किसान आंदोलन: क्या 'चुनाव लड़ने के चक्कर में' किसान एकता में आई दरार

किसान आंदोलन
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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

किसान आंदोलन में एक ऐसा मोड़ आया है, जिससे किसान नेता थोड़े परेशान भी हो सकते हैं.

दरअसल संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने साथी हरियाणा भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के प्रमुख गुरनाम सिंह चढूनी को मोर्चे से एक हफ़्ते के लिए सस्पेंड कर दिया है.

सस्पेंड करने के पीछे वजह, 'मिशन पंजाब' पर दिया गए उनके बयान को बताया जा रहा है.

दरअसल पिछले सप्ताह किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने बयान दिया था कि पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में किसान नेताओं को चुनाव लड़ना चाहिए.

उन्होंने कहा था, "पिछले साढ़े सात महीने से चल रहे किसान आंदोलन में क्या विपक्ष का एक भी बयान आया कि हमारा राज आएगा, तो हम नए कृषि क़ानूनों को ख़त्म कर देंगें. हम एमएसपी का नया क़ानून बना देंगे? जब बीजेपी हार जाएगी, तो किसानों की बात मानी जाएगी इस बात की क्या गारंटी है? मैं कहना चाहता हूँ कि हमें मिशन उत्तर प्रदेश नहीं, बल्कि मिशन पंजाब चलाना चाहिए."

सार्वजनिक मंच से कही गई गुरनाम सिंह चढूनी की बात पर पंजाब के किसान नेताओं को आपत्ति है. उनका कहना है कि गुरनाम सिंह चढूनी ने बयान देने से पहले किसी से राय नहीं ली.

उनके लाख समझाने के बाद भी चढूनी अपने मिशन पंजाब की बात पर क़ायम है. इस वजह से संयुक्त किसान मोर्चा ने चढूनी को मोर्चे से सात दिन के लिए निलंबित कर दिया है.

उनके इस बयान के बाद बीजेपी को किसानों पर वार करने के लिए एक नया हथियार मिल गया है.

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हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर कह रहे हैं, "ये तो पहले से पता था कि प्रदर्शन कर रहे किसानों के पीछे राजनीति है. इसी राजनीतिक मंशा से वो इस आंदोलन को चलाए हुए हैं. इस आंदोलन से किसानों की समस्याओं का कोई सरोकार नहीं है. किसान आज भी इस नए कृषि क़ानून को अच्छा मानता है."

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क्या है मिशन पंजाब

दरअसल सात महीने से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर कृषि बिल वापस लेने की माँग को लेकर धरने पर बैठे हैं.

इस साल जनवरी के बाद से उनकी केंद्र सरकार से कोई बात नहीं हुई है.

गुरनाम सिंह चढूनी हरियाणा के किसान नेता हैं. लेकिन पंजाब में आने वाला विधानसभा चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं. उनका तर्क है इस आंदोलन में पंजाब और हरियाणा के किसान सबसे ज़्यादा सक्रिय हैं.

उनका कहना है कि सत्ता में बैठी पार्टी को बदलने से सिर्फ़ व्यवस्था में बदलाव आएगा. जबकि ज़रूरत है सिस्टम को बदलने की. इसलिए पंजाब के किसानों को सिस्टम बदलने की शुरुआत पंजाब में चुनाव लड़ कर करनी चाहिए.

वो कहते हैं कि किसान चुनाव लड़ें, जीतें और कृषि के क्षेत्र में बेहतर काम करके एक अच्छा मॉडल बाक़ी राज्यों के लिए पेश करें.

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लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य योगेंद्र यादव कहते हैं, "गुरनाम सिंह का निलंबन दो वजहों से किया गया है. 'मिशन पंजाब' पर सहमति असहमति का प्रश्न नहीं हैं. प्रश्न केवल दो हैं. क्या 'मिशन पंजाब' के बारे में कहने से पहले उन्होंने पंजाब के दूसरे किसान संगठनों से बात की? और दूसरा क्या इस बारे में संयुक्त किसान मोर्चा की सुप्रीम बॉडी जिसके 9 सदस्य हैं, उनसे सलाह ली गई? दोनों प्रश्नों का जवाब ना है. इसलिए उनको निलंबित किया गया."

वो कहते हैं, 'मिशन पंजाब' पर दिए गए उनके 6 जुलाई के बयान के बाद, संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्यों ने लिखित में उनसे अनुरोध किया था कि वो आगे ऐसा बयान ना दें. उन्होंने उस अनुरोध का उलंघन एक बार नहीं बल्कि कई बार किया."

अपने निलंबन के बाद जारी किए बयान में भी गुरनाम सिंह चढूनी अपने मिशन पंजाब वाले बयान पर क़ायम हैं. वो कहते हैं, मिशन उत्तर प्रदेश के पहले मिशन पंजाब चलाना चाहिए.

ये बात सच है कि संयुक्त किसान मोर्चा मिशन उत्तर प्रदेश की तैयारी में पिछले तीन महीने से लगा है.

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क्या है मिशन उत्तर प्रदेश

राकेश टिकैत के भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, "आधिकारिक तौर पर मिशन उत्तर प्रदेश की शुरुआत 5 सितंबर को मुजफ्फरनगर में पंचायत से होगी, जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा के सभी बड़े नेता शामिल होंगे. उसके बाद हर मंडल में पंचायत होगी, और फिर इन पंचायतों को ज़िला स्तर पर आयोजित किया जाएगा. अगले साल चुनाव आते-आते पूरे उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हराने के उद्देश्य से इन पंचायतों का आयोजन किया जा चुका होगा."

