नरेंद्र मोदी के बाद गुजरात में कोई मुख्यमंत्री आख़िर टिक क्यों नहीं पाता है?

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- Author, टीम बीबीसी गुजराती
- पदनाम, नई दिल्ली
बीजेपी नेता विजय रुपाणी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर अहमदाबाद से लेकर दिल्ली तक हंगामा मचा दिया है.
यह ख़बर आने के बाद जहां एक ओर उनके कार्यकाल और इस्तीफ़े की वजहों पर चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या गुजरात को अब तक नरेंद्र मोदी का विकल्प नहीं मिल सका है?
भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने लगातार तीन कार्यकालों तक गुजरात के मुख्यमंत्री की भूमिका निभाई थी.
इसके बाद आक्रामक और रोमांचक अंदाज़ में चुनाव प्रचार करते हुए नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय तक का सफ़र तय किया.
मगर उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से लेकर बीते शनिवार तक गुजरात में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर जारी है.
ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या गुजरात को अब तक मोदी का विकल्प नहीं मिला है?
बीबीसी गुजराती सेवा ने इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए गुजरात की राजनीति को समझने वाले कई विशेषज्ञों से बात की है.
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'मोदी की विकास पुरुष की छवि'
गुजरात की राजनीति को समझने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक जतिन देसाई मानते हैं कि गुजरात की राजनीति में नेतृत्व की अस्थिरता के लिए समय, पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और पिछले मुख्यमंत्री के साथ तुलना ज़िम्मेदार है.
वो कहते हैं, "मोदी अपने कार्यकाल के दौरान स्वयं के लिए एक विकासवादी नेता की छवि गढ़ने में कामयाब रहे और केंद्रीय नेतृत्व की ओर से कभी उनके कद को छोटा करने की कोशिश नहीं की गई.''
''भाजपा का तत्कालीन केंद्रीय नेतृत्व वर्तमान नेतृत्व की तुलना में अपेक्षाकृतअधिक लोकतांत्रिक था, लेकिन साल 2014 के मई महीने में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से गुजरात में कोई ऐसा नेता सामने नहीं आया है जो मोदी की विकासवादी नेता की छवि के साथ प्रतिस्पर्धा कर सके."
देसाई कहते हैं कि मोदी के कार्यकाल में न केवल केंद्रीय नेतृत्व बल्कि गुजरात ने भी उनके नेतृत्व को लेकर भाजपा में कोई बड़ा विद्रोह नहीं देखा.
वो कहते हैं, ''अगर कभी ऐसा मौका आया भी हो तो मोदी ने उस व्यक्ति और विद्रोह का पटाक्षेप कर दिया, लेकिन उनके बाद मुख्यमंत्री बनने वाले दो अन्य नेताओं में पार्टी के आंतरिक विद्रोह को दबाने की क्षमता नहीं देखी गई."
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'मोदी नहीं चाहते कि किसी का कद बढ़े'
हालांकि एक अन्य राजनीति विश्लेषक डॉक्टर हरि देसाई मानते हैं कि नरेंद्र मोदी खु़द यह नहीं चाहते हैं कि कोई उनके क्षेत्र में पैर जमाए.
वह कहते हैं, "विजय रुपाणी का इस्तीफ़ा इस बात का सबूत है कि मोदी किसी को अपने क्षेत्र में जमने नहीं देना चाहते. वो किसी भी नेता की छवि को पार्टी के लिए समस्या नहीं बनने देना चाहते हैं. ऐसे में उन्होंने समय-समय पर मुख्यमंत्रियों को बदलने की रणनीति अपनाई है.''
''इंदिरा गांधी भी अपने कार्यकाल में इसी तरह की रणनीति अपनाती थीं ताकि कोई भी राजनीतिक कद उनके लिए चुनौती न बन सके. इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वो उन हाथों को जल्द बदल देती थीं जिनके हाथों में सत्ता रहती थी. बीजेपी और मोदी भी अब यही कर रहे हैं."
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गुजरात की राजनीति में हुए 'तख़्तापलट'
बीते 20 वर्षों में गुजरात की राजनीति में जो कुछ हुआ उसका असर पूरे देश में देखने को मिला है.
गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के इस्तीफ़े के बाद और काफ़ी अटकलों के बीच बीजेपी ने गुजरात के नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति की घोषणा करते हुए नरेंद्र मोदी को दिल्ली से भेजा.
यह नरेंद्र मोदी के खु़द को 'विकास पुरुष' के रूप में स्थापित करने की प्रक्रिया की शुरुआत थी. इसके बाद नरेंद्र मोदी ने तमाम दिक़्क़तों और राजनीतिक झंझावातों का सामना करते हुए साल 2014 तक गुजरात की राजनीति का शिखर छू लिया.
इनमें 'गुजरात मॉडल' और 'विकास पुरुष' की छवि की लॉन्चिंग शामिल है. कांग्रेस पार्टी के प्रति लोगों के असंतोष और नाराज़गी ने भी मोदी के उभार में एक भूमिका अदा की.
इस तरह साल 2014 में भारतीय मतदाताओं ने एक अरसे बाद बीजेपी को पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का अवसर दिया.

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इसके बाद केंद्र को एक स्थिर सरकार मिल गई लेकिन इसके साथ गुजरात में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया.
नरेंद्र मोदी के बाद आनंदीबेन पटेल को गुजरात की मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला. इसके साथ ही वह गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री बन गईं लेकिन दो साल बाद 1 अगस्त 2016 को उन्होंने 75 साल की उम्र सीमा का हवाला देते हुए इस्तीफ़ा दे दिया.
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि पार्टी के आंतरिक विद्रोह और पाटीदार आंदोलन के परिणामस्वरूप उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
इसके बाद कई दिनों तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि गुजरात का अगला मुख्यमंत्री कौन बनेगा.
खु़द अमित शाह मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान करने गुजरात आए. कई विशेषज्ञ मान रहे थे कि अगले मुख्यमंत्री नितिन पटेल हो सकते हैं लेकिन बीजेपी ने विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बना दिया.
हालाँकि रुपाणी की सरकार को हमेशा संशय बना रहा कि यह कब तक चलेगी. साल 2017 के दिसंबर महीने में भी कुछ ऐसे ही हालात पैदा हुए.
मगर मोदी और शाह ने आख़िरकार रुपाणी पर अपना भरोसा जताते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बनाया. ऐसे में तमाम समस्याओं के बीच विजय रुपाणी अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे.
मगर इन सबके बाद भी आंतरिक कलह और उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल के साथ जारी टकराव को लेकर कयास लगाए गए कि इन वजहों से रुपाणी जल्द ही अपना पद छोड़ देंगे.
आख़िरकार रुपाणी ने 11 सितंबर 2021 को अपने पद पर पांच साल तक बने रहने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया.
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