मोदी सरकार के फ़ैसले के इंतज़ार में परेशान हैं ये अफ़ग़ान- प्रेस रिव्यू

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भारत की ओर से अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों के वीज़ा रद्द किए जाने के मामलों के बीच उन अफ़ग़ान छात्रों के बीच अनिश्चितता का माहौल है जो यहाँ पढ़ाई और रिसर्च के लिए आए हुए हैं.
द हिंदू अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ इंडियन काउंसिल ऑफ़ कल्चरल रिलेशंस (आईसीसीआर) की स्कॉलरशिप पर ऐसे 1500 छात्र भारत में पढ़ रहे हैं.
27 साल के शफीक़ सुल्तान भी उन्हीं में से एक हैं जो आईसीसीआर की स्कॉलरशिप पर जेएनयू में पीजी कर रहे हैं. आईसीसीआर की ये स्कॉलरशिप परियोजना भारतीय विदेश मंत्रालय ने साल 2005 में शुरू की थी.
शफीक़ सुल्तान ने पीएचडी के लिए अप्लाई किया है लेकिन सरकार की तरफ़ से उन्हें इस बात पर कोई जवाब नहीं आया है कि उनका वीज़ा और स्कॉलरशिप जारी रखे जाएंगे या नहीं.
शफीक़ की महीने भर से अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद अपने घरवालों से बात नहीं हो पाई है. उन्होंने हिंदू अख़बार को बताया, "अगर इस समय मैं अपने देश लौटता हूँ तो इसमें कोई शक नहीं कि एक रोज़ मैं मारा जाऊंगा. तालिबान की पहुंच हर डेटाबेस तक है और वे घर-घर जाकर जाँच कर रहे हैं. मुझे उम्मीद है कि सरकार हमें नई ज़िंदगी देने पर विचार करेगी और यहाँ रहने और पढ़ने देगी."

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अगस्त में शफीक की तरह ही कोर्स पूरा करने वाले 400 छात्रों की उम्मीदें सरकार के फ़ैसले पर टिकी हैं.
लगभग 800 छात्र ऐसे हैं, जिन्हें अगस्त से नए सत्र के लिए स्कॉलरशिप मिली है और वे भारत के अलग-अलग कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए जाने वाले हैं लेकिन उनके वीज़ा को लेकर तस्वीर अभी साफ़ नहीं हो पाई है. इनमें से कुछ ने काबुल स्थित भारत दूतावास में वीज़ा के लिए पहले से आवेदन कर रखा है.
पिछले हफ़्ते गृह मंत्रालय ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए एक अधिसूचना जारी करके भारत में ग़ैर-मौजूद अफ़ग़ान नागरिकों को पहले जारी किए गए वीज़ा रद्द कर दिए थे.
सरकार का कहना है कि इसके दुरुपयोग की आशंका थी. सरकार के इस फ़ैसले का असर लगभग 400 अफ़ग़ान छात्रों पर पड़ा है जो भारत में कोरोना से जुड़ी पाबंदियों के कारण यूनिवर्सिटी बंद होने के बाद अपने देश लौट गए थे.
अब जब कि कॉलेज-यूनिवर्सिटी खुल रहे हैं, इन छात्रों के सामने तालिबान हुकूमत की चुनौती पेश आ रही है. तालिबान अफ़ग़ान नागरिकों के देश छोड़ने पर पाबंदियां लगा रहा है. इनमें से कई छात्रों ने इमर्जेंसी ऑनलाइन वीज़ा के लिए भी आवेदन किया है लेकिन सरकार की तरफ़ से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है.
एक आधिकारिक सूत्र ने हिंदू अख़बार को बताया कि "हालात नाज़ुक हैं. कई मुद्दे हैं जिन पर फ़ैसला लिया जाना है. हम ये सुनिश्चित करेंगे कि अफ़ग़ान छात्रों के हित सुरक्षित रहें."
भारत में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत फ़रीद ममूंदज़ई का कहना है कि उन्होंने ऐसे 1500 से भी ज़्यादा अफ़ग़ान छात्रों को लेकर विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय को इस बारे में औपचारिक तौर से चिट्ठी लिखी है. उन्होंने बताया कि अब तक 14,000 अफ़ग़ान छात्रों की भारत की तरफ़ से स्कॉलरशिप मिली है.

