नाम सोशल मीडिया पर ट्रेंड भी होते रहे हैं.
किसान नेताओं ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान वहां का रुख किया तो उन पर होने वाले ज़ुबानी हमले की रफ़्तार भी तेज़ हुई. लेकिन फिर भी किसान नेता लगातार दावा करते हैं कि ये 'आंदोलन राजनीतिक नहीं है.'
दूसरी तरफ विपक्षी दल किसानों के किसी भी कार्यक्रम को बिना शर्त समर्थन का एलान करते रहे हैं.
इसी महीने की शुरुआत में उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में हुई किसान महापंचायत में किसी राजनीतिक दल का कोई नेता मंच पर नहीं था लेकिन विपक्षी दलों ने इसे अपना समर्थन दिया था.
बीबीसी के लिए महापंचायत कवर करने वाले पत्रकार समीरात्मज मिश्र ने अपनी रिपोर्ट में बताया था, " राजनीतिक दलों, ख़ासकर राष्ट्रीय लोकदल के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने महापंचायत को अपने समर्थन देने जैसी ढेरों होर्डिंग्स लगा रखी थी."
अतुल संगर कहते हैं कि ऐसा इसलिए है कि विपक्षी दल यहां बढ़त बनाने का एक मौका देखते हैं.
वो कहते हैं, "राजनीतिक दल केंद्र सरकार की कृषि नीतियों के विरोध में एक मौका देख रहे हैं और इसे भुनाना चाहते हैं."

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उत्तर प्रदेश में असर
उत्तर प्रदेश में इसी साल हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में बीजेपी समर्थक उम्मीदवारों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा तो इसे भी किसान आंदोलन के असर के तौर पर देखा गया.
इन चुनावों में समाजवादी पार्टी समर्थित 747 उम्मीदवारों को जीत मिली, जबकि बीजेपी समर्थित 690 प्रत्याशी ही जीत पाए. बीजेपी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज, मथुरा जैसे ज़िलों में हार का सामना करना पड़ा.
हालांकि, बीजेपी ने ज़िला पंचायत अध्यक्ष पद चुनाव में 75 में से 67 पर जीत हासिल की और फिर ब्लॉक प्रमुख चुनाव में जीत हासिल करने के बाद अपना जनाधार पुख्ता होने का दावा किया.
हालांकि, प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों ने दावा किया किया कि इन चुनावों में हमेशा सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार जीतते रहे हैं.
वहीं, समाजवादी पार्टी और दूसरे राजनीतिक दलों ने दावा किया कि सत्ताधारी बीजेपी ने जीत हासिल करने के लिए 'सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया.'

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आगे क्या होगा?
लेकिन, बीजेपी ने इस जीत को विपक्ष के दावों की धार और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में मिली झटके के असर को कुंद करने के लिए इस्तेमाल किया. बीजेपी के कई नेता दावा करते रहे हैं कि किसान आंदोलन का ज़मीन पर कोई असर नहीं है.
लेकिन, विपक्ष जिस तरह किसानों के पीछे लामबंद नज़र आता है, उससे तस्वीर का अलग ही रुख दिखता है.
अतुल संगर कहते हैं, "आंदोलन का असर है और ये ज़मीन पर भी नज़र आएगा."
हालांकि, वो कहते हैं कि इसका फ़ायदा किसी राजनीतिक दल को मिल सकता है, ये कहना मुश्किल है.
अतुल संगर कहते हैं, "बहुत सारे विपक्षी दल हैं और सबको ही ये लालसा होगी कि हमें वोट मिल जाएं. ये किसी एक विपक्षी दल के पलड़े में अपने सारे वोट रख दें, ये मुझे संभव नहीं दिखता."
वो ये भी कहते हैं कि कई जगह किसान सिर्फ़ बीजेपी और केंद्र सरकार का विरोध नहीं कर रहे हैं बल्कि वो सभी राजनीतिक दलों से दूरी बनाए हुए हैं.
अतुल संगर बताते हैं, "पंजाब में तो मुझे ये नज़र आ रहा है कि बहुत सारे गांव इकट्ठे होकर राजनीतिक दलों का बहिष्कार कर रहे हैं. उन्होंने बोर्ड लगा दिए हैं कि राजनीतिक दलों का कोई नुमाइंदा यहां न आए. इतनी निराशा बढ़ गई है राजनीतिक दलों और किसानों के बीच."
लेकिन फिर भी चुनाव में किसान किसी न किसी के पक्ष में खड़े होंगे ही.
वो कहते हैं, "ये सब वोटर हैं और जब ये अपने गांव जाएंगे तो बात करेंगे और देखेंगे कि इनको सूट कौन करता है. मेरा मानना है कि सीट दर सीट क्या बेहतर है, किसान ये देखते हुए फ़ैसला करेंगे. ऐसे नहीं होगा कि फलां पार्टी को समर्थन करेंगे और उसकी बल्ले बल्ले हो गई."
जब तक चुनाव नहीं होते और नतीजे नहीं आते तब तक एक तरफ से किसानों को लुभाने और दूसरे तरफ से उनकी ताक़त को ख़ारिज करने की कोशिशें जारी रहेंगी.
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