लेकिन बीजेपी को हराने से किसानों को क्या मिलेगा? क्या क़ानून वापस हो जाएँगे?

इस सवाल पर धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, "उत्तर प्रदेश से होकर ही दिल्ली का रास्ता जाता है. उत्तर प्रदेश में हारेंगे तो बीजेपी को पता चलेगा कि 2024 में भी हारेंगे. फिर शायद दबाव बीजेपी पर बढ़े."

संयुक्त किसान मोर्चा का दावा है कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार में किसान आंदोलन का भी हाथ था. उनके बंगाल जा कर चुनाव प्रचार में बीजेपी के विरोध से बीजेपी हारी है. और बीजेपी केवल 'वोट पर चोट' की ही भाषा समझती है.

इसलिए संसद के मॉनसून सत्र के पहले संयुक्त किसान मोर्चा हर विपक्षी दल के सांसद को चिट्ठी लिखने की तैयारी में है, ताकि किसानों की माँगों को सांसद, संसद में भी रख सकें.

चुनावी राजनीति से जीत कर आए सांसदों की किसान मदद लेने को तैयार हैं, लेकिन ख़ुद चुनाव में उतरने के लिए किसान मोर्चा फ़िलहाल तैयार नहीं है.

उनका मानना है कि आंदोलन से ही वो सरकार बदलेंगे. फ़िलहाल राजनीति में नहीं उतरेंगे और आंदोलन को ग़ैर राजनीति ही रहने देंगे. नहीं तो विरोधियों को बैठे बिठाए मुद्दा मिल जाएगा. जैसा हरियाणा के मुख्यमंत्री ने अपने बयान में भी कहा.

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इमेज कैप्शन, मनीष सिसोदिया के साथ राकेश टिकैत

राजनीति से बैर नहीं

ये सच है कि राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ किसान आंदोलन के नेताओं ने हमेशा एक दूरी बनाए रखी. कांग्रेस के लुधियाना से सांसद रवनीत सिंह बिट्टू जब सिंघु बार्डर पहुँचे थे, तो उनके लिए 'गो बैक' के नारे तक लगे.

लेकिन दूसरी तरफ़ अकाली दल के नेता सुखबीर बादल, लोकदल नेता जयंत चौधरी, सांसद दीपेंद्र हुड्डा जब ग़ाज़ीपुर बॉर्डर किसान आंदोलन को समर्थन देने पहुँचे, तब राकेश टिकैत इनसे प्यार से मिले.

हरवीर सिंह, कृषि मामलों के जानकार पत्रकार हैं और ग्रामीण भारत से जुड़ी एक वेबसाइट चलाते हैं.

वो कहते हैं, "चढूनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा है, ऐसा प्रतीत होता है. लेकिन वो हरियाणा से आते हैं और उनका असर पंजाब में बिल्कुल नहीं है. उनका प्रभुत्व हरियाणा के कुरुक्षेत्र के आसपास के इलाक़े में ही है. उसके बाहर वो कुछ नहीं कर सकते. अगर संयुक्त किसान मोर्चा से अलग होते हैं, तो वो नाकाम साबित होंगे. ये मेरा आकलन है."

लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा के कई सदस्य का संबंध पूर्व में अलग अलग राजनीतिक पार्टियों से रहा है. जैसे योगेन्द्र यादव पहले आम आदमी पार्टी के साथ रह चुके हैं, राकेश टिकैत भी इससे पहले दो बार अलग-अलग दलों के समर्थन से चुनाव लड़ चुके हैं. एक बार कांग्रेस के समर्थन से और एक बार राष्ट्रीय लोकदल से लड़ चुके हैं. मध्य प्रदेश के नेता शिव कुमार कक्काजी आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ के साथ रह चुके हैं.

और ऐसा भी नहीं कि आंदोलन के दौरान किसान नेता राजनीति से बिल्कुल अलग रहे हों.

हरवीर सिंह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में ज़िला पंचायत चुनाव में बीजेपी नेता संजीव बालियान के भाई को विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर भारतीय किसान यूनियन का समर्थन प्राप्त था.

उनकी उम्मीदवारी की घोषणा ख़ुद राकेश टिकैत के भाई नरेश टिकैत ने की थी. लेकिन वो चुनाव हार गए. बीकेयू के बिजनौर के सदस्य की पत्नी भी ज़िला पंचायत चुनाव में जीती थी. उनको भी यूनियन का समर्थन प्राप्त था.

ऐसे में सवाल उठता है कि मिशन उत्तर प्रदेश को 'हाँ' और मिशन पंजाब को 'ना' क्यों?

इस सवाल के जवाब में योगेंद्र यादव कहते हैं, 'मिशन पंजाब' को ना कहने का सवाल ही कहाँ आता है, जब उस पर चर्चा ही नहीं हुई. अभी इस पर सहमित असहमति की बात ही नहीं है. चढूनी का निलंबन संयुक्त किसान मोर्चा के अपनी बात रखने की बनी व्यवस्था का पालन नहीं करने की वजह से हुआ है.

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चढूनी पर इससे पहले भी हुई है कार्रवाई

लेकिन ये पहला मौका नहीं जब चढूनी का संयुक्त किसान मोर्चा से निलंबन हुआ हो.

इसी साल जनवरी में किसान नेता चढूनी ने विपक्ष के अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ ऑल पार्टी मीटिंग का आयोजन किया था. उस बैठक के बाद भी संयुक्त किसान मोर्चा ने उन्हें निलंबित किया था. बाद में संयुक्त किसान मोर्चा ने अलग बयान जारी कर कहा था कि चढूनी का ऑल पार्टी मीटिंग से कोई लेना देना नहीं है.

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