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डीयू में सावरकर, सुषमा और जेटली के नाम पर खुलेंगे नए कॉलेज
दिल्ली यूनिवर्सिटी में नए कॉलेजों और सेंटर्स के नाम तय करने पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार वाइस चांसलर को दिया जा रहा है. ये नाम जानी-मानी शख़्सियतों की उस अप्रूव्ड लिस्ट से लिए जाएंगे, जिनमें वीर सावरकर, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के नाम शामिल हैं.
कोलकाता से छपने वाले टेलीग्राफ़ अख़बार के मुताबिक़ इस लिस्ट और नाम तय करने का अंतिम अधिकार वाइस चांसलर को दिए जाने के प्रस्ताव पर विवाद छिड़ गया है.
अकादमिक दुनिया के कुछ लोगों का कहना है कि इस क़दम का मक़सद मौजूदा सरकार को ख़ुश करना है.
अब तक नए संस्थानों के नाम यूनिवर्सिटी की अकादमिक और एग्ज़िक्यूटिव काउंसिल में चर्चा के बाद तय किए जाते थे. वाइस चांसलर को नामों के चयन में अंतिम प्राधिकार घोषित करने प्रस्ताव को एकैडमिक काउंसिल ने मंज़ूरी दे दी है.
मंगलवार को एग्ज़िक्युटिव काउंसिल इस पर चर्चा करेगी. अगर एग्ज़िक्यूटिव काउंसिल में ये प्रस्ताव पारित हो गया तो दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर अपनी पसंद से नए नामों को लेकर फ़ैसला कर सकेंगे.
अख़बार का यूनिवर्सिटी सूत्रों के हवाले से कहना है कि एग्ज़िक्यूटिव काउंसिल में ये प्रस्ताव पारित हो जाएगा.
इस प्रस्ताव की अहमियत इस वजह से है कि हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय को नजफगढ़ इलाके में 16 एकड़ और दक्षिणी दिल्ली के फतेहपुर इलाके में 40 बीघा ज़मीन नए कॉलेजों की स्थापना के लिए आवंटित किया गया है.
सावरकर, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के अलावा वाइस चांसलर इस लिस्ट के जिन नामों पर नए संस्थानों के नाम रख सकते हैं, उनमें स्वामी विवेकानंद, सरदार पटेल, अटल बिहार वाजपेयी, सावित्रीबाई फुले, चौधरी ब्रह्म प्रकाश और सीडी देशमुख शामिल हैं.

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मुख्तार अंसारी के भाई सिब्ग़तुल्ला अंसारी समाजवादी पार्टी में शामिल
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र समाजवादी पार्टी ने मुख्तार अंसारी के भाई सिब्ग़तुल्ला अंसारी और पूर्व मंत्री अंबिका चौधरी को पार्टी में शामिल कर लिया है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ ग़ाज़ीपुर के मोहम्मदाबाद विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक सिब्ग़तुल्ला अंसारी के सपा में शामिल होने की आलोचना की है.
सत्तारूढ़ भाजपा ने सपा से पूछा है कि "माफिया मुख़्तार के भाई और समाजवादी पार्टी का रिश्ता क्या कहलाता है."
मऊ से पांच बार के विधायक और बसपा नेता मुख़्तार अंसार इस समय जेल में है. सिब्ग़तुल्ला अंसारी के दूसरे भाई अफज़ल अंसारी ग़ाज़ीपुर से बसपा के सांसद हैं. अंसारी परिवार का पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर, बलिया, मऊ, आज़मगढ़ और वाराणसी जैसे ज़िलों में प्रभाव माना जाता है.
सिब्ग़तुल्ला अंसारी और अंबिका चौधरी के सपा में शामिल होने के बाद अखिलेश यादव ने कहा, "मेरी कोशिश रहेगी कि नेताजी (मुलायम सिंह यादव) के करीबी नेताओं को पार्टी में वापस लाया जाए..."
साल 2017 में अंबिका चौधरी ने सपा छोड़ते वक़्त कहा था कि वे मुलायम सिंह यादव के साथ जैसा बर्ताव किया गया है, उससे वे आहत हुए थे. इंडियन एक्सप्रेस से उन्होंने कहा कि बसपा में उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई, इसलिए उन्होंने पार्टी छोड़ने का फ़ैसला किया.

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विवादास्पद कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ तमिलनाडु विधानसभा में प्रस्ताव पारित
तमिलनाडु विधानसभा ने शनिवार को एक प्रस्ताव पारित कर तीन विवादास्पद कृषि क़ानूनों को ख़त्म करने की केंद्र सरकार से अपील की. इन तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ दिल्ली बोर्डर पर महीनों से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ विधानसभा में इस प्रस्ताव पर वोटिंग शुरू होने से पहले अन्नाद्रमुक और भाजपा के विधायकों ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया और वे बाहर चले गए.
लेकिन एनडीए की सहयोगी पार्टी पीएमके, कांग्रेस, वीसीके, एमडीएमके, एमएमके और वामपंथी सदस्यों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रमुक नेता एमके स्टालिन ने कहा कि इन कृषि क़ानूनों को केंद्र सरकार ने बिना राज्य सरकारों से सलाह मशविरा किए एकतरफ़ा तरीके से लागू किया है क्योंकि ये क्षेत्र राज्य सरकारों के अधिकारों के अधीन हैं. इससे राज्यों की शक्तियां प्रभावित हुई हैं और संघीय ढांचे को कमज़ोर किया गया है.
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